नेपाल : तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के बाद आध्यात्मिक गुरु और ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने इस त्रासदी को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया है। रविवार को काठमांडू में आयोजित ‘इन सॉलिडेरिटी विद नेपाल’ कार्यक्रम में सद्गुरु ने कहा कि ऐसी भयावह घटनाओं के बाद लोग अक्सर उनके पीछे कोई दैवीय, दार्शनिक या रहस्यमय कारण तलाशने लगते हैं, लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि भौतिक दुनिया में होने वाली घटनाओं के पीछे भौतिक नियम काम करते हैं।
सद्गुरु ने स्वीकार किया कि उनकी बात कुछ लोगों को कठोर लग सकती है, क्योंकि बड़ी त्रासदी के बाद इंसान स्वाभाविक रूप से यह जानना चाहता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। लेकिन उन्होंने जोर दिया कि प्राकृतिक आपदाओं को केवल दैवीय कारणों से जोड़ने के बजाय उनके भौतिक और वैज्ञानिक कारणों को समझना जरूरी है।
काठमांडू में नेपाल के साथ दिखाई एकजुटता
‘इन सॉलिडेरिटी विद नेपाल’ कार्यक्रम 30 अगस्त को काठमांडू के पास ललितपुर में आयोजित किया गया। ईशा फाउंडेशन के मुताबिक इसका उद्देश्य नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के बाद प्रभावित लोगों के साथ एकजुटता जताना और पुनर्निर्माण की कोशिशों में समर्थन देना था।
कार्यक्रम में सद्गुरु ने नेपाल से अपने लंबे जुड़ाव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पिछले करीब दो दशकों में नेपाल उनके दिल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
उन्होंने नेपाल के लोगों के साहस की तारीफ करते हुए कहा कि पिछले लगभग 10 वर्षों में देश ने कई मुश्किलों और झटकों का सामना किया है, लेकिन नेपाल के लोगों ने बार-बार मजबूती के साथ वापसी की है।
'हर कोई दैवीय कारण तलाशना चाहता है'
सद्गुरु के संबोधन का सबसे चर्चित हिस्सा प्राकृतिक आपदा के कारणों को लेकर रहा।
उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में लोग अलग-अलग दर्शन और रहस्यमय संभावनाओं के जरिए यह समझने की कोशिश करते हैं कि इतना बड़ा हादसा आखिर क्यों हुआ।
सद्गुरु ने कहा कि यह सुनने में कठोर लग सकता है क्योंकि लोग इसके पीछे दैवीय कारण तलाशना चाहते हैं, लेकिन भौतिक दुनिया की घटनाएं भौतिक नियमों से संचालित होती हैं।
उनका संदेश प्राकृतिक आपदाओं के वैज्ञानिक पहलुओं को समझने और उनसे भविष्य के लिए सबक लेने पर केंद्रित था।
नेपाल में कैसे मची इतनी बड़ी तबाही?
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में अचानक आई फ्लैश फ्लड और मलबे के तेज बहाव ने व्यापक तबाही मचाई। शुरुआती वैज्ञानिक आकलनों और रिपोर्टों में ग्लेशियर से जुड़ी घटना को इस विनाशकारी बाढ़ का कारण बताया गया है। पानी और मलबे की विशाल धारा ने रास्ते में आने वाले घरों, सड़कों और पुलों को नुकसान पहुंचाया।
आपदा का असर इतना व्यापक रहा कि चार दिन बाद भी राहत और बचाव अभियान जारी है। 30 अगस्त की रिपोर्टों में नेपाल और तिब्बत को मिलाकर मृतकों का आंकड़ा 800 के आसपास पहुंचने और 3,000 से अधिक लोगों के लापता होने की बात सामने आई है। आंकड़े राहत अभियान के साथ लगातार बदल रहे हैं।
ईशा फाउंडेशन के 77 लोग भी लापता
इस आपदा से सद्गुरु और ईशा फाउंडेशन का सीधा जुड़ाव भी है। फाउंडेशन के कैलाश यात्रा समूह के 77 सदस्य बाढ़ के समय इमिग्रेशन सेंटर में मौजूद थे।
सद्गुरु ने पहले जानकारी दी थी कि जब अचानक बाढ़ आई, तब समूह कैलाश मानसरोवर यात्रा से लौट रहा था और इमिग्रेशन ऑफिस में था। बाढ़ के बाद इमारत और आसपास का बड़ा हिस्सा पानी और मलबे की चपेट में आ गया।
ईशा फाउंडेशन के मुताबिक 77 सदस्यों के बारे में अभी तक स्पष्ट आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है। फाउंडेशन उनके परिवारों और संबंधित अधिकारियों के संपर्क में है।
सद्गुरु हुए थे भावुक
आपदा के अगले दिन सद्गुरु का एक वीडियो सामने आया था जिसमें वह लापता तीर्थयात्रियों की जानकारी देते हुए भावुक दिखाई दिए थे।
उन्होंने बताया था कि संचार व्यवस्था ठप होने, फोन बंद होने और सड़कें टूटने के कारण प्रभावित स्थान तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था।
उन्होंने प्रभावित लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा था कि ईशा फाउंडेशन की टीम बचाव प्रयासों में हर संभव सहयोग के लिए तैयार है।
उनका कहना था कि इस मुश्किल समय में उन परिवारों के दर्द को समझा जा सकता है जिन्हें अपने प्रियजनों की कोई जानकारी नहीं मिल रही है।
तिब्बत में क्यों रुके सद्गुरु?
