Bhagavad Gita Shlok: जानें कैसे मिल सकती है सभी रोगों से मुक्ति, आप भी करें गीता में लिखी इन बातों का पालन

Update: 2025-11-30 05:04 GMT
Bhagavad Gita Shlok: आज के इस भागदौड़ भरे दौर में हम सभी किसी न किसी रूप में तनाव, बेचैनी और गुस्से का सामना करते हैं। ऐसे में नींद न आना मानसिक अशांति और क्रोध जीवन का हिस्सा बन गए हैं। हजारों वर्षों पुरानी भगवद गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्मिक और मानसिक संघर्षों के समाधान का गहरा विज्ञान है। जब अर्जुन युद्ध के मैदान में मानसिक रूप से टूट चुके थे और तब श्रीकृष्ण ने उन्हें जो ज्ञान दिया, वह आज के समय में भी मेंटल हेल्थ थेरेपी की तरह काम कर सकता है। जिसे समझकर कोई भी मनुष्य अपने कष्ट दूर कर निरोगी रह सकता है
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नाव बोधस्य योगो भवति दु:ख’।।
इस श्लोक का अर्थ है कि, जो व्यक्ति संतुलित आहार-विहार, कर्मों में उचित चेष्टा और नियमित नींद-जागृति का पालन करता है, उसके लिए योग उसके सभी दुखों को नष्ट करने वाला बन जाता है।
जन्मारन्तिर पापं व्यााधिरूपेण बाधते।
तच्छानन्तिरौषधप्राशैर्जपहोमसुरार्चनै:’।।
इस श्लोक का अर्थ है कि, जप, हवन, देवताओं का पूजन, ये सब भी रोगों की दवाएं हैं जो जन्म-जन्मांतर के पाप को समाप्त कर इस जन्म के कष्ट एवं रोगों से मुक्त करती हैं।
भोजन के प्रकार:
गीता में श्रीकृष्ण ने भोजन के तीन प्रकार बताएं हैं, तामसिक, राजसिक और सात्विक भोजन। मनुष्य को अगर खुद को मन और शरीर से शुद्ध और स्वस्थ रखना है, तो उसे सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। सात्विक भोजन में अनाज, फल, सब्जी और दूध आते हैं।
पिछले जन्म के कुकर्म और पाप:
गीता के अनुसार, शरीर के रोगी रहने का कारण मनुष्य के पिछले जन्म के कुकर्म और पाप भी बताये गये हैं। इन पापों से मुक्ति पाने के लिए देवी-देवताओं से ही माफी मांगी जा सकती है।
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