कोलकाता। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सत्ता से बाहर करने के छह महीने से भी कम समय के भीतर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। यह चुनौती विपक्षी दलों से मुकाबला करने की नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की पार्टी छोड़कर आए नेताओं और उनके समर्थकों के राजनीतिक भविष्य को लेकर है। आगामी कोलकाता नगर निगम (KMC) चुनाव से पहले पूर्व टीएमसी नेताओं की बढ़ती सक्रियता ने भाजपा के भीतर उम्मीदवार चयन और गठबंधन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
नवंबर के अंतिम सप्ताह में संभावित कोलकाता नगर निगम चुनाव में कुल 209 वार्डों के लिए मतदान होना है। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) से जुड़े नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, भाजपा नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी सभी 209 वार्डों में अपने चुनाव चिह्न पर उम्मीदवार उतारेगी और किसी अन्य दल के साथ सीटों का बंटवारा नहीं करेगी।
विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद भाजपा की नई परीक्षा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए राज्य में पहली बार अपनी सरकार बनाई। निर्वाचन आयोग के परिणामों के अनुसार, भाजपा ने 207 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई।
इस चुनावी परिणाम ने राज्य की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल दी। लंबे समय तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज रहीं ममता बनर्जी की पार्टी को बड़ा झटका लगा। दूसरी ओर, भाजपा के सामने अब राज्य की शहरी राजनीति में अपना प्रभाव मजबूत करने की चुनौती है।
विधानसभा चुनाव में जीत के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा है, लेकिन पार्टी के लिए नगर निगम चुनाव की राह उतनी आसान नहीं मानी जा रही। विशेष रूप से उम्मीदवारों के चयन और पूर्व टीएमसी नेताओं की भूमिका को लेकर संगठन के भीतर सावधानी बरती जा रही है।
TMC छोड़कर NCPI में शामिल हुए 20 सांसद
तृणमूल कांग्रेस की विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर राजनीतिक असंतोष बढ़ गया। जून 2026 में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया का दामन थाम लिया।
इन नेताओं में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, माला रॉय और सायनी घोष जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं।
NCPI ने केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को मुद्दों के आधार पर समर्थन देने का संकेत दिया। हालांकि, लोकसभा में इन सांसदों की अलग पहचान और दल-बदल कानून से जुड़े सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष अयोग्यता संबंधी प्रक्रिया भी चल रही है। आधिकारिक संसदीय रिकॉर्ड में इन सांसदों की स्थिति को लेकर अंतिम निर्णय बाकी है।
कोलकाता नगर निगम चुनाव में गठबंधन से भाजपा का इनकार
आगामी नगर निगम चुनाव को लेकर भाजपा ने NCPI के साथ गठबंधन की संभावनाओं को खारिज कर दिया है।
पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया है कि पार्टी कोलकाता और हावड़ा नगर निगम चुनाव अपनी संगठनात्मक ताकत के आधार पर लड़ेगी।
केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री और कोलकाता नगर निगम चुनाव की तैयारियों से जुड़े प्रमुख भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने भी कहा है कि भाजपा सभी 209 वार्डों में स्वतंत्र रूप से उम्मीदवार उतारेगी।
उनके अनुसार, पार्टी को किसी अन्य राजनीतिक संगठन के साथ सीटों का समझौता करने का निर्देश नहीं मिला है। इससे उन पूर्व तृणमूल नेताओं की उम्मीदों को झटका लगा है, जो भाजपा के साथ चुनावी तालमेल की संभावना देख रहे थे।
टिकट वितरण में पुराने कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता
भाजपा नेतृत्व ने संकेत दिया है कि नगर निगम चुनाव में उम्मीदवारों के चयन के दौरान पार्टी के पुराने और सक्रिय कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जाएगी।
हालांकि, पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया है कि उम्मीदवार की जीतने की क्षमता, सार्वजनिक छवि और संगठनात्मक योगदान को ध्यान में रखा जाएगा।
