धर्म: जगत के कल्याण की कामना से भगवान सदाशिव के विभिन्न कल्पों में अनेक अवतार हुए। इनमें उनके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान अवतार प्रमुख हैं और यही भगवान शिव की पांच विशिष्ट मूर्तियां हैं। भगवान शिव का विष्णु जी से अनन्य प्रेम है। शिव तामस मूर्ति हैं और विष्णु सत्व मूर्ति, मगर एक-दूसरे का ध्यान करने से शिव श्वेत वर्ण के और विष्णु श्याम वर्ण के हो गए।
ऐसा माना जाता है कि एक बार भगवान विष्णु ने अत्यंत मनोहर किशोर का रूप धारण किया। भगवान विष्णु द्वारा धारण किए इस मनोहर रूप को देखने के लिए चतुरानन ब्रह्मा, बहुमुख वाले अनंत, सहस्राक्ष इंद्र आदि देवता आए और प्रसन्न हुए। सभी देवताओं ने एकमुख वालों की अपेक्षा भगवान के रूप-माधुर्य का अधिक आनंद लिया। सभी को उस रूप का आंनद लेते देख भगवान शिव सोचने लगे कि यदि मेरे भी अनेक मुख और नेत्र होते तो मैं भी भगवान के इस किशोर रूप का सबसे अधिक दर्शन करता। भगवान शिव के मन में इस इच्छा के उत्पन्न होते ही वे पंचमुख हो गए।
पंचानन’ और ‘पंचवक्त्र’ शिव:
इच्छा से उत्पन्न भगवान शिव के ये पांच मुख- सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर तथा ईशान हुए और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र बन गए। भगवान शिव तभी से ‘पंचानन’ या ‘पंचवक्त्र’ कहलाने लगे। भगवान शिव के ये पांच मुख चार दिशाओं और पांचवां मध्य में है। भगवान शिव का पहला मुख पश्चिम दिशा में है, जो है ‘सद्योजात’। यह बालक के समान स्वच्छ, शुद्ध एवं निर्विकार है। उत्तर दिशा का मुख ‘वामदेव’ है। वामदेव अर्थात विकारों का नाश करने वाला। दक्षिण मुख ‘अघोर’ है। अघोर का अर्थ है- निंदित कर्म करने वाला। निंदित कर्म करने वाला भी भगवान शिव की कृपा से निंदित कर्म को शुद्ध बना लेता है। भगवान शिव के पूर्व मुख का नाम ‘तत्पुरुष’ है। तत्पुरुष का अर्थ है- अपनी आत्मा में स्थित रहना। वहीं अंतिम ऊर्ध्व मुख का नाम ‘ईशान’ है। ईशान का अर्थ है- स्वामी। भगवान शंकर के पांच मुखों में ऊर्ध्व मुख ईशान दुग्ध जैसे रंग का, पूर्व मुख तत्पुरुष पीत वर्ण का, दक्षिण मुख अघोर नील वर्ण का, पश्चिम मुख सद्योजात श्वेत वर्ण का और उत्तर मुख वामदेव कृष्ण वर्ण का है।
पंचमुख के पंचकृत्य:
शिव पुराण में भगवान शिव कहते हैं, “सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह, ये पांच कृत्य (कार्य) मेरे पांचों मुखों द्वारा धारित हैं।” इस बात से स्पष्ट होता है कि भगवान शिव की पांच विशिष्ट मूर्तियां (मुख) विभिन्न कल्पों में लिए गए उनके अवतार हैं। माना गया है कि जगत के कल्याण की कामना से भगवान सदाशिव के विभिन्न कल्पों में अनेक अवतार हुए, जिनमें से सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान अवतार प्रमुख हैं। ये ही भगवान शिव की पांच विशिष्ट मूर्तियां (मुख) हैं। अपने पांच मुख रूपी विशिष्ट मूर्तियों का रहस्य माता अन्नपूर्णा को बताते हुए भगवान शिव कहते हैं, “ब्रह्मा मेरे अनुपम भक्त हैं। उनकी भक्ति के कारण मैं प्रत्येक कल्प में दर्शन देकर उनकी समस्या का समाधान किया करता हूं।”
