हटे धनखड़ है कुछ गड़बड़!

उपराष्ट्रपति के इस्तीफे के पीछे अंदरूनी विवाद

Update: 2025-07-22 14:15 GMT
नई दिल्ली। भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा अचानक दिए गए इस्तीफे से भारतीय जनता पार्टी के गलियारों में लोकसभा और राज्यसभा के गलियारों में चर्चा जमकर हो रही है। शीतकालीन सत्र के दौरान निजी स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर पद छोड़ने की उनकी घोषणा के पीछे कई तरह की चर्चाएं तेज़ हैं, जिनमें से एक अहम चर्चा राज्यसभा में पेश किए गए एक विवादित विधेयक को लेकर है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, उपराष्ट्रपति की अध्यक्षता में राज्यसभा की एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान जस्टिस वर्मा का
विधेयक
स्वीकार कर लिया गया जिसे लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और जे.पी. नड्डा ने असहमति जताई। बताया जा रहा है कि जिस दिन यह विधेयक स्वीकार किया गया, उस दिन दोनों नेता सदन में मौजूद नहीं थे।

धनखड़ ने दोनों नेताओं से व्यक्तिगत रूप से फोन पर बात की, जिसके दौरान कथित रूप से सवाल उठाया गया कि "अपने बिल को कैसे स्वीकार कर लिया?" इस पर उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि यह उनके सभापति के अधिकार में है और उन्होंने नियमों के तहत ही कार्य किया है। इस विवाद के बाद, उपराष्ट्रपति ने कथित रूप से मन बना लिया कि वे इस पद पर अब आगे नहीं रहेंगे। उसी शाम उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया और देर रात अपना इस्तीफा सौंप दिया। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लोकसभा और राज्यसभा दोनों के राजनीतिक गलियारों में इसको लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। ‘जनता से रिश्ता’ इस खबर की सत्यता की पुष्टि नहीं करता, लेकिन जनहित और चर्चा में बने विषयों के आधार पर इसे सार्वजनिक करना अपना दायित्व मानता है। 

देश की संसद में उस समय राजनीतिक हलचल तेज हो गई जब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शीतकालीन सत्र के दौरान निजी स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अचानक इस्तीफा दे दिया। यह भारत के संसदीय इतिहास में पहला ऐसा मौका है जब कोई उपराष्ट्रपति सत्र के दौरान पद छोड़कर गया हो। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, यह घटनाक्रम उस समय शुरू हुआ जब केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और किरेन रिजिजू राज्यसभा की बैठक में अनुपस्थित थे। उपराष्ट्रपति धनखड़ ने दोनों नेताओं को फोन कर अनुपस्थिति का कारण पूछा, जिस पर उन्हें कथित रूप से जवाब मिला कि उन्होंने "जस्टिस वर्मा वाला बिल" क्यों स्वीकार किया। इस पर उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि वे राज्यसभा के सभापति हैं। इसी विवाद के बाद जगदीप धनखड़ ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। हालांकि जनता से रिश्ता इस सूचना की आधिकारिक पुष्टि नहीं करता, लेकिन संसद और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। दूसरी ओर, जस्टिस यशवंत वर्मा को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यरत रहते हुए जस्टिस वर्मा के आवास से भारी मात्रा में नकदी मिलने के बाद भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं।

लोकसभा और राज्यसभा में पेश हुआ महाभियोग प्रस्ताव
मॉनसून सत्र के पहले दिन सोमवार को सरकार ने लोकसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, जिस पर राहुल गांधी, रविशंकर प्रसाद और अनुराग ठाकुर सहित 152 सांसदों ने हस्ताक्षर किए। वहीं राज्यसभा में विपक्ष की ओर से प्रस्ताव लाया गया, जिसे 63 सांसदों का समर्थन मिला। अब सवाल यह उठता है कि धनखड़ के इस्तीफे के बाद राज्यसभा में विपक्ष द्वारा लाए गए प्रस्ताव का क्या होगा? यह निर्णय अब राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह पर निर्भर करेगा।

संवैधानिक प्रक्रिया और आगे की राह
संविधान के अनुसार, जज को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर से पेश किया जा सकता है। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा उपसभापति एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक न्यायविद् होते हैं। यह समिति तीन माह में जांच कर रिपोर्ट सौंपती है। अगर आरोप सही पाए गए, तो संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास करना होगा। लोकसभा में कम से कम 362 और राज्यसभा में 163 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा। जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की इस संवैधानिक प्रक्रिया और उपराष्ट्रपति के इस्तीफे ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
Tags:    

Similar News