पश्चिम बंगल। तृणमूल कांग्रेस पर अधिकार को लेकर ममता बनर्जी और रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुटों के बीच चल रहे विवाद में शनिवार को चुनाव आयोग के सामने दोनों पक्षों ने अपनी बात रखी। आयोग ने रिताब्रता बनर्जी के गुट से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे हैं। रिताब्रता ने बताया कि उनके प्रतिनिधिमंडल ने आयोग की पूरी बेंच के सामने मौखिक रूप से अपना पक्ष प्रस्तुत किया और सदस्यों के सवालों के जवाब दिए। बातचीत के दौरान कुछ दस्तावेज भी दिखाए गए, जिसके बाद आयोग ने उनसे और अभिलेख उपलब्ध कराने को कहा।

यह विवाद पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और पार्टी की निधि पर नियंत्रण से जुड़े प्रतिद्वंद्वी दावों को लेकर है। दोनों गुट अपनी स्थिति चुनाव आयोग के सामने स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। शनिवार की बैठक इसी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण रही। अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाने की खबर से स्पष्ट है कि मामले में अभिलेख प्रस्तुत करने की प्रक्रिया अभी जारी है। उपलब्ध जानकारी में किसी गुट के पक्ष में अंतिम निर्णय घोषित होने का उल्लेख नहीं है।

रिताब्रता बनर्जी ने बैठक के बाद प्रतिनिधिमंडल की ओर से हुई बातचीत की जानकारी दी। उनके अनुसार, आयोग ने पक्ष रखने का अवसर दिया और विभिन्न प्रश्न पूछे। प्रतिनिधिमंडल ने उन सवालों का जवाब देने के साथ अपने दावे से संबंधित दस्तावेज दिखाए। हालांकि, आयोग ने किन विशिष्ट दस्तावेजों की मांग की और उन्हें जमा करने की क्या समयसीमा दी, इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है। अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाने का उल्लेख शनिवार को प्रकाशित समाचार रिपोर्टों में भी किया गया है।

इससे पहले रिताब्रता के नेतृत्व में पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के नई दिल्ली पहुंचने की खबर सामने आई थी। प्रतिनिधिमंडल पार्टी से जुड़े अपने दावे आयोग के सामने रखने आया था। इस घटनाक्रम ने तृणमूल के भीतर नेतृत्व और संगठन पर नियंत्रण की खींचतान को फिर प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। मौखिक प्रस्तुति के बाद दस्तावेज मांगे जाने से अब संबंधित गुट को अपनी बात लिखित अभिलेखों के जरिए आगे स्पष्ट करनी होगी।

आयोग ने दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों को 12 सितंबर को नई दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन में बैठक के लिए बुलाया था। इससे पहले प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया था कि विवाद के केंद्र में पार्टी का नाम, चुनाव चिह्न और निधि का नियंत्रण है। नंदीग्राम और रेजीनगर में प्रस्तावित उपचुनावों के कारण इस प्रक्रिया का महत्व बढ़ गया है। रिपोर्ट में 16 सितंबर की नामांकन समयसीमा से पहले स्थिति स्पष्ट होने की अपेक्षा व्यक्त की गई थी। इसे आयोग के अंतिम फैसले की घोषित समयसीमा नहीं माना जा सकता। 

रिताब्रता का गुट पहले स्वयं को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस बताते हुए पश्चिम बंगाल के विधायकों के बहुमत का समर्थन होने का दावा कर चुका है। यह दावा संबंधित गुट का है और इसे आयोग की स्वीकृति के बराबर नहीं देखा जाना चाहिए। राजनीतिक समर्थन के सार्वजनिक दावे और उनके पक्ष में प्रस्तुत दस्तावेज अलग पहलू हैं। आयोग के सामने अब दोनों पक्षों की प्रस्तुतियों के साथ संबंधित अभिलेख महत्वपूर्ण होंगे। 

ममता बनर्जी का पक्ष भी इस विवाद में अपना दावा रख रहा है। इससे पहले उन्होंने चुनाव आयोग से संबंधित प्रक्रिया जल्द पूरी करने की मांग की थी। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने रिताब्रता पक्ष को जवाब के लिए अतिरिक्त समय दिए जाने पर चिंता व्यक्त की थी। शनिवार को उनके गुट के भी आयोग के सामने उपस्थित होने से दोनों पक्षों की दलीलें सुनने का नया चरण सामने आया है। हालांकि, बैठक में ममता पक्ष की विस्तृत प्रस्तुति उपलब्ध विवरण में शामिल नहीं है।  

पार्टी के भीतर मतभेद इससे पहले संगठन के मुख्यालय तक भी पहुंच चुके हैं। जुलाई में ममता समर्थक पक्ष ने रिताब्रता गुट पर पार्टी कार्यालय पर कब्जा करने का आरोप लगाया था और कानूनी कार्रवाई की बात कही थी। कार्यालय से संबंधित विवाद और चुनाव आयोग के सामने पार्टी की पहचान को लेकर चल रही प्रक्रिया अलग प्रश्न हैं, लेकिन दोनों घटनाएं संगठन के भीतर संघर्ष की गंभीरता दिखाती हैं। कार्यालय पर कब्जे का आरोप भी संबंधित पक्ष के बयान के रूप में ही सामने आया था। टाइम्स ऑफ इंडिया

राजनीतिक दृष्टि से पार्टी की पहचान पर अनिश्चितता कार्यकर्ताओं और संभावित उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण है। नाम और चुनाव चिह्न मतदाताओं के सामने संगठन की पहचान का आधार होते हैं। इसलिए उपचुनावों के निकट इस विवाद का समाधान दोनों गुटों के लिए अहम बन गया है। फिर भी केवल बैठक होने या अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी पक्ष का दावा स्वीकार या अस्वीकार कर दिया गया है।

अब आगे का ध्यान रिताब्रता गुट द्वारा मांगे गए दस्तावेज जमा करने और आयोग की अगली आधिकारिक जानकारी पर रहेगा। दोनों पक्षों के दावों पर अंतिम स्थिति संबंधित आदेश से स्पष्ट होगी। फिलहाल शनिवार का घटनाक्रम सुनवाई और दस्तावेजी प्रस्तुति की प्रक्रिया में प्रगति दर्शाता है। तृणमूल के नाम, चिह्न और निधि पर अधिकार को लेकर दोनों गुटों के बीच संघर्ष जारी है।

Tags: