Satyanarayan Ashtakam:पौष पूर्णिमा की शुभ तिथि पर करें श्री सत्यनारायणाष्टकम् स्तोत्र का पाठ, मिलेंगे शुभ परिणाम
Satyanarayan Ashtakam: पौष पूर्णिमा तिथि को अति पवित्र तिथि माना गया है. इस तिथि का बहुत महत्व है. इस दिन भक्त गंगा स्नान कर दान आदि करते हैं. पौष पूर्णिमा पर श्री सत्यनारायण भगवान की उपासना करने से जीवन के कष्ट तो मिटते ही है इसके साथ ही भक्त की सभी इच्छाओं की पूर्ति भी हो जाती है. घर परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है. हालांकि, गुरुवार के दिन, पूर्णिमा तिथि पर और ऐसी ही अन्य शुभ दिन या तिथियों पर भगवान सत्यनारायण की पूजा करने और कथा सुनाने का विधान है. सत्यनारायण भगवान विष् जी का सत्य स्वरूप है जिनकी पौष पूर्णिमा पर पूरी करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है. पूजा के समय श्री सत्यनारायणाष्टकम् स्तोत्र का पाठ करने से शुभ परिणामों की प्राप्ति होती है. व्यक्ति के पाप कट जाते हैं. ध्यान रहे कि श्रीसत्यनारायणाष्टकम् स्तोत्र का पाठ शब्दों के सही उच्चारण के साथ करनी चाहिए. आइए श्रीसत्यनारायणाष्टकम् स्तोत्र का पाठ करें|
॥श्री सत्यनारायणाष्टकम् स्तोत्र॥
आदिदेवं जगत्कारणं श्रीधरं लोकनाथं विभुं व्यापकं शंकरम्।
सर्वभक्तेष्टदं मुक्तिदं माधवं सत्यनारायणं विष्णुमीशम्भजे॥
सर्वदा लोककल्याणपारायणं देवगोविप्ररक्षार्थसद्विग्रहम्।
दीनहीनात्मभक्ताश्रयं सुन्दरम् श्रीसत्यनारायणाष्टकम्॥
दक्षिणे यस्य गंगा शुभा शोभते राजते सा रमा यस्य वामे सदा।
यः प्रसन्नाननो भाति भव्यश्च तं श्रीसत्यनारायणाष्टकम्॥
संकटे संगरे यं जनः सर्वदा स्वात्मभीनाशनाय स्मरेत् पीडितः।
पूर्णकृत्यो भवेद् यत्प्रसादाच्च तं श्रीसत्यनारायणाष्टकम्॥
वाञ्छितं दुर्लभं यो ददाति प्रभुः साधवे स्वात्मभक्ताय भक्तिप्रियः।
सर्वभूताश्रयं तं हि विश्वम्भरं श्रीसत्यनारायणाष्टकम्॥
ब्राह्मणः साधुवैश्यश्च तुंगध्वजो येऽभवन् विश्रुता यस्य भक्त्यामराः।
लीलया यस्य विश्वं ततं तं विभुं श्रीसत्यनारायणाष्टकम्॥
येन चाब्रम्हाबालतृणं धार्यते सृज्यते पाल्यते सर्वमेतज्जगत्।
भक्तभावप्रियं श्रीदयासागरं श्रीसत्यनारायणाष्टकम्॥
सर्वकामप्रदं सर्वदा सत्प्रियं वन्दितं देववृन्दैर्मुनीन्द्रार्चितम्।
पुत्रपौत्रादिसर्वेष्टदं शाश्वतं श्रीसत्यनारायणाष्टकम्॥
अष्टकं सत्यदेवस्य भक्त्या नरः भावयुक्तो मुदा यस्त्रिसन्ध्यं पठेत्।
तस्य नश्यन्ति पापानि तेनाग्निना इन्धनानीव शुष्काणि सर्वाणि वै॥