वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को हिलाने के साथ अमेरिका के खजाने पर भी भारी बोझ डाला है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में शुरू हुए इस सैन्य अभियान में मिसाइलों, बमों, लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों, सैनिकों की तैनाती और क्षतिग्रस्त सैन्य उपकरणों पर अरबों डॉलर खर्च होने का अनुमान लगाया गया है।
युद्ध के पहले 120 दिनों की लागत को लेकर सामने आए एक स्वतंत्र विश्लेषण के मुताबिक अमेरिका ने 28 फरवरी से 27 जून 2026 के बीच करीब **103.3 अरब डॉलर** की प्रत्यक्ष सैन्य लागत वहन की।
यह रकम केवल लड़ाई में दागी गई मिसाइलों और बमों की कीमत नहीं है।
इसमें सैन्य अभियान चलाने, सैनिकों और युद्धपोतों की तैनाती, हथियारों के इस्तेमाल, नष्ट या क्षतिग्रस्त सैन्य संपत्तियों, इजरायल को दी गई युद्ध संबंधी सहायता और दूसरी अमेरिकी एजेंसियों पर पड़े खर्च को भी शामिल किया गया है।
इस आकलन के मुताबिक केवल हथियारों की श्रेणी में करीब **46.7 अरब डॉलर** खर्च होने का अनुमान है।
₹3.20 लाख करोड़ वाला आंकड़ा क्या है?
युद्ध की लागत से जुड़ी रिपोर्टों में करीब **₹3,20,407 करोड़** का आंकड़ा भी सामने आया है।
लेकिन इसे पूरे 120 दिनों की कुल अमेरिकी युद्ध लागत समझना सही नहीं होगा।
यह आंकड़ा लगभग 36.8 अरब डॉलर के उस अनुमान से जुड़ा है, जिसमें अमेरिकी सेना द्वारा इस्तेमाल किए गए मिसाइलों, बमों और अन्य हथियारों के बड़े हिस्से की लागत का आकलन किया गया था।
वहीं बाद में तैयार किए गए ज्यादा व्यापक 120-दिन के आकलन में पूरी **Weapons** श्रेणी की लागत बढ़कर करीब **46.7 अरब डॉलर** आंकी गई।
यानी हेडलाइन में ₹3.20 लाख करोड़ की रकम हथियारों की भारी खपत को दिखाती है, लेकिन पूरे युद्ध की लागत इससे कहीं ज्यादा बताई गई है।
120 दिन में $103.3 अरब का अनुमान
Stephen Semler के विश्लेषण में अमेरिका की प्रत्यक्ष युद्ध लागत को पांच बड़ी श्रेणियों में बांटा गया है।
सैन्य ऑपरेशन पर करीब **28.5 अरब डॉलर** खर्च होने का अनुमान लगाया गया।
हथियारों पर करीब **46.7 अरब डॉलर**।
नष्ट या क्षतिग्रस्त अमेरिकी सैन्य संपत्तियों की लागत करीब **20.3 अरब डॉलर** आंकी गई।
इजरायल के हथियारों और इंटरसेप्टर से संबंधित अमेरिकी सहायता करीब **2.9 अरब डॉलर** बताई गई।
वहीं दूसरी गैर-सैन्य अमेरिकी सरकारी एजेंसियों से जुड़े युद्ध खर्च को करीब **4.8 अरब डॉलर** आंका गया।
इन सभी को जोड़ने पर कुल रकम लगभग **103.3 अरब डॉलर** पहुंचती है।
सबसे ज्यादा पैसा हथियारों पर
इस युद्ध में अमेरिकी खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा हथियारों पर गया।
विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि 120 दिनों के दौरान करीब **14,000 म्यूनिशन** इस्तेमाल किए गए।
इनमें अलग-अलग तरह की क्रूज मिसाइलें, एयर-टू-सर्फेस हथियार, एंटी-रेडिएशन मिसाइलें, इंटरसेप्टर और गाइडेड बम शामिल हैं।
इनकी वास्तविक संख्या और प्रकार के बारे में पेंटागन ने पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।
इसीलिए यह आंकड़ा उपलब्ध सरकारी बयानों, मीडिया रिपोर्टों, ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस और अमेरिकी सैन्य खरीद डेटा के आधार पर तैयार किया गया अनुमान है।
