बुलडोजर कार्रवाई, हाईकोर्ट के जजों में फैसले को लेकर एकराय नहीं

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Update: 2026-07-22 05:18 GMT
लखनऊ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ यानी आरोपियों से जुड़ी संपत्तियों के दंडात्मक ढांचे गिराने के मुद्दे पर विभाजित (स्प्लिट) फैसला सुनाया है. बेंच के वरिष्ठ जज जस्टिस अतुल श्रीधरन ने आदेश दिया कि FIR दर्ज होने की तारीख से दो साल तक आरोपी के घर को न ढहाया जाए, लेकिन दूसरे जज जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इस पर असहमति जताई. जजों के बीच मतभेद को देखते हुए कोर्ट ने इस मामले को तीसरे जज की राय के लिए चीफ जस्टिस को रेफर कर दिया है. ये याचिका हमीरपुर जिले के सुमेरपुर थाने में पोक्सो और धर्मांतरण कानून के तहत दर्ज एक मामले से जुड़ी है.
सोमवार को पारित अपने अलग फैसले में वरिष्ठ जज जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा कि किसी अपराध के आरोपी के घर को नगर पालिका (म्युनिसिपल) कानूनों के उल्लंघन की आड़ में जल्दबाजी में ढहाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है. उन्होंने इसे कार्यपालिका (अधिकारियों) की बदले की कार्रवाई करार दिया. जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने की तारीख से दो साल की अवधि तक आरोपी का मकान ढहाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए.
दूसरी ओर जस्टिस नंदन ने कहा कि हमेशा ये माना जाता है कि सरकार कानून के अनुसार ही काम करेगी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करेगी. उन्होंने आगे कहा कि पीड़ित व्यक्ति के लिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है. उनकी राय में कार्रवाई रोकने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती, क्योंकि इसका नतीजा किसी कानून के संचालन को उस अवधि के लिए स्थगित रखना होगा.
वहीं, जजों के बीच मतभेद के बाद चीफ जस्टिस को भेजे गए मुद्दों में पहला सवाल ये है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 2 साल की अवधि के लिए 'इन रेमा' (सभी पर लागू होने वाला) ऐसा आदेश दिया जा सकता है जो सरकार को उत्तर प्रदेश शहरी योजना और विकास अधिनियम 1973 के तहत कोई भी कार्रवाई करने से रोका जा सके. हालांकि, इसमें कुछ अपवाद हो सकते हैं.
दूसरा सवाल ये है कि क्या निकाय कानूनों के तहत प्रक्रिया शुरू करने से एक साल पहले 'इरादे का नोटिस' देने का निर्देश अधिकारियों को दिया जा सकता है. दरअसल, मौजूदा मामले में हाईकोर्ट फईमुद्दीन और एक परिवार के दो अन्य सदस्यों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था. उन्होंने आरोप लगाया था कि हमीरपुर जिले के सुमेरपुर पुलिस स्टेशन में उनके एक रिश्तेदार के खिलाफ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट और उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज होने के तुरंत बाद पुलिस की मिलीभगत से एक भीड़ ने उनके घर को निशाना बनाया. साथ ही बाद में फईमुद्दीन को भी इस मामले में आरोपी बनाया गया था.
इसके बाद उन्होंने अपना घर ढहाए जाने की आशंका जताते हुए कोर्ट का रुख किया था. हालांकि, राज्य की ओर से ये तर्क दिया गया है कि ये याचिका समय से पहले दायर की गई है, क्योंकि अभी तक कोई ठोस वजह (cause of action) नहीं बनी है और याचिकाकर्ताओं को जारी किए गए नोटिस का जवाब देना बाकी है.
वहीं, एक अलग मामले में जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि कोर्ट ने ऐसे कई मामले देखे हैं जिनमें FIR दर्ज होने के बाद घर में रहने वाले लोगों को गिराने का नोटिस जारी किया गया और उसके बाद तोड़-फोड़ की कार्रवाई की गई.
उन्होंने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून तय किए जाने के बावजूद एफआईआर दर्ज होने के बाद मकानों को ढहाने का सिलसिला बेरोक-टोक जारी है. जबकि जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहा कि बढ़ती आबादी के कारण अनाधिकृत निर्माण बढ़ रहे हैं, लेकिन अवैध निर्माणों को सही नहीं ठहरा सकता. उन्होंने ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने का आह्वान किया.
आपको बता दें कि फरवरी में हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आरोपियों से जुड़ी संपत्तियों को सजा के तौर पर गिराने का काम जारी रखने के लिए फटकार लगाई थी, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी कार्रवाई न करने के निर्देश दिए थे. कोर्ट ने तब इस मुद्दे की विस्तार से जांच की थी.
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