धर्म : श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की पूजा की जाती है और भक्त उपवास रखकर भगवान की आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिस घर में श्रद्धा और विधि-विधान से जन्माष्टमी का व्रत किया जाता है, वहां भगवान कृष्ण की कृपा बनी रहती है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को रखने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और परिवार पर भगवान का आशीर्वाद रहता है।
कई धार्मिक ग्रंथों में जन्माष्टमी व्रत की महिमा का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। हालांकि अकालमृत्यु से बचाव जैसी मान्यताएं धार्मिक आस्था का हिस्सा हैं और इन्हें श्रद्धा के रूप में देखा जाता है।
4 या 5 सितंबर कब मनाई जाएगी जन्माष्टमी
साल 2026 में जन्माष्टमी की तारीख को लेकर लोगों के बीच भ्रम बना हुआ है कि व्रत 4 सितंबर को रखा जाए या 5 सितंबर को। पंचांग के अनुसार, कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर 2026 को शुरू होगी और 5 सितंबर की मध्यरात्रि के बाद समाप्त होगी। इसी वजह से अधिकतर लोग 4 सितंबर को जन्माष्टमी का व्रत रखेंगे।
वहीं कुछ वैष्णव परंपराओं और मंदिरों में 5 सितंबर को भी जन्माष्टमी मनाई जा सकती है। अलग-अलग परंपराओं के अनुसार पूजा और व्रत की तिथि में अंतर देखने को मिलता है।
जन्माष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी की पूजा रात 12 बजे के आसपास की जाती है।
2026 में निशीथ काल यानी मध्यरात्रि पूजा का समय 4 सितंबर की रात से 5 सितंबर की शुरुआत तक माना जा रहा है। इस दौरान भगवान कृष्ण का अभिषेक, पूजा, आरती और जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
भक्त इस दौरान भगवान कृष्ण को पंचामृत से स्नान कराते हैं, नए वस्त्र पहनाते हैं और झूले में विराजमान करते हैं। इसके बाद माखन-मिश्री, फल, मिठाई और अन्य भोग अर्पित किए जाते हैं।
जन्माष्टमी व्रत का महत्व
भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। उनके जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली जन्माष्टमी पर उपवास रखने की परंपरा सदियों पुरानी है।
मान्यता है कि जन्माष्टमी व्रत करने से मन की शुद्धि होती है और भक्तों को भगवान कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन लोग भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं को याद करते हैं और भजन-कीर्तन करते हैं।
कई लोग इस दिन निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार करते हैं। व्रत रखने की विधि व्यक्ति की क्षमता और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
जन्माष्टमी व्रत में क्या खाएं
जन्माष्टमी के उपवास में आमतौर पर अनाज का सेवन नहीं किया जाता। भक्त फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, कुट्टू और सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन खाते हैं।
भगवान कृष्ण को दूध और उससे बनी चीजें प्रिय मानी जाती हैं, इसलिए भोग में माखन, मिश्री, खीर, पंचामृत और दूध से बनी मिठाइयां विशेष रूप से शामिल की जाती हैं।
जन्माष्टमी व्रत में इन बातों का रखें ध्यान
* सुबह स्नान करके भगवान कृष्ण का ध्यान करें
* घर के मंदिर की साफ-सफाई करें
* भगवान कृष्ण को नए वस्त्र पहनाएं
* पूजा में तुलसी दल जरूर शामिल करें
* सात्विक भोजन करें
* क्रोध और नकारात्मक विचारों से बचें
धार्मिक मान्यता के अनुसार जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण का नाम जपने और उनकी कथा सुनने का विशेष महत्व होता है।
व्रत कब खोलें
जन्माष्टमी व्रत खोलने यानी पारण को लेकर भी अलग-अलग परंपराएं हैं। कई भक्त भगवान कृष्ण के जन्म के बाद मध्यरात्रि पूजा और प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रत खोलते हैं, जबकि कुछ लोग अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण करते हैं।
पारण का समय स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार माना जाता है।
घर में जन्माष्टमी करने से क्या मिलता है लाभ
धार्मिक विश्वास के अनुसार जिस घर में भगवान कृष्ण की भक्ति और पूजा होती है, वहां प्रेम, शांति और खुशहाली बनी रहती है। जन्माष्टमी का व्रत केवल उपवास नहीं बल्कि भगवान कृष्ण के आदर्शों को जीवन में अपनाने का अवसर भी माना जाता है।
भगवान कृष्ण ने अपने जीवन में धर्म, कर्म और सत्य का संदेश दिया। इसलिए जन्माष्टमी पर उनकी पूजा के साथ उनके विचारों को अपनाने का भी संकल्प लिया जाता है।
इस बार जन्माष्टमी पर भक्त भगवान कृष्ण की पूजा, व्रत और भक्ति के साथ इस पर्व को श्रद्धा और उत्साह से मनाएंगे।