Religion धर्म : घर की दीवारों पर लगी तस्वीरें केवल यादें ही नहीं होतीं, बल्कि उनसे जुड़ी भावनाएं भी परिवार के वातावरण को प्रभावित करती हैं। जब कोई प्रिय व्यक्ति इस दुनिया से चला जाता है, तो उसकी तस्वीर घर में एक भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन जाती है। सनातन परंपरा और वास्तु मान्यताओं के अनुसार, पूर्वजों की तस्वीरों को लगाने के लिए कुछ नियम और मर्यादाएं बताई गई हैं, जिनका पालन करने से घर में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने की बात कही जाती है।
धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं में विशेष रूप से गरुड़ पुराण में जीवन, मृत्यु और पितरों से जुड़े कई नियमों का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि यदि पूर्वजों की तस्वीर सही स्थान और दिशा में लगाई जाए तो घर में शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है, जबकि गलत स्थान पर लगाने से मानसिक अशांति या नकारात्मक प्रभाव बढ़ सकते हैं। हालांकि इन बातों को धार्मिक और परंपरागत दृष्टिकोण से देखा जाता है।
वास्तु और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्वजों की तस्वीर लगाने के लिए दक्षिण दिशा को सबसे उपयुक्त माना गया है। कहा जाता है कि दक्षिण दिशा पितरों से जुड़ी होती है, इसलिए इस दिशा की दीवार पर तस्वीर लगाना शुभ माना जाता है। तस्वीर इस प्रकार लगाई जानी चाहिए कि पूर्वजों का मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर हो, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
मंदिर या पूजा स्थान में पूर्वजों की तस्वीर रखना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि पूजा स्थल केवल देवी-देवताओं के लिए होता है। इसके अलावा रसोई घर, सीढ़ियों के पास या अधिक आवाजाही वाले स्थानों पर भी तस्वीर लगाने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि ऐसी जगहों पर तस्वीरों का उचित सम्मान नहीं हो पाता।
वास्तु के अनुसार जीवित व्यक्तियों की तस्वीरों के साथ पूर्वजों की तस्वीरें नहीं लगानी चाहिए। दोनों के लिए अलग स्थान रखना बेहतर माना जाता है। इसी तरह घर के ब्रह्मस्थान यानी मध्य भाग में भी ऐसी तस्वीरें लगाने से परहेज करने की बात कही गई है।
तस्वीर लगाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह साफ और सम्मानजनक स्थान पर हो। बहुत अधिक तस्वीरें एक साथ लगाने से भी बचना चाहिए। ऐसी तस्वीर चुननी चाहिए जिसमें पूर्वज शांत और प्रसन्न मुद्रा में दिखें। तस्वीरों की नियमित सफाई और आसपास की जगह को व्यवस्थित रखना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में यह कहा गया है कि पूर्वजों की तस्वीर केवल स्मृति नहीं होती, बल्कि यह परिवार की जड़ों और परंपराओं से जुड़ाव का प्रतीक होती है। इसलिए इसे सही स्थान पर सम्मान के साथ रखना ही उचित माना गया है।