हिंदू धर्म में अधिकतर पर्व और त्योहारों का निर्धारण उदया तिथि यानी सूर्योदय के समय रहने वाली तिथि के आधार पर किया जाता है। लेकिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एक ऐसा प्रमुख पर्व है, जिसकी तिथि तय करने में रात्रि के विशेष मुहूर्त और रोहिणी नक्षत्र का खास महत्व माना जाता है। यही कारण है कि जन्माष्टमी की तारीख सामान्य पर्वों से अलग तरीके से निर्धारित की जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्य रात्रि में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी का व्रत और पूजा उस समय को ध्यान में रखकर रखा जाता है, जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग रात के समय बनता है।
जन्म समय से जुड़ी है परंपरा
अन्य त्योहारों में सूर्योदय के समय मौजूद तिथि को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि पूजा और धार्मिक अनुष्ठान दिन के समय किए जाते हैं। वहीं जन्माष्टमी में भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है, इसलिए इसका केंद्र बिंदु रात्रि 12 बजे का जन्म मुहूर्त होता है।
मान्यता है कि भगवान कृष्ण का अवतरण आधी रात को हुआ था। इसलिए भक्त रात में जागरण करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और 12 बजे भगवान का जन्मोत्सव मनाते हैं। इसी वजह से पंचांग में जन्माष्टमी की तिथि तय करते समय रात के समय रहने वाली अष्टमी तिथि को विशेष महत्व दिया जाता है।
रोहिणी नक्षत्र का महत्व
ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में रोहिणी नक्षत्र को भगवान कृष्ण के जन्म से जोड़ा जाता है। जब अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र का संयोग बनता है, तो इसे बेहद शुभ माना जाता है। कई स्थानों पर जन्माष्टमी का व्रत इसी संयोग के आधार पर रखा जाता है।
हालांकि अलग-अलग पंचांग और परंपराओं के अनुसार जन्माष्टमी मनाने की तारीख में अंतर भी देखने को मिलता है। कुछ स्थानों पर स्मार्त परंपरा के अनुसार तो कुछ जगह वैष्णव परंपरा के अनुसार पर्व मनाया जाता है।
व्रत और पूजा का विशेष विधान
जन्माष्टमी के दिन भक्त उपवास रखते हैं और भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं। रात में जन्म समय के दौरान भगवान की मूर्ति का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद नए वस्त्र पहनाकर श्रृंगार किया जाता है और प्रसाद का भोग लगाया जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि जन्माष्टमी की रात भगवान कृष्ण की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। भक्त इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ कान्हा के जन्मोत्सव में शामिल होते हैं।
इस तरह जन्माष्टमी की तिथि उदया तिथि के बजाय भगवान श्रीकृष्ण के जन्मकाल यानी मध्य रात्रि के मुहूर्त को ध्यान में रखकर तय की जाती है, जो इसे अन्य हिंदू पर्वों से अलग बनाता है।
Tags: