स्वामी रामदेव का विपक्ष पर हमला, बोले- लोकतंत्र को बंधक बनाने की कोशिश न हो
हरिद्वार। योगगुरु स्वामी रामदेव ने विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल सड़कों और संसद में हंगामा कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को बाधित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध और आंदोलन का अधिकार सभी को है, लेकिन विरोध के नाम पर अराजकता फैलाना उचित नहीं है। राजनीतिक दलों को देशहित और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
स्वामी रामदेव ने आंदोलन के दौरान छोटे बच्चों को आगे किए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पांच से दस वर्ष की उम्र के बच्चों को राजनीतिक आंदोलनों में आगे करना उचित नहीं है। बच्चों को राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बनाने के बजाय उन्हें शिक्षा और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी मुद्दे पर आवाज उठाने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में पर्याप्त अवसर और माध्यम मौजूद हैं।
बच्चों को आंदोलन से दूर रखने की अपील
स्वामी रामदेव ने कहा कि बच्चों को राजनीतिक आंदोलनों में शामिल करना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि छोटे बच्चों को आंदोलन में शामिल करने से आखिर किस उद्देश्य की पूर्ति होगी। बच्चों की उम्र पढ़ाई, खेल और उनके मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी वर्ग के साथ अन्याय हुआ है और उसके खिलाफ आवाज उठानी है तो इसके लिए लोकतांत्रिक तरीके अपनाए जाने चाहिए। आंदोलन में भाग लेने वालों को कानून और व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए। उनके मुताबिक, विरोध दर्ज कराना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन विरोध के दौरान ऐसी गतिविधियां नहीं होनी चाहिएं जिनसे आम लोगों को परेशानी हो या व्यवस्था प्रभावित हो।
18 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिक करें आंदोलन
योगगुरु ने कहा कि यदि छात्रों, किसानों, जवानों या किसी भी वर्ग के साथ अन्याय हुआ है तो उसके खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है। हालांकि उन्होंने जोर दिया कि ऐसे आंदोलनों में 18 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिकों को ही आगे रहना चाहिए और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि देश में संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाएं लोगों को अपनी बात रखने का अधिकार देती हैं। शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन, ज्ञापन और संवाद जैसे माध्यमों से सरकार तक अपनी मांग पहुंचाई जा सकती है। किसी मुद्दे पर असहमति होना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन असहमति को अराजकता का रूप नहीं दिया जाना चाहिए।
राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर देशहित
स्वामी रामदेव ने राजनीतिक दलों को देशहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने कहा कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए देशहित से समझौता नहीं किया जा सकता। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए काम करें।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को अपने विरोध और आंदोलन की रणनीति तय करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके कदमों का समाज और देश पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। संसद लोकतांत्रिक विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण मंच है, इसलिए वहां भी चर्चा और संवाद के माध्यम से मुद्दों को उठाया जाना चाहिए।
संसद में हंगामे पर भी जताई चिंता
स्वामी रामदेव ने संसद और सड़कों पर होने वाले हंगामे का जिक्र करते हुए कहा कि लगातार व्यवधान से लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है ताकि वे उसके मुद्दों को सदन में उठाएं और नीतियों पर सार्थक चर्चा करें।
उनके अनुसार, राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन मतभेदों का समाधान चर्चा और संवाद से होना चाहिए। सदन की कार्यवाही बाधित होने से जनता से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा नहीं हो पाती। इसलिए सभी राजनीतिक दलों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।
मतदाता खुद करेगा फैसला
योगगुरु ने कहा कि देश का मतदाता जागरूक और समझदार है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि वे किसी भी तरह जनता के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। अंततः चुनाव में जनता ही तय करती है कि उसे किसे अपना प्रतिनिधि चुनना है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता सबसे महत्वपूर्ण है और मतदाता अपने विवेक के आधार पर मतदान करता है। राजनीतिक दलों को जनता के बीच जाकर अपने काम और नीतियों के आधार पर समर्थन मांगना चाहिए। किसी भी प्रकार के दबाव, भ्रम या अराजकता के जरिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करना उचित नहीं है।
लोकतांत्रिक तरीके से उठे आवाज
स्वामी रामदेव ने कहा कि छात्रों, किसानों, जवानों या समाज के किसी अन्य वर्ग के साथ यदि अन्याय होता है तो उसके खिलाफ आवाज जरूर उठनी चाहिए। लेकिन आंदोलन का तरीका संविधान और कानून के दायरे में होना चाहिए। उन्होंने शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विरोध को प्राथमिकता देने की बात कही।
उन्होंने कहा कि देश के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं और इनका सामना राजनीतिक टकराव के बजाय सामूहिक प्रयासों से किया जाना चाहिए। देशहित से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक दलों को एक-दूसरे के साथ संवाद कायम करना चाहिए।
स्वामी रामदेव के बयान के बाद राजनीतिक हलकों में इसे विपक्ष की आंदोलनकारी राजनीति पर टिप्पणी के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने एक तरफ लोकतांत्रिक तरीके से विरोध के अधिकार को स्वीकार किया, वहीं दूसरी तरफ हंगामा, अराजकता और बच्चों को आंदोलनों में आगे करने पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए राजनीतिक दलों, नागरिकों और जनप्रतिनिधियों सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।