हरिद्वार: हरतालिका तीज के पर्व पर सामवेदी ब्राह्मणों का उपाकर्म पर्व धार्मिक विधिविधान और वैदिक परंपराओं के साथ संपन्न हुआ। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि और हस्त नक्षत्र के अवसर पर सामवेदी ब्राह्मणों ने गंगा तट पर हेमाद्रि स्नान किया। इसके बाद ऋषि तर्पण सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर मंत्रोच्चार के बीच नया यज्ञोपवीत धारण किया।

हरतालिका पर्व के अवसर पर सामवेदी ब्राह्मणों व श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान कर विधिवत पूजा-अर्चना की। पं. मनोज त्रिपाठी के नेतृत्व में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच ऋषि तर्पण किया गया और यज्ञोपवीत संस्कारित करने के पश्चात निर्धारित विधि के अनुसार नवीन यज्ञोपवीत धारण किया गया। पूजा-अर्चना के दौरान भगवान से परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य की कामना की गई।

पं. देवेन्द्र शुक्ल शास्त्री के मुताबिक सनातन परंपरा में अलग-अलग वेदों को मानने वाले ब्राह्मणों के उपाकर्म की तिथि और परंपरा अलग-अलग निर्धारित है। उनके अनुसार यजुर्वेदी ब्राह्मणों का उपाकर्म श्रावण मास की शुक्ल पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के अवसर पर होता है, जबकि ऋग्वेदी ब्राह्मणों का उपाकर्म श्रावण शुक्ल पक्ष के श्रवण नक्षत्र में संपन्न होता है। वहीं सामवेदी ब्राह्मण भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, जिसे हरतालिका तीज के रूप में भी जाना जाता है, को हस्त नक्षत्र में उपाकर्म करते हैं।

उन्होंने बताया कि उपाकर्म के दौरान सामवेदी परंपरा में निर्धारित तिथि पर गंगा स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद नवीन यज्ञोपवीत धारण करना विशेष महत्व रखता है। इसके बाद घरों में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं और परिवार के साथ पर्व मनाया जाता है।

उन्होंने बताया कि ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के आधार पर सनातन परंपरा में अनेक धार्मिक पूजा पद्धतियों और कर्मकांडों का निर्धारण हुआ है। प्रत्येक वेद की अपनी विशिष्ट परंपराएं और अनुष्ठान हैं, जिन्हें संबंधित समुदाय पीढ़ियों से निभाता आ रहा है।

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