13,629 हथियार इस्तेमाल होने की बात
14 मई को अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने एक सुनवाई में बताया था कि अमेरिका संघर्ष में उस समय तक **13,629 म्यूनिशन** फायर या ड्रॉप कर चुका था।
इसके बाद भी अमेरिकी हमले जारी रहे।
इसी आधार पर विश्लेषक ने 27 जून तक इस्तेमाल किए गए हथियारों की संख्या लगभग 14,000 मानकर लागत का अनुमान लगाया।
हालांकि वास्तविक संख्या इससे अलग हो सकती है।
अमेरिकी सैन्य नेतृत्व ने बाद में हथियारों की विस्तृत संख्या सार्वजनिक करने से बचने की बात कही और इसे ऑपरेशनल सिक्योरिटी से जुड़ा मामला बताया।
1,100 से ज्यादा Tomahawk का अनुमान
युद्ध में सबसे महंगे हथियारों में Tomahawk क्रूज मिसाइल भी शामिल रही।
स्वतंत्र विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि पहले 120 दिनों में अमेरिका ने करीब **1,130 Tomahawk मिसाइलें** इस्तेमाल की होंगी।
Tomahawk लंबी दूरी से लक्ष्य पर सटीक हमला करने वाली क्रूज मिसाइल है।
इसे अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत और पनडुब्बियां लॉन्च कर सकती हैं।
इसका फायदा यह है कि विमान को सीधे दुश्मन के एयर डिफेंस क्षेत्र में भेजे बिना दूर से हमला किया जा सकता है।
लेकिन इसकी कीमत बेहद ज्यादा है।
एक Tomahawk की कीमत करोड़ों में
अमेरिकी बजट दस्तावेजों में नए Tomahawk की यूनिट लागत कई मिलियन डॉलर तक पहुंचती है।
विश्लेषण में FY2027 की करीब **3.7 मिलियन डॉलर प्रति मिसाइल** लागत का संदर्भ दिया गया है।
भारतीय मुद्रा में यह लगभग 30 करोड़ रुपये से अधिक बैठ सकती है, हालांकि डॉलर-रुपया विनिमय दर के अनुसार रकम बदलती रहती है।
यानी अगर दर्जनों Tomahawk एक ही ऑपरेशन में दागे जाएं तो कुछ घंटों में ही हजारों करोड़ रुपये के बराबर हथियार इस्तेमाल हो सकते हैं।
10 जून के हमलों में ही कम से कम 49 Tomahawk इस्तेमाल होने का अनुमान दिया गया है।
JASSM का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल
Tomahawk के अलावा अमेरिकी वायुसेना के JASSM परिवार की लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने का अनुमान है।
विश्लेषण में लगभग **1,250 JASSM, उसके वेरिएंट या AGM-158 परिवार के अन्य हथियारों** का अनुमान लगाया गया।
इन मिसाइलों को लड़ाकू विमानों और बमवर्षकों से लॉन्च किया जा सकता है।
इनका इस्तेमाल दुश्मन के एयर डिफेंस से दूरी बनाए रखते हुए महत्वपूर्ण लक्ष्यों पर हमला करने के लिए किया जाता है।
आधुनिक युद्ध में ऐसे stand-off weapons बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनकी भारी खपत से अमेरिका के मौजूदा भंडार पर भी दबाव पड़ सकता है।
ATACMS और PrSM भी खर्च
विश्लेषण में करीब **930 ATACMS** और लगभग **90 PrSM** इस्तेमाल होने का अनुमान लगाया गया।
ATACMS जमीन से लॉन्च होने वाली टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल है।
वहीं Precision Strike Missile यानी PrSM अमेरिकी सेना की नई पीढ़ी की लंबी दूरी की मिसाइल है।
इन हथियारों को केवल कीमत के नजरिए से नहीं देखा जाता।
