देहरादून। उत्तराखंड में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची को लेकर सामने आ रहे दावे और आपत्तियों के आंकड़ों ने निर्वाचन अधिकारियों का भी ध्यान खींचा है। आपत्तियों की पड़ताल में एक दिलचस्प तथ्य सामने आया है कि एक ही आवेदक ने अलग-अलग मतदाताओं के नामों को लेकर करीब 150 आपत्तियां दर्ज कराई हैं। अब ऐसे मामलों में निर्वाचन विभाग दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देने की तैयारी में है। आपत्ति दर्ज कराने वाले आवेदक के साथ-साथ जिस मतदाता के खिलाफ आपत्ति दाखिल की गई है, उसे भी नोटिस जारी किया जाएगा।

उत्तराखंड में भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर SIR की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना है। राज्य में इस अभियान की शुरुआत जून में बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) के माध्यम से घर-घर जाकर गणना प्रपत्र उपलब्ध कराने के साथ हुई थी।

SIR के तहत मतदाताओं के पुराने रिकॉर्ड और वर्तमान विवरण का मिलान किया जा रहा है। इस प्रक्रिया के दौरान नाम, पता, उम्र, स्थान परिवर्तन, मृत्यु, दोहरी प्रविष्टि समेत विभिन्न तरह की विसंगतियों की पहचान की गई है। इसके बाद दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू हुई। उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर SIR से संबंधित ड्राफ्ट रोल, अनुपस्थित-स्थानांतरित-मृत मतदाताओं की सूची और अन्य दस्तावेज भी उपलब्ध कराए गए हैं।

एक आवेदक की 150 आपत्तियों से बढ़ी चर्चा

आपत्तियों के आंकड़ों की समीक्षा के दौरान एक आवेदक द्वारा करीब 150 आपत्तियां दर्ज कराए जाने का मामला सामने आया है। इतनी बड़ी संख्या में आपत्तियां एक ही व्यक्ति की ओर से दाखिल किए जाने के बाद निर्वाचन अधिकारियों के स्तर पर भी इस मामले को गंभीरता से देखा जा रहा है।

हालांकि, केवल बड़ी संख्या में आपत्ति दर्ज कराना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सभी आपत्तियां गलत हैं। प्रत्येक आपत्ति की अलग-अलग जांच की जाएगी। निर्वाचन प्रक्रिया में किसी मतदाता के नाम पर आपत्ति आने के बाद संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना जरूरी है। यही वजह है कि विभाग अब आपत्ति दर्ज कराने वाले और संबंधित मतदाता, दोनों को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया अपनाएगा।

दोनों पक्षों को मिलेगा सुनवाई का मौका

निर्वाचन विभाग की प्रक्रिया के अनुसार, किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति दर्ज होने पर संबंधित मतदाता को नोटिस देकर जवाब मांगा जाएगा। वहीं, आपत्ति दाखिल करने वाले व्यक्ति को भी यह बताना होगा कि उसने किस आधार पर संबंधित नाम पर आपत्ति की है।

इसके बाद निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी यानी ERO दोनों पक्षों की बात सुनेंगे। उपलब्ध दस्तावेजों, रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर यह तय किया जाएगा कि आपत्ति में कितनी सच्चाई है और मतदाता का नाम सूची में रखा जाना है या नहीं।

इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अंतिम निर्णय केवल आपत्ति दर्ज होने के आधार पर नहीं लिया जाएगा। ERO को दोनों पक्षों को सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के बाद निर्णय लेना होगा। इससे पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाने की आशंका को कम करने में मदद मिलेगी।

करीब 19 लाख नामों में मिली थी विसंगति

उत्तराखंड में SIR के पहले चरण के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 19 लाख मतदाताओं के नाम या विवरण में किसी न किसी तरह की विसंगति पाए जाने की जानकारी सामने आई थी। इन मामलों में संबंधित मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने और दावे-आपत्तियां दाखिल करने का अवसर दिया गया।

SIR का मकसद केवल मतदाता सूची से नाम हटाना नहीं, बल्कि वास्तविक और पात्र मतदाताओं का नाम सही तरीके से सूची में बनाए रखना भी है। इसी कारण निर्वाचन आयोग ने दावा और आपत्ति की प्रक्रिया में सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है।

राजनीतिक दलों की भी नजर

मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों की भी नजर बनी हुई है। उत्तराखंड में आने वाले चुनावों के मद्देनजर मतदाता सूची में होने वाला हर बदलाव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में आपत्तियों की संख्या, उनके आधार और ERO के फैसलों पर सभी दलों की नजर रहेगी।

एक ही आवेदक द्वारा बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज कराने का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह सवाल उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में आपत्तियां किन आधारों पर दर्ज कराई गईं। निर्वाचन अधिकारी अब संबंधित मामलों की जांच के बाद ही इसकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट करेंगे।

अंतिम फैसला साक्ष्यों के आधार पर

निर्वाचन अधिकारियों के सामने अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि SIR की प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से पूरी हो। एक ओर जहां फर्जी, डुप्लीकेट या अपात्र नामों की पहचान जरूरी है, वहीं दूसरी ओर किसी भी पात्र मतदाता का नाम केवल आपत्ति के आधार पर सूची से बाहर नहीं होना चाहिए।

इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए नोटिस और सुनवाई की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। आपत्ति दर्ज कराने वाले और संबंधित मतदाता दोनों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलने के बाद ERO अंतिम निर्णय लेंगे।

उत्तराखंड में SIR की प्रक्रिया अब निर्णायक चरण की ओर बढ़ रही है। एक आवेदक द्वारा 150 आपत्तियां दर्ज कराने का मामला भले ही आंकड़ों की दृष्टि से असामान्य नजर आ रहा हो, लेकिन इन आपत्तियों की वास्तविकता सुनवाई और दस्तावेजों की जांच के बाद ही सामने आएगी। फिलहाल निर्वाचन विभाग की निगाहें इस बात पर हैं कि दावा-आपत्ति प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची का अंतिम स्वरूप क्या रहता है और कितने मामलों में नामों को लेकर दर्ज आपत्तियां सही साबित होती हैं।

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