नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI को लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट के मुताबिक छात्रों के आचरण से जुड़े मामलों पर फैसला लेने की जिम्मेदारी संबंधित यूनिवर्सिटी या शैक्षणिक संस्थान की है।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को लॉ छात्रों से जुड़े एक अहम मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अधिकारों की सीमा स्पष्ट कर दी। अदालत ने कहा कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत BCI या स्टेट बार काउंसिल को कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं दिया गया है। कोर्ट ने BCI की ओर से जारी उस आदेश को भी गैरकानूनी करार दिया, जिसमें NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के छात्रों के वकील के रूप में एनरोलमेंट पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था।
NALSAR के छात्रों के विरोध से शुरू हुआ विवाद
यह पूरा मामला हैदराबाद स्थित नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च यानी NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से जुड़ा है। विश्वविद्यालय के करीब 1,400 छात्रों में से लगभग 450 छात्रों ने दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी।
छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र भेजकर CJI को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित करने के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। बताया गया कि छात्रों की नाराजगी CJI की जुलाई में की गई कुछ टिप्पणियों को लेकर थी। ये टिप्पणियां दिल्ली में NEET प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई से संबंधित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई थीं।
विवाद के बाद BCI ने 13 अगस्त को सभी स्टेट बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि NALSAR के 2026 बैच के छात्रों का अधिवक्ता के रूप में एनरोलमेंट अगले आदेश तक रोक दिया जाए।
BCI के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई आपत्ति
BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की ओर से जारी आदेश में यूनिवर्सिटी से मामले पर रिपोर्ट भी मांगी गई थी। साथ ही अभियान में शामिल प्रमुख छात्रों की पहचान करने को कहा गया था। BCI ने अपने आदेश में कानून के छात्रों से देश के सर्वोच्च न्यायिक पद के प्रति सम्मान की अपेक्षा का भी उल्लेख किया था।
हालांकि, विवाद बढ़ने के कुछ घंटे बाद BCI ने अपना आदेश वापस ले लिया। काउंसिल ने स्पष्ट किया कि NALSAR के ज्यादातर छात्र किसी कार्रवाई के दायरे में नहीं हैं और सभी छात्रों को अपनी पसंद की स्टेट बार काउंसिल में एनरोल होने की अनुमति दी गई।
इसके बाद मामले को लेकर NALSAR के दो पूर्व छात्रों मिहिरा सूद और अभिषेक तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उन्होंने दलील दी कि BCI के पास लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई करने का वैधानिक अधिकार नहीं है।
CJI ने पिछली सुनवाई में भी उठाया था सवाल
14 अगस्त को मामले की पिछली सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने BCI के हस्तक्षेप पर सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि छात्रों का फैसला गलत हो सकता है या उन्हें किसी ने गलत सलाह दी हो, लेकिन अपनी बात रखने और विरोध करने का अधिकार छात्रों के पास है।
गुरुवार को CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिवक्ता अधिनियम के तहत BCI या स्टेट बार काउंसिल को लॉ स्टूडेंट्स के आचरण पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की स्पष्ट अथवा निहित शक्ति नहीं मिलती।
अदालत ने 13 अगस्त को जारी BCI के आदेश को गैरकानूनी बताते हुए कहा कि छात्रों के व्यवहार से संबंधित कार्रवाई का अधिकार उनके विश्वविद्यालय या संबंधित शैक्षणिक संस्थान के पास है।
SCBA ने भी BCI की कार्रवाई पर जताई थी आपत्ति
BCI के शुरुआती फैसले पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने भी सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि छात्रों को अपनी राय रखने या विरोध करने के कारण वकालत के पेशे में प्रवेश से रोकने की धमकी नहीं दी जानी चाहिए। इस पूरे मामले ने छात्रों के अभिव्यक्ति के अधिकार, शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता और बार काउंसिल की कानूनी शक्तियों को लेकर बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि लॉ कॉलेज में पढ़ रहे छात्रों और पहले से अधिवक्ता के रूप में नामांकित वकीलों के खिलाफ कार्रवाई के अधिकारों को अलग-अलग देखा जाना चाहिए।
मामले में CJI सूर्यकांत की कुछ पुरानी टिप्पणियों को लेकर भी विवाद सामने आया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा फैसला मुख्य रूप से BCI के अधिकार क्षेत्र और लॉ छात्रों के एनरोलमेंट से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल लॉ की पढ़ाई करने वाले छात्रों पर बार काउंसिल की अनुशासनात्मक शक्तियां उसी तरह लागू नहीं की जा सकतीं, जैसे वे पंजीकृत अधिवक्ताओं पर लागू होती हैं।
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