नई दिल्ली: भारत की परमाणु ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं के सामने आने वाले वर्षों में यूरेनियम की उपलब्धता बड़ी चुनौती बन सकती है। देश ने वर्ष 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 100 गीगावाट (GW) करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन इसके लिए मौजूदा क्षमता में दस गुना से अधिक विस्तार करना होगा। ऐसे में वैश्विक यूरेनियम उत्पादन और आपूर्ति को लेकर जताई जा रही चिंताएं भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गई हैं।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन की परमाणु ऊर्जा एजेंसी (OECD-NEA) की यूरेनियम संबंधी रिपोर्टों में भविष्य में उत्पादन क्षमता पर दबाव और संसाधनों की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख किया गया है। एक आकलन के मुताबिक, कम लागत पर उपलब्ध यूरेनियम संसाधनों के आधार पर वैश्विक उत्पादन क्षमता 2035 के बाद घट सकती है। हालांकि, वर्ष 2040 तक उत्पादन में कम से कम 50 प्रतिशत गिरावट की बात को किसी निश्चित और सार्वभौमिक अनुमान के रूप में प्रस्तुत करने से पहले संबंधित रिपोर्ट के मूल आंकड़ों और परिदृश्यों की पुष्टि जरूरी है।
100 GW का लक्ष्य, अभी 9 GW से भी कम क्षमता
भारत सरकार ने वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता 100 GW तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के रोडमैप के अनुसार, देश की स्थापित परमाणु ऊर्जा क्षमता लगभग 8.88 GW रही है। इसका अर्थ है कि लक्ष्य हासिल करने के लिए अगले दो दशकों में बड़े पैमाने पर नई परियोजनाएं शुरू करनी होंगी और मौजूदा परियोजनाओं को समय पर पूरा करना होगा।
भारत के लिए यह विस्तार इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि परमाणु ऊर्जा मौसम पर निर्भर हुए बिना लगातार बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम है। सौर और पवन ऊर्जा के साथ परमाणु ऊर्जा का विस्तार बिजली व्यवस्था को अधिक स्थिर बनाने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने में मदद कर सकता है।
लेकिन परमाणु बिजलीघरों के निर्माण के लिए केवल रिएक्टर, निवेश और तकनीक ही पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें लंबे समय तक संचालित रखने के लिए भरोसेमंद परमाणु ईंधन की आपूर्ति भी जरूरी है। यदि यूरेनियम की वैश्विक उपलब्धता घटती है या उसकी कीमतों में तेज उछाल आता है, तो भारत की विस्तार योजनाओं पर लागत और आपूर्ति का दबाव बढ़ सकता है।
यूरेनियम की आपूर्ति क्यों है अहम?
यूरेनियम परमाणु बिजलीघरों में इस्तेमाल होने वाला प्रमुख ईंधन है। खदानों से निकाले गए यूरेनियम को परमाणु ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने से पहले कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से खनन, प्रसंस्करण, ईंधन निर्माण और अंतरराष्ट्रीय परिवहन सहित पूरी आपूर्ति शृंखला का मजबूत होना जरूरी है।
दुनिया में यूरेनियम उत्पादन कुछ प्रमुख देशों में केंद्रित है। ऐसे में किसी बड़े उत्पादक देश में राजनीतिक अस्थिरता, निर्यात संबंधी प्रतिबंध, खदानों में उत्पादन की समस्या या परिवहन बाधित होने से वैश्विक बाजार प्रभावित हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने भी परमाणु ऊर्जा के विस्तार के लिए यूरेनियम आपूर्ति और संवर्धन सेवाओं के अधिक विविध स्रोत विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है।
यदि भविष्य में मांग तेजी से बढ़ती है और नई खदानें समय पर उत्पादन शुरू नहीं कर पातीं, तो यूरेनियम की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका रहेगी। इसका असर उन देशों पर ज्यादा पड़ सकता है, जो अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए आयातित ईंधन पर निर्भर हैं।
भारत के सामने दोहरी चुनौती
भारत के सामने चुनौती केवल यूरेनियम की वैश्विक उपलब्धता नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन और परमाणु परियोजनाओं की समयसीमा भी है। नई परमाणु परियोजनाओं को मंजूरी देने, निर्माण पूरा करने और बिजली उत्पादन शुरू करने में लंबा समय लग सकता है। ऐसे में ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित किए बिना क्षमता विस्तार की रफ्तार बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के परमाणु बिजलीघरों ने लगभग 56,681 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया था। इसी अवधि में परमाणु ऊर्जा का देश के कुल बिजली उत्पादन में हिस्सा लगभग 3.1 प्रतिशत रहा। सरकार का लक्ष्य इस हिस्सेदारी को आने वाले वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ाना है।
यदि यूरेनियम की आपूर्ति बाधित होती है, तो उसका प्रभाव केवल नई परियोजनाओं पर ही नहीं, बल्कि मौजूदा बिजलीघरों के लिए ईंधन की दीर्घकालिक योजना पर भी पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत के पास कितना घरेलू उत्पादन, आयात व्यवस्था और सुरक्षित ईंधन भंडार उपलब्ध है।
भारत के पास क्या हैं विकल्प?
यूरेनियम आपूर्ति के जोखिम को कम करने के लिए भारत कई स्तरों पर काम कर सकता है। पहला, घरेलू यूरेनियम खनन और संसाधनों की खोज को बढ़ावा देना। दूसरा, विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते करना, ताकि किसी एक देश या स्रोत पर निर्भरता कम हो। तीसरा, रणनीतिक ईंधन भंडार और ईंधन निर्माण की क्षमता को मजबूत करना।
इसके अलावा, भारत अपने स्वदेशी परमाणु कार्यक्रम और तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा रणनीति पर भी काम कर रहा है। इस रणनीति में दीर्घकाल में थोरियम जैसे संसाधनों के इस्तेमाल की संभावनाएं शामिल हैं। हालांकि, थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन को बड़े पैमाने पर व्यावसायिक स्तर तक पहुंचाने के लिए तकनीकी विकास और चरणबद्ध कार्यान्वयन की जरूरत होगी। इसे तत्काल यूरेनियम का पूर्ण विकल्प नहीं माना जा सकता।
सरकार ने छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) सहित उन्नत परमाणु तकनीकों के अनुसंधान और विकास पर भी जोर दिया है। इन तकनीकों से भविष्य में ऊर्जा उत्पादन के नए विकल्प मिल सकते हैं, लेकिन इनके व्यावहारिक योगदान का आकलन तकनीकी प्रगति, लागत और परियोजनाओं की समयसीमा के आधार पर ही किया जा सकेगा।
2047 का लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं
भारत का 100 GW परमाणु ऊर्जा लक्ष्य देश की बढ़ती बिजली जरूरतों और कम कार्बन उत्सर्जन वाले ऊर्जा स्रोतों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इसे हासिल करने के लिए बड़े निवेश, परियोजनाओं का समय पर निर्माण, कुशल मानव संसाधन, मजबूत नियामकीय व्यवस्था और भरोसेमंद ईंधन आपूर्ति की आवश्यकता होगी।
वैश्विक यूरेनियम उत्पादन में संभावित गिरावट की चिंता इस चुनौती को और गंभीर बना सकती है। हालांकि, भविष्य का उत्पादन नई खदानों, निवेश, खोजे जाने वाले संसाधनों और तकनीकी विकास पर निर्भर करेगा। इसलिए संभावित गिरावट को निश्चित संकट मानने के बजाय भारत के लिए समय रहते ईंधन सुरक्षा की रणनीति मजबूत करने की चेतावनी के रूप में देखना अधिक उचित होगा।