भावनगर। भारत में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनकी परंपराएं और मान्यताएं लोगों को हैरान कर देती हैं। ऐसा ही एक स्थान गुजरात के भावनगर जिले के पालीताना में स्थित **शत्रुंजय पर्वत** है। सफेद संगमरमर से बने सैकड़ों जैन मंदिरों से सजी यह पहाड़ी दूर से किसी विशाल मंदिर नगरी की तरह दिखाई देती है। इसे जैन धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में गिना जाता है। यहां मंदिरों की संख्या को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। गुजरात सरकार के भावनगर जिला प्रशासन के मुताबिक शत्रुंजय पहाड़ियों पर करीब **863 संगमरमर के मंदिर** हैं, जबकि गुजरात पर्यटन इसे छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 900 मंदिरों वाले विशाल धार्मिक परिसर के रूप में प्रस्तुत करता है।
इस पर्वत की सबसे अनोखी बात इसके मंदिरों की संख्या ही नहीं है। यहां एक सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा के तहत रात में किसी को भी पहाड़ी पर ठहरने की अनुमति नहीं है। श्रद्धालु हों या मंदिरों से जुड़े पुजारी, सभी को शाम होने से पहले नीचे लौटना होता है। जिला प्रशासन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार मंदिर नगरी को देवताओं का निवास माना जाता है, इसलिए यहां रात बिताने की परंपरा नहीं है।
क्यों खाली हो जाती है पूरी पहाड़ी?
जैन धार्मिक मान्यता में शत्रुंजय पर्वत अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस मंदिर नगरी को मानव निवास के बजाय दिव्य स्थान माना गया है। इसी कारण श्रद्धालु यहां पूजा और दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन रात में निवास नहीं करते। सूर्यास्त के आसपास मंदिर परिसर खाली होने लगता है और लोगों को नीचे पालीताना की ओर लौटना पड़ता है।
रात में ठहरने पर रोक के पीछे केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक और सुरक्षा कारण भी जुड़े हैं। गुजरात हाई कोर्ट के एक फैसले में उद्धृत भावनगर जिला प्रशासन की अधिसूचना में शत्रुंजय पहाड़ी पर रात्रि प्रवेश और रात्रि प्रवास पर रोक का उल्लेख है। इसमें धार्मिक स्थलों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा जैसे कारण भी बताए गए थे।
जैन धर्म के सबसे पवित्र तीर्थों में शामिल
शत्रुंजय पर्वत जैन समुदाय के लिए बेहद खास है। सरकारी विवरण के अनुसार 24 जैन तीर्थंकरों में से भगवान नेमिनाथ को छोड़कर 23 तीर्थंकरों ने इस पहाड़ी को अपनी यात्राओं से पवित्र किया माना जाता है। यहां का मुख्य मंदिर प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव यानी आदिनाथ को समर्पित है।
गुजरात पर्यटन के मुताबिक जैन परंपरा में मान्यता है कि आदिनाथ ने शत्रुंजय पर्वत पर ध्यान किया था। यहां के मंदिर एक साथ नहीं बने, बल्कि इनके निर्माण और पुनर्निर्माण का इतिहास कई शताब्दियों में फैला हुआ है। गुजरात पर्यटन इस मंदिर समूह के विकास को लगभग 900 वर्षों की अवधि से जोड़ता है।
हजारों सीढ़ियां चढ़कर होते हैं दर्शन
शत्रुंजय पर्वत की यात्रा आसान नहीं है। मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब **3,500 सीढ़ियां** चढ़नी पड़ती हैं। पहाड़ी पर चढ़ते समय रास्ते में छोटे-बड़े धार्मिक स्थल और विश्राम के स्थान दिखाई देते हैं।
सुबह के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी यात्रा शुरू करते हैं ताकि मंदिरों में दर्शन करने के बाद समय रहते वापस नीचे पहुंच सकें। गुजरात पर्यटन की वेबसाइट पर शत्रुंजय के लिए सामान्य विजिटिंग टाइम सुबह 6:30 बजे से शाम 6 बजे तक दिया गया है।
संगमरमर की नक्काशी बनाती है बेहद खास
शत्रुंजय पर्वत पर बने मंदिर अपनी वास्तुकला और बारीक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं। सफेद संगमरमर से बने मंदिरों के शिखर जब सूरज की रोशनी में चमकते हैं तो पूरी पहाड़ी का दृश्य बेहद आकर्षक दिखाई देता है। मंदिर अलग-अलग समूहों में बने हैं और प्रत्येक समूह में मुख्य मंदिर के साथ कई छोटे मंदिर मौजूद हैं।
पालीताना को इसी विशाल धार्मिक विरासत के कारण 'सिटी ऑफ टेंपल्स' यानी मंदिरों का शहर भी कहा जाता है। शत्रुंजय के साथ झारखंड के शिखरजी को भी जैन समुदाय के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में गिना जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
शत्रुंजय पर्वत पर सामान्य दिनों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, लेकिन कार्तिक पूर्णिमा के समय यहां विशेष धार्मिक महत्व रहता है। इस दौरान पालीताना में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है और आसपास ठहरने के स्थान भी तेजी से भर जाते हैं।
शत्रुंजय पर्वत की सबसे खास पहचान यही है कि दिनभर हजारों श्रद्धालुओं की आवाजाही के बावजूद शाम होते-होते मंदिरों वाली पहाड़ी शांत हो जाती है। धार्मिक आस्था के अनुसार रात का समय इस पवित्र पर्वत पर मानव निवास के लिए नहीं माना गया है। सैकड़ों मंदिर, हजारों सीढ़ियां और सदियों पुरानी यह परंपरा शत्रुंजय को भारत के सबसे अनोखे धार्मिक स्थलों में शामिल करती है।