अगर युद्ध में स्टॉक का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल हो जाए तो उसे दोबारा भरने में वर्षों लग सकते हैं।
इसलिए वास्तविक रणनीतिक लागत खरीद मूल्य से भी ज्यादा हो सकती है।
एयर डिफेंस दबाने में भी अरबों खर्च
ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर करने के लिए अमेरिका को एंटी-रेडिएशन मिसाइलों की जरूरत पड़ी।
ये मिसाइलें दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाने के लिए डिजाइन की जाती हैं।
120-दिन के अनुमान में HARM, AARGM और AARGM-ER समेत करीब **1,061 एंटी-रेडिएशन मिसाइलों** के इस्तेमाल का अनुमान लगाया गया है।
इन हथियारों की भूमिका शुरुआती हमलों में बेहद महत्वपूर्ण होती है।
पहले दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस को कमजोर किया जाता है, उसके बाद लड़ाकू विमान दूसरे लक्ष्यों के करीब पहुंच सकते हैं।
सिर्फ मिसाइलें नहीं बम भी बरसे
अमेरिका ने केवल महंगी क्रूज मिसाइलों पर निर्भर नहीं किया।
कई प्रकार के गाइडेड बम और कम दूरी के हथियार भी इस्तेमाल किए गए।
इसमें छोटे व्यास वाले गाइडेड बम से लेकर भारी एयर-लॉन्च हथियार तक शामिल रहे।
युद्ध के शुरुआती चरण में अमेरिका ने हजारों लक्ष्यों पर हमले किए।
3 मार्च तक पेंटागन ने करीब 2,000 लक्ष्यों पर 2,000 से अधिक म्यूनिशन इस्तेमाल करने की जानकारी दी थी।
इसके बाद हथियारों की विस्तृत संख्या सार्वजनिक करना सीमित कर दिया गया।
फाइटर जेट उड़ाना भी बेहद महंगा
युद्ध की लागत केवल उस समय नहीं बढ़ती जब कोई मिसाइल दागी जाती है।
आधुनिक लड़ाकू विमान को हवा में बनाए रखना ही बेहद महंगा होता है।
फाइटर जेट की हर उड़ान में ईंधन, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, ग्राउंड क्रू, पायलट और लॉजिस्टिक सपोर्ट का खर्च शामिल होता है।
इसके अलावा एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग टैंकर, निगरानी विमान, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर एयरक्राफ्ट और दूसरे सपोर्ट प्लेटफॉर्म भी मिशन के साथ उड़ते हैं।
यानी एक एयर स्ट्राइक में दिखाई देने वाले कुछ लड़ाकू विमानों के पीछे कई अतिरिक्त विमान और सैकड़ों कर्मचारी काम कर रहे होते हैं।
युद्धपोतों पर भी अरबों डॉलर
ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका ने मध्य पूर्व और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नौसैनिक ताकत तैनात की।
विश्लेषण के शुरुआती मॉडल में Arabian Sea, Persian Gulf, Red Sea और Eastern Mediterranean क्षेत्र में करीब **15 अमेरिकी destroyers** की मौजूदगी का उल्लेख किया गया।
एक destroyer को चलाने की लागत प्रति सप्ताह लाखों डॉलर होती है।
इसके अलावा एयरक्राफ्ट कैरियर, सपोर्ट शिप, पनडुब्बियां और दूसरे नौसैनिक संसाधनों का खर्च अलग है।
युद्ध खत्म न होने तक यह ऑपरेशनल खर्च लगातार बढ़ता रहता है।
ऑपरेशन पर ही $28.5 अरब
120 दिनों के स्वतंत्र आकलन में केवल सैन्य ऑपरेशन की लागत करीब **28.5 अरब डॉलर** बताई गई।
इसमें सैनिकों की तैनाती, विमानों की उड़ान, जहाजों का संचालन, ईंधन, लॉजिस्टिक्स और प्रशासनिक खर्च शामिल हैं।
युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका ने मध्य पूर्व में बड़ा सैन्य जमावड़ा भी किया था।
