पश्चिम बंगाल

जादवपुर यूनिवर्सिटी में नारे बने सियासी तूफान शुभेंदु का बड़ा हमला

Ratna Netam
10 Sept 2026 3:31 PM IST
जादवपुर यूनिवर्सिटी में नारे बने सियासी तूफान शुभेंदु का बड़ा हमला
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कोलकाता। पश्चिम बंगाल की प्रतिष्ठित जादवपुर यूनिवर्सिटी एक बार फिर राजनीतिक और वैचारिक टकराव का केंद्र बन गई है। विश्वविद्यालय परिसर में कथित तौर पर ‘कश्मीर मांगे आजादी’, ‘लाल सलाम’ और माओवादी नेता किशनजी के समर्थन से जुड़े नारे और वॉल राइटिंग सामने आने के बाद विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने कहा है कि जादवपुर यूनिवर्सिटी से ऐसी ताकतों को “उखाड़ फेंका” जाएगा और परिसर में राष्ट्रविरोधी गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।
इस पूरे विवाद के बीच बुधवार 9 सितंबर को शुभेंदु अधिकारी ने दक्षिण कोलकाता में ‘गेरुआ सम्मान यात्रा’ का नेतृत्व किया। करीब तीन किलोमीटर लंबी यह यात्रा गोलपार्क से जादवपुर यूनिवर्सिटी तक निकाली गई। इसमें भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ बड़ी संख्या में साधु-संत और नागा साधु भी शामिल हुए। यात्रा के दौरान भगवा झंडे दिखाई दिए और ‘जय श्रीराम’ के नारे भी लगाए गए।
‘कश्मीर मांगे आजादी’ के नारों पर भड़के शुभेंदु
जादवपुर यूनिवर्सिटी के बाहर आयोजित सभा में शुभेंदु अधिकारी ने परिसर में कथित तौर पर लगाए गए ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और ‘लाल सलाम’ जैसे नारों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा कि जादवपुर श्री अरविंद की भूमि और उत्कृष्ट शिक्षा का केंद्र है। यहां ऐसी गतिविधियों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि वह उन ताकतों को जादवपुर से उखाड़ देंगे जो ‘कश्मीर मांगे आजादी’ जैसे नारे लगाती हैं।
शुभेंदु ने भगवा रंग के अपमान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि भगवा केवल एक रंग नहीं बल्कि त्याग और परंपरा से जुड़ा है और इसका अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बोस और स्वतंत्रता सेनानियों का किया जिक्र
इस विवाद पर अपने पिछले संबोधन में शुभेंदु अधिकारी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, मातंगिनी हाजरा और बंगाल के दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख करते हुए ‘आजादी’ के नारों पर सवाल उठाए थे।
उन्होंने कहा था कि देश को स्वतंत्र कराने के लिए बंगाल के क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया। ऐसे में आजादी मिलने के दशकों बाद विश्वविद्यालयों में आखिर किस ‘आजादी’ की मांग की जा रही है।
इसी पृष्ठभूमि में ‘बोस की भाषा’ वाली राजनीतिक बयानबाजी को नेताजी और बंगाल के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि उपलब्ध प्रमुख रिपोर्टों में 9 सितंबर के भाषण का प्रत्यक्ष उद्धरण “अब बोस की भाषा में इलाज करेंगे” नहीं मिलता। रिपोर्टों में अधिकारी के “उखाड़ फेंकने”, भगवा के अपमान को बर्दाश्त नहीं करने और गीता-हनुमान चालीसा पाठ के साथ लौटने वाले बयान दर्ज हैं।
क्या वास्तव में लगे थे नारे?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। शुभेंदु अधिकारी और उनके समर्थकों ने जादवपुर यूनिवर्सिटी में ‘कश्मीर मांगे आजादी’ जैसे नारों और वॉल राइटिंग का आरोप लगाया है। हाल की मीडिया रिपोर्टों में परिसर की दीवारों पर राजनीतिक नारों और ग्रैफिटी को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद का उल्लेख है।
इसी विवाद के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ ग्रैफिटी पर सफेदी कराई थी। इसके जवाब में ABVP कार्यकर्ताओं ने परिसर में ‘Free PoK’ और ‘Akhand Bharat’ जैसे नारे लिखे। इससे लेफ्ट और दक्षिणपंथी छात्र संगठनों के बीच पहले से चल रहा वैचारिक टकराव और तेज हो गया।
यानी यह मामला केवल एक नारे तक सीमित नहीं है बल्कि विश्वविद्यालय की दीवारों, छात्र राजनीति और अलग-अलग विचारधाराओं के बीच चल रही ‘स्लोगन वॉर’ का हिस्सा बन चुका है।
‘लाल सलाम किशनजी’ पर भी आपत्ति
शुभेंदु अधिकारी ने केवल कश्मीर से जुड़े नारों पर ही आपत्ति नहीं जताई है। उन्होंने विश्वविद्यालय की दीवारों पर ‘लाल सलाम किशनजी’ लिखे होने को लेकर भी सवाल उठाए।
किशनजी का वास्तविक नाम मल्लोजुला कोटेश्वर राव था। वह माओवादी संगठन CPI (Maoist) के वरिष्ठ नेताओं में शामिल था और नवंबर 2011 में पश्चिम बंगाल में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया था।
शुभेंदु ने सवाल किया कि विश्वविद्यालय में नई पीढ़ी को इस तरह के संदेश देकर क्या सिखाया जा रहा है। उन्होंने ‘लाल सलाम’ और माओवादी समर्थन से जुड़े संदेशों को भी हटाने की बात कही।
गीता और हनुमान चालीसा लेकर लौटने का ऐलान
