जनता से रिश्ता वेबडेस्क : हरिद्वार को हरि का द्वार कहा जाता है। इसका प्राचीन नाम मायापुरी है। यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य देखते ही बनता है। यहां का शांत वातावरण देखकर पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। यहां की हरियाली, बहती गंगा नदी, शांत और मनोहर घाट पर्यटकों को बहुत ही ज्यादा आकर्षित करता हैं।हरिद्वार में कुंभ स्नान का भी खास महत्व है. हरिद्वार में कुंभ का आयोजन हर की पौड़ी गंगा किनारे आयोजित किया जाता है. हरिद्वार सबसे पवित्र धार्मिक स्थल के रूप में जाना जाता है. मान्यता है कि हर की पौड़ी पर भगवान हरि यानि कि विष्णु जी के चरण पड़े थे, तभी से इस स्थान का नाम हरि कि पौड़ी पड़ा.हर की पौड़ी या ब्रह्मकुण्ड पवित्र नगरी हरिद्वार का मुख्य घाट है हर शाम सूर्यास्त के समय साधु संन्यासी गंगा आरती करते हैं, उस समय नदी का नीचे की ओर बहता जल पूरी तरह से रोशनी में नहाया होता है और याजक अनुष्ठानों में मग्न होते हैं.
कुंभ की कथा
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, समुद्र मंथन के दौरान जब समुद्र से अमृत कलश निकला तो देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लिए युद्ध शुरू हो गया है. इस दौरान जिस-जिस स्थान पर अमृत गिरा तो उन्हीं पवित्र स्थानों पर कुंभ मेले आयोजित किया जाने लगा. पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुंभ मेले में स्वर्ग से सभी देवी-देवता धरती पर भ्रमण के लिए उतरते हैं. तो जो भी श्रद्धालु कुंभ स्नान करता है उनपर देवी-देवता विशेष रूप से अपनी कृपा बरसाते हैं. कुंभ मेला हरिद्वार के अलावा उज्जैन में शिप्रा नदी में, नासिक में गोदावरी किनारे और प्रयागराज (इलाहाबाद) के गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल पर लगता हैं.सनातन पंरपरा में व्यक्ति जीवन की शुरुआत से लेकर अंतिम यात्रा तक गंगा से जुड़ा रहता है। जीते जी कोई पाप से मुक्ति के लिए तो कोई मोक्ष की कामना लेकर गंगा में डुबकी लगाता है।
वहीं अंतिम संस्कार के बाद उसकी अस्थियां तक इसी गंगा में प्रवाहित कर दी जाती हैं। स्वर्ग से उतरकर मां गंगा भगवान शिव जी की जटाओं से होते हुए राजा भागीरथ के पीछे पीछे चल पड़ीं। जब राजा भागीरथ गंगा नदी को लेकर हरिद्वार पहुंचे तो सागर पौत्रों के भस्म हुए अवशेष को गंगा के स्पर्श मात्र से मोक्ष प्राप्त हो गया। उसी समय से हरिद्वार के इस पावन घाट अस्थि विसर्जन होने लगा। मान्यता है कि जब तक गंगा में व्यक्ति की अस्थियां रहती हैं तब तक वह स्वर्ग का अधिकारी बना रहता है। इसी पवित्रता को ध्यान में रखकर अंतिम समय में भी व्यक्ति के मुंह में गंगाजल डाला जाता है।