हरिद्वार। प्राचीन अवधूत मंडल आश्रम में आयोजित संत समागम में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ के मुद्दे पर संत समाज ने विस्तार से संवाद किया। समागम में शामिल साधु-संतों ने इस पहल का समर्थन करते हुए इसे देश के लिए महत्वपूर्ण बताया। संतों ने कहा कि हरिद्वार की धरती से शुरू हुए अनेक आंदोलनों और अभियानों ने देश को नई दिशा दी है। इसी तरह एक राष्ट्र-एक चुनाव को लेकर संत समाज ने जो अलख जगाई है, वह भी अपने उद्देश्य तक पहुंचेगी।

संत समागम में विभिन्न संतों और धर्माचार्यों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के दौरान देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की अवधारणा पर चर्चा की गई। संतों ने इस विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों से प्रशासनिक व्यवस्था के साथ विकास कार्यों पर भी प्रभाव पड़ता है। एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था लागू होने से समय और संसाधनों की बचत होने की बात कही गई।

नया अखाड़ा के महामंडलेश्वर करौली शंकर महाराज ने कहा कि ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ के मुद्दे पर साधु-संत एकजुट हैं और इसका समर्थन करते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि एक राष्ट्र-एक चुनाव का संकल्प आने वाले समय में पूरा होगा। उन्होंने कहा कि देश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर संत समाज हमेशा अपनी भूमिका निभाता आया है और आगे भी राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात मजबूती से रखता रहेगा।

महामंडलेश्वर करौली शंकर महाराज ने कहा कि चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन अलग-अलग समय पर लगातार चुनाव होने से देश में लंबे समय तक चुनावी माहौल बना रहता है। ऐसे में यदि संवैधानिक और कानूनी व्यवस्थाओं के अनुरूप लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की व्यवस्था बनती है तो इसके विभिन्न पहलुओं पर समाज के बीच सकारात्मक और व्यापक चर्चा होनी चाहिए।

संत समागम में मौजूद संतों ने कहा कि हरिद्वार केवल धार्मिक और आध्यात्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का भी प्रमुख केंद्र रहा है। यहां से समय-समय पर समाज सुधार और राष्ट्रहित से जुड़े संदेश दिए जाते रहे हैं। उनका कहना था कि हरिद्वार से उठने वाली आवाज पूरे देश तक पहुंचती है। इसी कारण एक राष्ट्र-एक चुनाव को लेकर यहां आयोजित संवाद को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

संतों ने कहा कि एक राष्ट्र-एक चुनाव का विषय केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके संभावित लाभ, चुनौतियों और संवैधानिक पहलुओं पर समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच चर्चा होनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता की भागीदारी सर्वोपरि है और चुनाव व्यवस्था में किसी भी बड़े बदलाव को व्यापक विचार-विमर्श और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

कार्यक्रम के दौरान संतों ने चुनावों में होने वाले खर्च और प्रशासनिक संसाधनों के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना था कि देश के अलग-अलग राज्यों में अलग समय पर चुनाव होने के कारण बड़ी संख्या में प्रशासनिक अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों की तैनाती करनी पड़ती है। इसके अलावा चुनावी प्रक्रिया के दौरान सरकारी मशीनरी का एक बड़ा हिस्सा चुनाव संबंधी कार्यों में व्यस्त रहता है।

संतों का मानना है कि यदि देश में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था व्यावहारिक रूप से लागू होती है तो इससे प्रशासन को विकास योजनाओं पर अधिक निरंतरता के साथ काम करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, इस तरह की व्यवस्था के लिए संवैधानिक और कानूनी स्तर पर आवश्यक प्रक्रिया पूरी करना जरूरी होगा।

संत समागम में वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए मतदाताओं की जागरूकता और अधिक से अधिक मतदान भी आवश्यक है। केवल चुनाव की व्यवस्था में बदलाव ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नागरिकों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना भी जरूरी है। संत समाज इसके लिए लोगों को जागरूक करने में अपनी भूमिका निभा सकता है।

साधु-संतों ने कहा कि राष्ट्रहित के मुद्दों पर समाज को जोड़ने की आवश्यकता है। किसी भी बड़े बदलाव को लेकर लोगों के बीच संवाद होना चाहिए और अलग-अलग विचारों को सुना जाना चाहिए। संत समाज ने एक राष्ट्र-एक चुनाव के समर्थन में अपनी बात रखते हुए इसे लेकर जनजागरण की आवश्यकता भी बताई।

प्राचीन अवधूत मंडल आश्रम में हुए इस संत समागम के जरिए ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। संतों ने कहा कि हरिद्वार से शुरू हुए अनेक अभियान सफल हुए हैं और उन्हें उम्मीद है कि इस विषय पर शुरू हुआ संवाद भी देशभर में आगे बढ़ेगा। महामंडलेश्वर करौली शंकर महाराज ने दोहराया कि साधु-संत इस पहल को लेकर एकजुट हैं और इसका समर्थन करते हैं।

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