वॉशिंगटन।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली संभावित मुलाकात से पहले ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री का मुद्दा दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव का बड़ा कारण बनता जा रहा है। ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, ताइवान के लिए प्रस्तावित करीब **14 अरब डॉलर के अमेरिकी रक्षा पैकेज** को लेकर बीजिंग और वॉशिंगटन के बीच मतभेद गहरा सकते हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, चीन चाहता है कि अमेरिका इस हथियार सौदे को आगे बढ़ाने से रोके या इसमें देरी करे, जबकि ताइवान का कहना है कि उसकी सुरक्षा को मजबूत करना क्षेत्रीय स्थिरता और अमेरिकी हितों के लिए महत्वपूर्ण है।
हथियार पैकेज में शामिल हैं आधुनिक रक्षा प्रणालियां
ताइवान के लिए प्रस्तावित इस बड़े रक्षा पैकेज में कई आधुनिक सैन्य उपकरण शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें मिसाइल सिस्टम, एंटी-ड्रोन तकनीक और एयर डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े उपकरण शामिल हैं।इस पैकेज का उद्देश्य ताइवान की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना बताया जा रहा है, खासकर चीन की ओर से बढ़ते सैन्य दबाव के बीच।
शी जिनपिंग कर सकते हैं ट्रंप से चर्चा
रिपोर्ट के अनुसार, इस सप्ताह होने वाली ट्रंप और शी जिनपिंग की बैठक में ताइवान का मुद्दा प्रमुख विषयों में शामिल हो सकता है।उम्मीद जताई जा रही है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिकी राष्ट्रपति पर इस हथियार पैकेज की डिलीवरी को और टालने के लिए दबाव डाल सकते हैं।चीन लंबे समय से ताइवान को अपना हिस्सा बताता रहा है और अमेरिका द्वारा ताइवान को सैन्य सहायता या हथियार बिक्री का विरोध करता है।
ट्रंप ने पहले भी टाली थी मंजूरी
रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप पहले भी इस हथियार हस्तांतरण की मंजूरी को टाल चुके हैं। उन्होंने इस प्रस्तावित सौदे को चीन के साथ बातचीत में एक संभावित रणनीतिक विकल्प के रूप में देखा था।ट्रंप ने पहले इस तरह के फैसलों को कूटनीतिक बातचीत में प्रभाव बढ़ाने वाले कदम के रूप में पेश किया था।
ताइवान की सुरक्षा पर अमेरिकी सहयोग महत्वपूर्ण
ताइवान अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए काफी हद तक अमेरिकी सहयोग पर निर्भर है। अमेरिका और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, लेकिन अमेरिका लंबे समय से ताइवान की सुरक्षा के लिए हथियार उपलब्ध कराता रहा है।ताइवान का कहना है कि बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल में उसे अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत रखना जरूरी है।
चीन लगातार करता रहा है विरोध
बीजिंग ताइवान पर अपनी संप्रभुता का दावा करता है और किसी भी देश द्वारा ताइवान के साथ सैन्य सहयोग का विरोध करता है।चीन का कहना है कि ताइवान से जुड़े मामलों में बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। वहीं, अमेरिका ताइवान के साथ सुरक्षा सहयोग को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बताता रहा है।
विशेषज्ञों ने बताया संवेदनशील मुद्दा
फुदान यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर ताइवान स्टडीज के निदेशक शिन कियांग ने ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ से बातचीत में कहा कि ताइवान का मुद्दा अमेरिका और चीन के संबंधों में सबसे संवेदनशील विषयों में से एक है।उनके अनुसार, हथियार बिक्री में देरी करवाना बीजिंग के प्रमुख लक्ष्यों में शामिल हो सकता है, क्योंकि यह मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा सकता है।
आर्थिक और तकनीकी मुद्दों पर भी होगी चर्चा
ट्रंप और शी जिनपिंग की संभावित बैठक में केवल ताइवान ही नहीं, बल्कि व्यापार, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है।दोनों देशों के बीच लंबे समय से व्यापार और तकनीक को लेकर मतभेद रहे हैं। ऐसे में ताइवान का मुद्दा बातचीत को और जटिल बना सकता है।
चीन के पास जवाबी कदमों के विकल्प
रिपोर्ट के अनुसार, यदि अमेरिकी प्रशासन हथियार बिक्री को आगे बढ़ाता है तो चीन जवाबी कार्रवाई के लिए कुछ विकल्पों पर विचार कर सकता है।इनमें दुर्लभ खनिजों यानी रेयर-अर्थ के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा दिसंबर में मियामी में होने वाले G-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं।
आगे की कूटनीतिक रणनीति पर नजर
ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव लंबे समय से जारी है। अब ट्रंप और शी की आगामी बातचीत में यह मुद्दा किस दिशा में जाता है, इस पर वैश्विक स्तर पर नजर रहेगी।14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज को लेकर फैसला अमेरिका-चीन संबंधों, क्षेत्रीय सुरक्षा और ताइवान की रक्षा नीति पर असर डाल सकता है। फिलहाल दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत के जरिए इस मुद्दे को संभालने की कोशिश जारी है।
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