भाजपा ने संभावित उम्मीदवारों से आवेदन भी आमंत्रित किए थे। इसके लिए 26 अक्टूबर तक आवेदन जमा करने की समयसीमा निर्धारित की गई थी।
पार्टी नेतृत्व ने उम्मीदवार चयन के लिए बूथ स्तर से लेकर जिला और प्रदेश संगठन तक के पदाधिकारियों की राय लेने की रणनीति बनाई है।
यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा को एक ओर अपने वर्षों पुराने कार्यकर्ताओं का भरोसा बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाले नए चेहरों की राजनीतिक उपयोगिता का भी आकलन करना है।
पूर्व टीएमसी नेताओं को लेकर भाजपा में असहजता
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जिन तृणमूल नेताओं के खिलाफ उसके कार्यकर्ता वर्षों तक राजनीतिक संघर्ष करते रहे, उन्हीं नेताओं या उनके सहयोगियों को अब चुनावी राजनीति में किस तरह स्थान दिया जाए।
पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं में आशंका है कि यदि पूर्व टीएमसी नेताओं को बड़े पैमाने पर उम्मीदवार बनाया गया तो पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हो सकता है।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए नेताओं के पास स्थानीय राजनीतिक अनुभव, समर्थकों का नेटवर्क और चुनाव प्रबंधन की क्षमता मौजूद है।
ऐसे में भाजपा के लिए यह निर्णय राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया है। पार्टी का फिलहाल जोर संगठन की एकजुटता बनाए रखते हुए मजबूत उम्मीदवार मैदान में उतारने पर है।
144 से बढ़कर 209 हुए कोलकाता नगर निगम के वार्ड
इस बार कोलकाता नगर निगम चुनाव कई मायनों में अलग होंगे। राज्य विधानसभा ने अगस्त 2026 में नगर निगम वार्डों के पुनर्सीमांकन से संबंधित विधेयक पारित किया था।
इसके तहत कोलकाता नगर निगम के वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 कर दी गई है। यानी इस बार 65 अतिरिक्त वार्डों में चुनावी मुकाबला देखने को मिलेगा।
वार्डों की संख्या बढ़ने के कारण राजनीतिक दलों को नए क्षेत्रों में संगठन विस्तार, उम्मीदवार चयन और चुनाव प्रचार की रणनीति तैयार करनी पड़ रही है।
भाजपा के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण अवसर भी माना जा रहा है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में मिली सफलता को पार्टी अब नगर निगम स्तर पर दोहराना चाहती है।
ममता बनर्जी की पार्टी के लिए भी बड़ी चुनौती
नगर निगम चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके राजनीतिक समर्थकों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होंगे।
विधानसभा चुनाव में हार और उसके बाद पार्टी के भीतर हुई टूट ने तृणमूल कांग्रेस के सामने संगठन को फिर से मजबूत करने की चुनौती खड़ी कर दी है।
कोलकाता की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का लंबे समय तक प्रभाव रहा है। ऐसे में आगामी चुनाव को पार्टी के जनाधार और स्थानीय संगठन की क्षमता की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
वहीं भाजपा इस चुनाव में जीत हासिल करके यह संदेश देना चाहती है कि विधानसभा चुनाव में मिली सफलता केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं थी, बल्कि राज्य के शहरी मतदाताओं के बीच भी उसका समर्थन बढ़ा है।
नवंबर में संभावित मतदान, उम्मीदवारों की सूची पर नजर
कोलकाता सहित पश्चिम बंगाल के सात नगर निकायों में नवंबर के अंतिम सप्ताह में चुनाव कराए जाने की संभावना है। हालांकि, 27 अक्टूबर तक मतदान की आधिकारिक तारीख घोषित नहीं हुई है।
भाजपा की ओर से चुनाव कार्यक्रम सामने आने के बाद उम्मीदवारों की सूची जारी किए जाने की तैयारी है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इस चुनाव में भाजपा के लिए केवल विपक्ष को पराजित करना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी को अपने पुराने कार्यकर्ताओं, नए राजनीतिक समर्थकों और तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए नेताओं के बीच संतुलन भी बनाना होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा पूर्व टीएमसी नेताओं से दूरी बनाए रखते हुए कोलकाता नगर निगम में बहुमत हासिल कर पाएगी या बागी नेताओं की राजनीतिक सक्रियता चुनावी समीकरणों को नया मोड़ देगी।