पहला अवतार ‘सद्योजात’:
श्वेतलोहित नामक उन्नीसवें कल्प में ब्रह्मा सृष्टि रचना के ज्ञान के लिए परब्रह्म का ध्यान कर रहे थे। तब भगवान शंकर ने उन्हें अपने पहले अवतार ‘सद्योजात’ रूप में दर्शन दिए। इसमें वे एक श्वेत और लोहित वर्ण वाले शिखाधारी कुमार के रूप में प्रगट हुए और ‘सद्योजात मंत्र’ देकर ब्रह्मा जी को सृष्टि रचना के योग्य बनाया।
दूसरा अवतार ‘वामदेव’:
रक्त नामक बीसवें कल्प में रक्त वर्ण ब्रह्मा पुत्र की कामना से परमेश्वर का ध्यान कर रहे थे। उसी समय उनसे एक पुत्र प्रगट हुआ, जिसने लाल रंग के वस्त्र-आभूषण धारण किए थे। यह भगवान शंकर का दूसरा अवतार ‘वामदेव’ रूप था, जो ब्रह्मा जी के जीव-सुलभ अज्ञान को हटाने और सृष्टि रचना की शक्ति देने के लिए हुआ था।
तीसरा अवतार ‘तत्पुरुष’:
भगवान शिव का ‘तत्पुरुष’ नामक तीसरा अवतार पीतवासा नाम के इक्कीसवें कल्प में हुआ। इसमें ब्रह्मा पीले वस्त्र, पीली माला और पीला चंदन धारण कर जब सृष्टि रचना के लिए व्यग्र होने लगे, तब भगवान शंकर ने उन्हें ‘तत्पुरुष’ रूप में दर्शन देकर इस गायत्री मंत्र का उपदेश किया- ‘तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रयोदयात्।’ इस मंत्र के अद्भुत प्रभाव से ब्रह्मा सृष्टि की रचना में समर्थ हुए।
शिव नामक कल्प में भगवान शिव का ‘अघोर’ नामक चौथा अवतार हुआ। ब्रह्मा जब सृष्टि रचना के लिए चिंतित हुए, तब भगवान ने उन्हें ‘अघोर’ रूप में दर्शन दिए। भगवान शिव का यह अघोर रूप महाभयंकर है, जिसमें वे कृष्ण-पिंगल वर्ण वाले, काला वस्त्र, काली पगड़ी, काला यज्ञोपवीत और काला मुकुट धारण किए हुए हैं तथा मस्तक पर चंदन भी काले रंग का है। भगवान शंकर ने ब्रह्मा जी को ‘अघोर मंत्र’ दिया, जिससे वे सृष्टि रचना में समर्थ हुए। यह मंत्र अत्यंत रहस्यमयी और शक्तिशाली है।
पांचवां अवतार ‘ईशान’:
विश्व रूप नामक कल्प में भगवान शिव का ‘ईशान’ नामक पांचवां अवतार हुआ। ब्रह्मा जी पुत्र की कामना से मन-ही-मन शिव जी का ध्यान कर रहे थे। उसी समय सिंहनाद करती हुईं सरस्वती के साथ भगवान ‘ईशान’ प्रगट हुए। शिव जी के इस अवतार का रंग स्फटिक के समान उज्ज्वल वर्ण था। अवतरण के बाद भगवान ईशान ने सरस्वती सहित ब्रह्मा जी को सन्मार्ग का उपदेश देकर कृतार्थ किया। सावन माह में भगवान शिव के इन पंचमुख अवतार की कथा पढ़ने और सुनने का बहुत माहात्म्य है। यह प्रसंग मनुष्य के अंदर शिव भक्ति जाग्रत करने के साथ ही उसकी समस्त मनोकामनाओं को पूरा कर परम गति देने वाला भी है।