कोलकाता। पश्चिम बंगाल में इस बार दुर्गा पूजा उत्सव का रंग कुछ अलग नजर आने वाला है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने के बाद पहली बार होने जा रहे दुर्गा पूजा आयोजन को लेकर कई नए फैसले सामने आए हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से जारी निर्देशों के बाद पूजा समितियों को मिलने वाले सरकारी अनुदान में कटौती की गई है। इसके अलावा अष्टमी के दिन ड्राय डे घोषित करने और डीजे समेत कुछ अन्य गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला भी चर्चा में है।
दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव माना जाता है। हर साल लाखों लोग पूजा पंडालों में पहुंचते हैं और राज्यभर में बड़े स्तर पर आयोजन होते हैं। ऐसे में सरकार के नए निर्देशों को लेकर पूजा समितियों और आम लोगों के बीच चर्चा तेज हो गई है।
पूजा समितियों के अनुदान में कटौती
भाजपा सरकार की ओर से इस बार दुर्गा पूजा समितियों को दिए जाने वाले सरकारी अनुदान में 10 हजार रुपये की कटौती की गई है। सरकार का कहना है कि यह फैसला प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
वहीं, कुछ पूजा समितियों का कहना है कि आयोजन का खर्च लगातार बढ़ रहा है और ऐसे समय में अनुदान में कमी से छोटे आयोजकों को परेशानी हो सकती है। समितियों को पंडाल निर्माण, सुरक्षा व्यवस्था, बिजली, साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाओं पर बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है।
अष्टमी पर ड्राय डे का ऐलान
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से जारी निर्देशों में अष्टमी के दिन ड्राय डे घोषित करने का भी फैसला शामिल है। इसका मतलब है कि इस दिन शराब की बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध रहेगा।
सरकार का कहना है कि धार्मिक आयोजन के दौरान अनुशासन और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है। हालांकि, इस फैसले पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा शुरू हो गई है।
डीजे और शोर नियंत्रण पर सख्ती
दुर्गा पूजा के दौरान बड़े पंडालों में तेज आवाज वाले डीजे और लाउडस्पीकर का इस्तेमाल आम बात रही है। लेकिन इस बार भाजपा सरकार ने ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए डीजे समेत कुछ गतिविधियों पर रोक लगाने का फैसला किया है।
सरकार का तर्क है कि त्योहार के दौरान लोगों की सुविधा और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए नियम जरूरी हैं। वहीं, कुछ आयोजकों का मानना है कि परंपरागत उत्सव में बदलाव से लोगों की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
BJP सरकार के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है। ऐसे में भाजपा सरकार के कार्यकाल में होने वाला पहला दुर्गा पूजा उत्सव राजनीतिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भाजपा लंबे समय से बंगाल की संस्कृति और परंपराओं को लेकर अपनी राजनीति करती रही है। अब सरकार बनने के बाद त्योहारों को लेकर लिए गए फैसलों पर भी लोगों की नजर बनी हुई है।
पूजा समितियों के सामने नई चुनौतियां
दुर्गा पूजा समितियां हर साल भव्य आयोजन की तैयारी करती हैं। बड़े पंडाल, आकर्षक सजावट और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर भारी खर्च होता है।
अनुदान में कमी और नए नियमों के कारण समितियों को अपने बजट में बदलाव करना पड़ सकता है। छोटे आयोजकों के लिए यह चुनौती और बड़ी हो सकती है।
हालांकि, कई समितियां सरकार के निर्देशों का पालन करने की बात कह रही हैं और आयोजन को सफल बनाने की तैयारी में जुटी हैं।
विपक्ष ने उठाए सवाल
सरकार के इन फैसलों को लेकर विपक्षी दलों ने भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा सरकार दुर्गा पूजा जैसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन में भी अनावश्यक हस्तक्षेप कर रही है।
वहीं, भाजपा नेताओं का कहना है कि सरकार का उद्देश्य किसी परंपरा को रोकना नहीं, बल्कि त्योहार को व्यवस्थित और सुरक्षित तरीके से आयोजित करना है।
नए नियमों के बीच होगा दुर्गा पूजा आयोजन
इस बार पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का आयोजन नए नियमों और दिशानिर्देशों के बीच होगा। सरकार जहां प्रशासनिक व्यवस्था और अनुशासन पर जोर दे रही है, वहीं पूजा समितियां परंपरागत उत्साह बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं।
दुर्गा पूजा शुरू होने के साथ ही यह साफ होगा कि नए नियमों का आयोजन और लोगों की भागीदारी पर कितना असर पड़ता है।
कुल मिलाकर, भाजपा सरकार के दौर का पहला दुर्गा पूजा उत्सव राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तीनों लिहाज से खास रहने वाला है। अनुदान कटौती, ड्राय डे और डीजे प्रतिबंध जैसे फैसलों ने पहले ही इस आयोजन को चर्चा का केंद्र बना दिया है।