भूमिहीनों के लिए ऐतिहासिक कदम: वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006

Update: 2026-04-04 09:56 GMT
Shimla. शिमला। हिमाचल प्रदेश के भूमिहीन लोगों के लिए वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act - FRA) 2006 एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कानून है। यह कानून 2006 में केंद्र में कांग्रेस गठबंधन सरकार के दौरान पारित हुआ था, जब डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। यह कानून आदिवासियों, वनवासियों और अन्य भूमिहीन वर्गों को उनकी पारंपरिक भूमि और वन अधिकार प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया। राज्य के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने सभी विधायकों से आग्रह किया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में एफआरए कानून के क्रियान्वयन में सहयोग करें। उनका कहना है कि इस कानून का सही तरीके से पालन किया जाए तो हजारों लोगों को उनकी भूमि का मालिक बनाया जा सकता है। मंत्री ने बताया कि सरकार द्वारा कानून के क्रियान्वयन के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
28 मार्च को हुई राज्य स्तरीय निगरानी समिति की बैठक में सभी उपायुक्तों को कानून के समयबद्ध क्रियान्वयन के निर्देश दिए गए। बैठक में निर्णय लिया गया कि प्रत्येक जिले में कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी ताकि लोगों को कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों की पूरी जानकारी दी जा सके और अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें। जगत सिंह नेगी ने स्पष्ट किया कि एफआरए कानून सभी फॉरेस्ट कानूनों से ऊपर है। यदि किसी परिवार को एफआरए के तहत भूमि अलॉट की गई है, तो कोई भी अधिकारी उसे जमीन से बेदखल नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि यह कानून विशेष रूप से उन लोगों के लिए बनाया गया है जो वर्षों से भूमिहीन हैं और अपने जीवन-यापन के लिए जमीन के अभाव में संघर्ष कर रहे हैं।
राजस्व मंत्री ने कहा कि कानून के क्रियान्वयन में सभी का सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि विधायकों, जिला प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों ने सही दिशा में काम किया, तो हिमाचल प्रदेश में कोई भी व्यक्ति भूमिहीन नहीं रहेगा। इसके अलावा, कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों के संरक्षण के लिए पंचायतों और स्थानीय समितियों को भी जिम्मेदारी दी गई है, ताकि पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित हो सके। एफआरए कानून के तहत केवल भूमि ही नहीं, बल्कि वन संसाधनों पर भी स्थानीय लोगों का अधिकार सुनिश्चित किया गया है। इसका उद्देश्य उन समुदायों को सशक्त बनाना है जो लंबे समय से वन पर निर्भर हैं। इस कानून से न केवल सामाजिक न्याय सुनिश्चित होता है, बल्कि वन संसाधनों का स्थायी और जिम्मेदार उपयोग भी प्रोत्साहित होता है।
राज्य सरकार की योजना है कि कानून के क्रियान्वयन के दौरान सभी विभागों में समन्वय स्थापित किया जाए। इसके लिए उपायुक्तों को निर्देश दिए गए हैं कि वे जनसंपर्क कार्यक्रम, कार्यशालाएं और जागरूकता अभियान आयोजित करें। ताकि सभी पात्र व्यक्ति अपने अधिकारों को समझें और उनका लाभ उठा सकें। जगत सिंह नेगी ने यह भी कहा कि एफआरए कानून को लागू करने में किसी प्रकार की ढील या अनदेखी नहीं बरती जाएगी। प्रत्येक जिले में एफआरए समिति की निगरानी सुनिश्चित की जाएगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि भूमिहीन परिवारों को समय पर उनके अधिकार मिलें।
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