कोलकाता। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने जादवपुर विश्वविद्यालय में कथित रूप से “राष्ट्र-विरोधी ताकतों” का समर्थन करने वालों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की बात कही है। गुरुवार को उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के लिए “सख्त इलाज” की जरूरत है। अधिकारी ने चेतावनी दी कि विश्वविद्यालय परिसर में देश की एकता और अखंडता के खिलाफ नारे लगाने या गतिविधियां संचालित करने वालों पर प्रशासनिक तथा कानूनी कदम उठाए जाएंगे।

सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि यदि जादवपुर विश्वविद्यालय में “कश्मीर मांगे आजादी” या “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे लगाए जाते हैं तो सरकार इसे बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसी गतिविधियों का जवाब महात्मा गांधी की नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भाषा में देगी। उनके इस बयान ने राज्य की राजनीति और शिक्षा जगत में नई बहस शुरू कर दी है।

मुख्यमंत्री ने विश्वविद्यालय परिसर में कथित राष्ट्र-विरोधी नारे, दीवार लेखन और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सरकारी धन से संचालित संस्थान में देश विरोधी विचारों को प्रोत्साहित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अधिकारी ने विश्वविद्यालय को मिलने वाले सरकारी अनुदान का भी उल्लेख किया और कहा कि सार्वजनिक धन का उपयोग गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोध तथा छात्रों के भविष्य के लिए होना चाहिए।

हाल के दिनों में जादवपुर विश्वविद्यालय की दीवारों पर लिखे गए नारों को लेकर विवाद सामने आया था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ विवादित भित्तिचित्रों और नारों को सफेद रंग से मिटा दिया था। इसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने परिसर की दीवारों पर “फ्री पीओके” और “अखंड भारत” जैसे नारे लिखे। इस घटनाक्रम के बाद परिसर में राजनीतिक तनाव और वैचारिक टकराव बढ़ गया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में इस दीवार लेखन विवाद का विवरण दिया गया है।

सुवेंदु अधिकारी इससे पहले भी विश्वविद्यालय परिसर में लिखे गए कथित राष्ट्र-विरोधी नारों की जांच कराने के निर्देश दे चुके हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति और उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों से ऐसे संदेशों की पुष्टि करने, उन्हें हटाने तथा जिम्मेदार लोगों की पहचान करने को कहा था। उनके मुताबिक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाली गतिविधियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मुख्यमंत्री ने विश्वविद्यालय के इतिहास से जुड़ी एक घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने वर्ष 1970 में विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति गोपाल सेन की हत्या की परिस्थितियों की जांच कराने की संभावना जताई। अधिकारी ने संकेत दिया कि सरकार पुराने मामलों और विश्वविद्यालय परिसर में हुई राजनीतिक हिंसा से जुड़े घटनाक्रमों की भी समीक्षा कर सकती है। हालांकि, इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक आदेश सामने आना बाकी है।

जादवपुर विश्वविद्यालय लंबे समय से छात्र राजनीति और वैचारिक बहसों का केंद्र रहा है। परिसर में वामपंथी छात्र संगठनों, एबीवीपी और अन्य समूहों के बीच कई बार विवाद तथा टकराव की स्थिति बनी है। विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों का एक वर्ग परिसर की स्वायत्तता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर देता है। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि स्वतंत्रता की आड़ में देश विरोधी गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मुख्यमंत्री के “सख्त इलाज” वाले बयान को लेकर विपक्ष और शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया भी सामने आ सकती है। आलोचकों का कहना है कि सरकार को किसी भी कथित आपत्तिजनक गतिविधि पर कानून के तहत कार्रवाई करनी चाहिए और राजनीतिक भाषा से बचना चाहिए। वहीं अधिकारी के समर्थकों का तर्क है कि शिक्षण संस्थानों में राष्ट्र की एकता के खिलाफ नारे लगाने वालों पर कठोर कदम जरूरी हैं।

इसी दौरान बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के मांसाहार से जुड़े बयान पर उत्पन्न विवाद को लेकर भी सुवेंदु अधिकारी ने प्रतिक्रिया दी। धीरेंद्र शास्त्री ने कथित रूप से लोगों से दुर्गा पूजा के दौरान मछली और मांस पकाने या खाने से परहेज करने की अपील की थी। उनके बयान का राज्य में विरोध हुआ, क्योंकि मछली और मांस बंगाली खानपान तथा त्योहारों की स्थानीय परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

धीरेंद्र शास्त्री के बयान के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और उनकी तस्वीरें या पुतले जलाए जाने की घटना सामने आई। सुवेंदु अधिकारी ने इस पर नाराजगी जताते हुए कोलकाता पुलिस आयुक्त को संबंधित प्रदर्शनकारियों की पहचान कर गिरफ्तार करने का निर्देश देने की बात कही। उन्होंने तर्क दिया कि विरोध के नाम पर किसी धार्मिक व्यक्ति की तस्वीर जलाने और भावनाएं आहत करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

हालांकि, धीरेंद्र शास्त्री के मांसाहार संबंधी बयान से प्रदेश भाजपा ने भी दूरी बनाई थी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा था कि बंगाल के लोग क्या खाएंगे या पहनेंगे, यह कोई बाहरी व्यक्ति तय नहीं कर सकता। उन्होंने स्थानीय संस्कृति और खानपान की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया कि पार्टी लोगों पर भोजन संबंधी प्रतिबंध थोपने के पक्ष में नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, प्रदेश भाजपा ने बंगाल की सांस्कृतिक परंपराओं के सम्मान की बात कही थी।

इस तरह धीरेंद्र शास्त्री के मामले में राज्य सरकार और भाजपा के भीतर दो अलग पहलू दिखाई दिए। एक ओर उनके मांसाहार संबंधी बयान को प्रदेश भाजपा ने स्वीकार नहीं किया, वहीं दूसरी ओर उनकी तस्वीरें जलाने वालों पर कार्रवाई की मांग की गई। सरकार का कहना है कि किसी बयान से असहमति होने पर लोकतांत्रिक और कानूनी तरीके से विरोध किया जाना चाहिए।

जादवपुर विश्वविद्यालय और धीरेंद्र शास्त्री से जुड़े दोनों मुद्दों पर सुवेंदु अधिकारी के बयान से राजनीतिक माहौल गरमा गया है। विश्वविद्यालय परिसर की स्वायत्तता, राष्ट्रवाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं जैसे विषय एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। आने वाले दिनों में विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और शिक्षकों की प्रतिक्रिया से यह विवाद और बढ़ सकता है।

फिलहाल मुख्यमंत्री ने संकेत दिया है कि उनकी सरकार जादवपुर विश्वविद्यालय में कथित राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के प्रति कठोर नीति अपनाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि परिसर में शिक्षा और शोध को प्राथमिकता दी जानी चाहिए तथा देश की अखंडता के खिलाफ गतिविधियों को संरक्षण नहीं मिलेगा। अब निगाहें प्रशासन पर हैं कि इन बयानों के बाद विश्वविद्यालय और विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में किस प्रकार के कदम उठाए जाते हैं।

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