‘गेरुआ सम्मान यात्रा’ के दौरान शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि वह भविष्य में जादवपुर क्षेत्र में फिर आएंगे। उन्होंने गीता पाठ और हनुमान चालीसा के आयोजन की बात कही।
इसके साथ ही तीन दिवसीय वैदिक पाठ आयोजित करने का भी ऐलान किया गया। उन्होंने लोगों से इन कार्यक्रमों में शामिल होने की अपील की।
इससे साफ है कि जादवपुर यूनिवर्सिटी को लेकर चल रहा राजनीतिक संघर्ष फिलहाल खत्म होने वाला नहीं है। आने वाले दिनों में यहां अलग-अलग संगठनों के कार्यक्रमों से राजनीतिक माहौल और गर्म रह सकता है।
कुछ दिन पहले हुआ था वंदे मातरम कार्यक्रम
गेरुआ सम्मान यात्रा से पहले शुभेंदु अधिकारी विश्वविद्यालय के बाहर आयोजित ‘वंदे मातरम’ कार्यक्रम में भी शामिल हुए थे। उस दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने सामूहिक रूप से वंदे मातरम गाया था।
उसी कार्यक्रम में अधिकारी ने विश्वविद्यालय में ‘आजादी’ और दूसरे विवादित नारों पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि कोलकाता की सड़कों पर ‘आजादी’ के नारे देखकर उन्हें दुख होता है।
उन्होंने सवाल किया था कि देश को 1947 में आजादी मिलने के बाद अब किस तरह की आजादी मांगी जा रही है।
कैंपस में ABVP और लेफ्ट के बीच बढ़ा तनाव
जादवपुर यूनिवर्सिटी लंबे समय से छात्र राजनीति का मजबूत केंद्र रही है। यहां वामपंथी छात्र संगठनों का प्रभाव ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहा है, जबकि हाल के वर्षों में ABVP भी अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
पिछले कुछ समय में दोनों विचारधाराओं से जुड़े छात्र संगठनों के बीच टकराव, प्रदर्शन और दीवारों पर राजनीतिक संदेश लिखने की घटनाओं ने माहौल को और तनावपूर्ण बनाया है।
हालिया विवाद में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कुछ दीवारों पर सफेदी कराने के बाद ABVP कार्यकर्ताओं ने ‘Free PoK’ और ‘Akhand Bharat’ जैसे संदेश लिख दिए थे। इसके बाद कैंपस में ग्रैफिटी और नारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई।
विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर भी नई बहस
जादवपुर यूनिवर्सिटी का विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल सरकार विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के प्रशासन से जुड़े नए कानून पर भी आगे बढ़ रही है।
सरकार ने West Bengal Universities and Colleges Administration and Regulation Amendment Bill, 2026 को लेकर कदम बढ़ाए हैं। शिक्षकों के एक वर्ग ने प्रस्तावित बदलावों पर सवाल उठाते हुए इसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और शिक्षकों की नौकरी की सुरक्षा से जोड़कर देखा है।
इस कारण जादवपुर का मौजूदा विवाद केवल छात्र संगठनों तक सीमित नहीं रहा। इसमें सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षक संगठन और अलग-अलग राजनीतिक दल भी आमने-सामने आ रहे हैं।
राजनीतिक लड़ाई का नया केंद्र बना JU
जादवपुर यूनिवर्सिटी अब बंगाल की राजनीति में एक बड़े वैचारिक प्रतीक के रूप में उभरती दिखाई दे रही है। एक तरफ लेफ्ट छात्र संगठन कैंपस की राजनीतिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परंपरा पर जोर देते हैं, वहीं भाजपा और ABVP विवादित नारों को राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं।
शुभेंदु अधिकारी ने इसी मुद्दे को राष्ट्रवाद और बंगाल के स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत से जोड़ा है। उनके भाषणों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, मातंगिनी हाजरा और श्री अरविंद जैसे नाम लगातार सामने आए हैं।
दूसरी तरफ उनके आक्रामक बयानों की आलोचना भी हुई है। विरोधियों और कुछ स्थानीय आवाजों ने सवाल उठाया कि सरकार और मुख्यमंत्री को छात्रों तथा विश्वविद्यालय के साथ राजनीतिक टकराव की भाषा से बचना चाहिए।
आने वाले दिनों में और बढ़ सकती है सियासी गर्मी
फिलहाल जादवपुर यूनिवर्सिटी की दीवारों पर लिखे नारों से शुरू हुआ विवाद बड़े राजनीतिक संघर्ष में बदल चुका है। ‘कश्मीर मांगे आजादी’, ‘लाल सलाम किशनजी’, ‘Free PoK’ और ‘Akhand Bharat’ जैसे अलग-अलग नारों ने विश्वविद्यालय को वैचारिक टकराव के केंद्र में ला दिया है।
9 सितंबर की गेरुआ सम्मान यात्रा में शुभेंदु अधिकारी ने साफ कर दिया कि उनकी सरकार इस मुद्दे को हल्के में नहीं लेने वाली। उन्होंने कथित ‘कश्मीर आजादी’ और ‘लाल सलाम’ वाली ताकतों को परिसर से उखाड़ने की बात कही और गीता तथा हनुमान चालीसा के पाठ के साथ फिर लौटने का ऐलान किया।
अब नजर विश्वविद्यालय प्रशासन के अगले कदम और छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया पर रहेगी। फिलहाल इतना साफ है कि जादवपुर यूनिवर्सिटी में नारों की लड़ाई अब कैंपस की दीवारों से निकलकर बंगाल की बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन चुकी है।
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