रिजर्व सैनिकों को सक्रिय करने और अतिरिक्त सैन्य संसाधन क्षेत्र में पहुंचाने पर भी पैसा खर्च हुआ।
इसलिए युद्ध की लागत पहले बम गिरने से ही शुरू नहीं होती।
सेना की तैयारी और तैनाती भी बिल का हिस्सा होती है।
ईरानी हमलों से अमेरिकी नुकसान
लड़ाई में अमेरिका केवल हथियार खर्च नहीं कर रहा था।
ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों से अमेरिकी सैन्य ठिकानों और उपकरणों को भी नुकसान पहुंचा।
विश्लेषण में नष्ट या क्षतिग्रस्त अमेरिकी सैन्य संपत्तियों की लागत करीब **20.3 अरब डॉलर** आंकी गई है।
यह युद्ध खर्च का दूसरा बड़ा पहलू है।
अगर कोई महंगा एयर डिफेंस सिस्टम, विमान, रडार या दूसरा सैन्य उपकरण नष्ट होता है तो उसे बदलने की लागत सीधे युद्ध के बिल में जुड़ जाती है।
इजरायल को सहायता भी खर्च में शामिल
अमेरिका ने संघर्ष के दौरान इजरायल को भी हथियार और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई।
विश्लेषण में इससे जुड़ी लागत करीब **2.9 अरब डॉलर** आंकी गई।
इसमें अमेरिकी सहायता से खरीदे गए बम, इंटरसेप्टर और दूसरे हथियार शामिल किए गए हैं।
उदाहरण के तौर पर हजारों 500-पाउंड और 1,000-पाउंड बम तथा हजारों Advanced Precision Kill Weapon System राउंड जैसी खरीद को गणना में शामिल किया गया।
इसलिए अमेरिकी युद्ध खर्च केवल अमेरिकी सेना द्वारा सीधे इस्तेमाल किए गए हथियारों तक सीमित नहीं है।
सरकार ने बताया था बहुत कम आंकड़ा
युद्ध की लागत को लेकर ट्रंप प्रशासन और स्वतंत्र विश्लेषकों के आंकड़ों में बड़ा अंतर रहा।
Office of Management and Budget के निदेशक Russell Vought ने कांग्रेस के सामने लगभग **30 अरब डॉलर** खर्च होने की बात कही थी।
इससे पहले पेंटागन अधिकारियों ने लगभग 25 से 29 अरब डॉलर के आंकड़े दिए थे।
लेकिन स्वतंत्र विश्लेषकों ने सवाल उठाया कि इन आंकड़ों में युद्ध की पूरी ऑपरेशनल लागत, हथियारों की वास्तविक खपत और क्षतिग्रस्त सैन्य संपत्तियां शामिल हैं या नहीं।
यही वजह है कि अलग-अलग रिपोर्टों में युद्ध की लागत अलग दिखाई देती है।
ट्रंप प्रशासन ने मांगे अरबों डॉलर
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि प्रशासन की ओर से सार्वजनिक रूप से कम लागत बताने के बावजूद युद्ध के लिए कांग्रेस से बहुत बड़ी अतिरिक्त फंडिंग मांगी गई।
जून में ट्रंप प्रशासन ने युद्ध से संबंधित अतिरिक्त सैन्य खर्च के लिए दर्जनों अरब डॉलर की मांग की।
स्वतंत्र विश्लेषकों का तर्क है कि अगर वास्तविक लागत केवल 25-30 अरब डॉलर होती तो इतनी बड़ी अतिरिक्त फंडिंग की जरूरत अपने आप सवाल खड़े करती है।
हालांकि सरकारी फंडिंग रिक्वेस्ट और वास्तविक खर्च को सीधे एक समान नहीं माना जा सकता क्योंकि अतिरिक्त बजट भविष्य के खर्च और स्टॉक की भरपाई के लिए भी हो सकता है।
60 दिन बाद भी नहीं रुका खर्च
युद्ध के शुरुआती 60 दिनों की लागत पहले ही बेहद ज्यादा थी।
लेकिन संघर्ष की तीव्रता घटने के बाद भी खर्च खत्म नहीं हुआ।
60वें से 120वें दिन के बीच करीब **31 अरब डॉलर** अतिरिक्त प्रत्यक्ष लागत का अनुमान लगाया गया।
इस दौरान अमेरिकी सेना को मध्य पूर्व में युद्धकालीन सैन्य मुद्रा बनाए रखनी पड़ी।