ईशा फाउंडेशन ने बताया कि आपदा के बाद सद्गुरु तुरंत तिब्बत से बाहर नहीं निकले। संगठन के अनुसार उस समय 700 से ज्यादा ईशा सदस्य तिब्बत में मौजूद थे और सद्गुरु उनकी सुरक्षित निकासी सुनिश्चित करने के लिए वहां रुके रहे।
फाउंडेशन की कोऑर्डिनेटर मां गंभीरी के मुताबिक सद्गुरु प्रभावित क्षेत्र के करीब जाकर स्थिति समझना चाहते थे और ऐसा सुरक्षित जमीनी रास्ता तलाशने की कोशिश कर रहे थे जिससे बाकी सदस्य भी बाहर निकल सकें।
मनीषा कोइराला ने उठाया ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा
इस एकजुटता कार्यक्रम में नेपाली अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने भी हिस्सा लिया। उन्होंने नेपाल की त्रासदी को जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की व्यापक चुनौती से जोड़ते हुए कहा कि अब यह सोचने की जरूरत है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं के खतरे को कैसे कम किया जाए।
उन्होंने भारत, चीन और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों के बीच सहयोग की जरूरत पर जोर दिया।
मनीषा ने कहा कि क्षेत्र के देश एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं और भविष्य की आपदाओं से बचाव के लिए मिलकर कदम उठाने की जरूरत है।
पर्यटन बंद न करने की अपील
मनीषा कोइराला ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से नेपाल को लगातार समर्थन देने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि नेपाल को दुनिया केवल प्राकृतिक आपदाओं से जूझने वाले देश के रूप में न देखे।
उन्होंने पर्यटकों से नेपाल आते रहने का आग्रह किया और पर्यटन को देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि नेपाल-तिब्बत सीमा के एक क्षेत्र में आपदा आने का मतलब यह नहीं है कि पूरे देश की यात्रा बंद कर दी जाए।
प्राकृतिक आपदा से सबक लेने का संदेश
सद्गुरु के बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही रहा कि उन्होंने इस आपदा को धार्मिक व्याख्या तक सीमित करने के बजाय प्रकृति के नियमों और मानवीय तैयारी के नजरिए से देखने की बात कही।
हिमालयी क्षेत्र पहले से ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को लेकर संवेदनशील माना जाता है। ग्लेशियरों के पिघलने से ग्लेशियल झीलों और उनसे जुड़ी अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ने की बात वैज्ञानिक लंबे समय से कहते रहे हैं। हाल की नेपाल-तिब्बत आपदा के संदर्भ में भी ग्लेशियर से जुड़ी घटना की चर्चा सामने आई है।
ऐसे में सद्गुरु का संदेश है कि त्रासदी के पीछे कोई रहस्यमय कारण खोजने के साथ वास्तविक भौतिक कारणों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
नेपाल में राहत अभियान अभी जारी है और बड़ी संख्या में परिवार अपने लापता परिजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं। सद्गुरु ने इस मुश्किल समय में नेपाल के लोगों के साथ एकजुटता जताते हुए उनके साहस की सराहना की है। साथ ही उनका कहना है कि ऐसी आपदाओं को समझने के लिए वैज्ञानिक और भौतिक वास्तविकताओं पर ध्यान देना जरूरी है, ताकि भविष्य में जोखिम को कम करने के लिए बेहतर तैयारी की जा सके।