धर्म डेस्क: गणेशोत्सव हो या गणपति विसर्जन, भगवान गणेश के दर्शन होते ही भक्तों की जुबान पर सबसे पहले “गणपति बप्पा मोरया” का जयकारा आता है। महाराष्ट्र से शुरू हुआ यह उद्घोष आज देश-दुनिया में भगवान गणेश की भक्ति की पहचान बन चुका है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान गणेश को ‘बप्पा’ क्यों कहा जाता है और उनके नाम के साथ ‘मोरया’ कैसे जुड़ा? इसके पीछे भगवान और उनके एक परम भक्त से जुड़ी बेहद रोचक धार्मिक परंपरा बताई जाती है।
कौन थे मोरया गोसावी?
प्रचलित मान्यता के अनुसार ‘मोरया’ शब्द का संबंध भगवान गणेश के महान भक्त मोरया गोसावी से है। वह गणपति संप्रदाय के प्रमुख संतों में माने जाते हैं। महाराष्ट्र में उनकी गणेश भक्ति से जुड़ी कई कथाएं आज भी सुनाई जाती हैं।
मोरया गोसावी ने अपना जीवन भगवान गणेश की आराधना में समर्पित कर दिया था। मान्यता है कि उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि लोगों ने उनके नाम को भी भगवान गणेश के जयकारे के साथ जोड़ दिया।
मोरगांव के गणपति से जुड़ी आस्था
मोरया गोसावी की कथा महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित मोरगांव के मयूरेश्वर गणपति मंदिर से भी जुड़ी है। यह मंदिर अष्टविनायक के आठ प्रमुख गणेश मंदिरों में शामिल है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार मोरया गोसावी नियमित रूप से भगवान मयूरेश्वर के दर्शन और पूजा करते थे। उन्होंने लंबे समय तक कठोर साधना की। उनकी इसी अनन्य भक्ति के कारण वह गणेश भक्तों के बीच अत्यंत सम्मानित हुए।
कैसे बना ‘गणपति बप्पा मोरया’?
लोकमान्यता के मुताबिक मोरया गोसावी की गणपति भक्ति को सम्मान देने के लिए भक्तों ने भगवान गणेश के नाम के साथ उनका नाम लेना शुरू किया। समय के साथ “गणपति बप्पा मोरया” महाराष्ट्र में लोकप्रिय जयकारा बन गया।
यहां ‘बप्पा’ शब्द भगवान गणेश के लिए प्रेम और आत्मीयता से इस्तेमाल किया जाता है। मराठी संस्कृति में बप्पा का भाव पिता या अत्यंत प्रिय संरक्षक से जुड़ा है। इस तरह जयकारे में भगवान और उनके भक्त दोनों के प्रति श्रद्धा दिखाई देती है।
हालांकि ‘मोरया’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग धार्मिक और लोक परंपराएं भी प्रचलित हैं। इसलिए मोरया गोसावी से जुड़ी कथा को एक लोकप्रिय मान्यता के रूप में समझना उचित है।
विसर्जन में क्यों कहते हैं ‘पुढच्या वर्षी लवकर या’?
गणपति विसर्जन के दौरान भक्त अक्सर कहते हैं—“गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या।” मराठी में ‘पुढच्या वर्षी लवकर या’ का अर्थ है—अगले वर्ष जल्दी आइए।
दरअसल गणेशोत्सव के दौरान भक्त बप्पा को अपने परिवार के सदस्य की तरह घर में स्थापित करते हैं। कई दिनों तक पूजा-अर्चना के बाद जब विसर्जन का समय आता है तो विदाई का माहौल भावुक हो जाता है। भक्त भगवान गणेश से अगले वर्ष फिर जल्दी आने की प्रार्थना करते हैं।
भक्ति और आत्मीयता का जयकारा
“गणपति बप्पा मोरया” केवल धार्मिक उद्घोष नहीं बल्कि महाराष्ट्र की गणेश भक्ति और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। सार्वजनिक गणेशोत्सव से लेकर घर में गणपति स्थापना तक हर जगह यह जयकारा सुनाई देता है।
इस जयकारे के पीछे छिपी मोरया गोसावी की कथा यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति में भक्त और भगवान का संबंध इतना गहरा हो सकता है कि सदियों बाद भी दोनों के नाम एक साथ श्रद्धा से लिए जाते रहें।
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