युद्धपोत समुद्र में रहे, लड़ाकू विमान तैयार रहे और क्षेत्र में सैनिकों तथा एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती जारी रही।
एक दिन में औसतन अरबों रुपये
अगर $103.3 अरब की अनुमानित लागत को 120 दिनों में बांटा जाए तो औसतन करीब **86 करोड़ डॉलर प्रतिदिन** का खर्च बैठता है।
भारतीय मुद्रा में यह प्रतिदिन हजारों करोड़ रुपये के बराबर है।
लेकिन यह केवल गणितीय औसत है।
असल युद्ध खर्च हर दिन समान नहीं होता।
जिस दिन बड़े पैमाने पर मिसाइल और बम इस्तेमाल किए जाते हैं उस दिन लागत बहुत ज्यादा हो सकती है, जबकि कम सैन्य गतिविधि वाले दिन खर्च कम रहता है।
असली लागत भविष्य में और बड़ी हो सकती है
$103.3 अरब का आंकड़ा केवल तत्काल प्रत्यक्ष लागत का अनुमान है।
इसमें युद्ध के सभी दीर्घकालिक आर्थिक परिणाम शामिल नहीं हैं।
युद्ध में घायल सैनिकों की भविष्य की चिकित्सा देखभाल, वेटरन्स बेनिफिट, कर्ज पर ब्याज, हथियारों के भंडार को दोबारा भरना और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी जैसी अप्रत्यक्ष लागत अलग है।
Harvard की पब्लिक फाइनेंस विशेषज्ञ Linda Bilmes के आकलन का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि व्यापक दीर्घकालिक लागत को शामिल करने पर अगले दशक में प्रभाव **एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा** हो सकता है।
तेल बाजार ने दुनिया को दिया अलग बिल
युद्ध का खर्च केवल अमेरिका के रक्षा बजट तक सीमित नहीं रहा।
Hormuz संकट के कारण तेल और गैस की कीमतों में बड़ा उछाल आया।
Centre for Research on Energy and Clean Air के अगस्त 2026 के आकलन के मुताबिक युद्ध के बाद छह महीनों में समुद्री रास्ते से जीवाश्म ईंधन आयात करने वाले देशों ने युद्ध से पहले बाजार की अपेक्षा के मुकाबले लगभग **330 अरब डॉलर अतिरिक्त** खर्च किए।
रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान कच्चे तेल की कीमतें युद्ध-पूर्व अपेक्षाओं से औसतन 35 प्रतिशत ज्यादा रहीं।
यानी मिसाइलों और फाइटर जेट का बिल अमेरिका चुका रहा है, लेकिन ऊर्जा संकट की आर्थिक कीमत दुनिया के कई दूसरे देशों को भी चुकानी पड़ी।
₹3,20,407 करोड़ से भी बड़ी है कहानी
इसलिए ₹3,20,407 करोड़ का आंकड़ा बेहद बड़ा होने के बावजूद ईरान युद्ध की पूरी आर्थिक तस्वीर नहीं दिखाता।
हथियारों की खपत, सैन्य ऑपरेशन, नष्ट उपकरण, युद्धपोतों की तैनाती और इजरायल को सैन्य सहायता जोड़ने पर पहले 120 दिनों की प्रत्यक्ष अमेरिकी लागत का स्वतंत्र अनुमान $103.3 अरब तक पहुंचता है।
और यह भी कोई अंतिम सरकारी ऑडिट नहीं है।
युद्ध से जुड़ी बहुत सी सैन्य जानकारी गोपनीय है, हथियारों की वास्तविक संख्या सार्वजनिक नहीं की गई है और भविष्य में नए डेटा के साथ अनुमान बदल सकते हैं।
लेकिन उपलब्ध आंकड़े एक बात जरूर बताते हैं—आधुनिक युद्ध में केवल मिसाइल का बटन नहीं दबता, उसके साथ अरबों डॉलर भी खर्च होते हैं।
Tomahawk से लेकर JASSM, ATACMS, PrSM और एंटी-रेडिएशन मिसाइलों तक हजारों आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल ने इस संघर्ष को अमेरिका के लिए बेहद महंगा बना दिया है।
और अगर दीर्घकालिक आर्थिक असर को भी जोड़ा जाए तो ट्रंप के ईरान युद्ध का वास्तविक बिल आने वाले वर्षों तक बढ़ता रह सकता है।