हल्द्वानी: जंगल से सटे इलाकों में खुले में फेंका जा रहा मांस और पशुओं का जैविक कचरा इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की बड़ी वजह बनता जा रहा है। वन विभाग की पड़ताल में ऐसे 38 संवेदनशील ठिकाने चिह्नित किए गए हैं, जहां मांस की दुकानों और आसपास से निकलने वाला अपशिष्ट बाघ, तेंदुए और दूसरे मांसाहारी वन्यजीवों को आबादी की ओर आकर्षित कर सकता है। इन स्थानों पर आसानी से भोजन मिलने के कारण वन्यजीवों की आवाजाही बढ़ने और ग्रामीणों पर हमले का खतरा पैदा होने की आशंका जताई गई है।

जंगल के प्राकृतिक वातावरण में बाघ और तेंदुए आमतौर पर अपने शिकार की तलाश करते हैं। लेकिन जंगल की सीमा के आसपास यदि उन्हें आसानी से मांस, मृत पशु या अन्य जैविक अपशिष्ट मिलने लगे तो उनके आबादी की ओर आने की संभावना बढ़ जाती है। वन विभाग के लिए यही स्थिति चिंता का कारण बनी हुई है।
38 संवेदनशील स्थानों की पहचान
मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को रोकने के लिए वन विभाग ने जंगल से सटे इलाकों का सर्वे किया। इस दौरान 38 ऐसे स्थानों की पहचान की गई जहां मांस और पशु अपशिष्ट का अनुचित निस्तारण वन्यजीवों को आकर्षित कर सकता है। इनमें जंगल की सीमा से लगे बाजार, मांस की दुकानें और आबादी वाले इलाके शामिल हैं। वन विभाग का मानना है कि खुले में फेंके गए मांस के टुकड़े और पशुओं के अवशेष तेंदुए जैसे वन्यजीवों के लिए आसान भोजन बन जाते हैं। एक बार किसी वन्यजीव को किसी स्थान पर लगातार भोजन मिलने लगे तो उसके बार-बार उसी क्षेत्र में लौटने की आशंका बढ़ जाती है।
आसान भोजन की तलाश में आबादी तक पहुंच रहे वन्यजीव
विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि वन्यजीवों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भोजन उपलब्ध कराना उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। जंगल में शिकार करने की तुलना में आबादी के आसपास आसानी से भोजन मिलने पर तेंदुए, सियार और दूसरे मांसाहारी जानवर मानव बस्तियों के करीब आने लग सकते हैं। यही आदत बाद में ग्रामीणों और वन्यजीवों दोनों के लिए खतरा बन सकती है। रात के समय जंगल किनारे निकलने वाले लोगों, खेतों में काम करने वाले किसानों और पशुपालकों के लिए जोखिम अधिक रहता है।
बाघ-तेंदुए की दस्तक से ग्रामीणों में डर
जंगल से लगे गांवों में बाघ और तेंदुए की मौजूदगी की खबर मिलते ही लोगों में दहशत फैल जाती है। कई क्षेत्रों में ग्रामीण शाम ढलने के बाद अकेले बाहर निकलने से बचते हैं। बच्चों और बुजुर्गों को लेकर विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। पालतू कुत्ते, बकरी, भेड़ और अन्य छोटे पशु भी तेंदुओं के आसान शिकार बन सकते हैं। किसी वन्यजीव को एक बार आबादी के पास शिकार या भोजन मिलने पर उसके दोबारा आने की संभावना बनी रहती है। यही कारण है कि वन विभाग मांस और जैविक कचरे के सुरक्षित निस्तारण को मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने का महत्वपूर्ण उपाय मान रहा है।
मांस दुकानदारों पर बढ़ेगी निगरानी
संवेदनशील ठिकानों की पहचान के बाद मांस की दुकानों और कचरा निस्तारण व्यवस्था पर निगरानी बढ़ाने की तैयारी है। दुकानदारों को पशुओं के अवशेष खुले में नहीं फेंकने और निर्धारित तरीके से उनका निस्तारण करने के निर्देश दिए जा सकते हैं। स्थानीय निकायों और वन विभाग के बीच समन्वय भी जरूरी माना जा रहा है। केवल वन्यजीव को पकड़कर जंगल में छोड़ना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यदि आबादी के आसपास आसानी से भोजन मिलता रहेगा तो दूसरे वन्यजीव भी वहां पहुंच सकते हैं।
ग्रामीणों को भी किया जा रहा सतर्क
वन विभाग की ओर से जंगल किनारे रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। ग्रामीणों से रात में अकेले जंगल की तरफ नहीं जाने, बच्चों को सुनसान स्थानों पर अकेला नहीं छोड़ने और मवेशियों को सुरक्षित बाड़े में रखने को कहा जाता है। किसी बाघ या तेंदुए की मौजूदगी दिखाई देने पर उसके पास जाने, भीड़ लगाने या वीडियो बनाने की कोशिश करने के बजाय तुरंत वन विभाग को सूचना देना जरूरी है। वन्यजीव को घेरने या परेशान करने से उसके आक्रामक होने का खतरा बढ़ सकता है।
कचरे का सही निस्तारण सबसे जरूरी
इस समस्या का एक बड़ा समाधान मांस और पशु अपशिष्ट के सुरक्षित निस्तारण में छिपा है। यदि जंगल से लगे बाजारों और दुकानों से निकलने वाले जैविक कचरे को खुले में फेंकने से रोका जाए तो वन्यजीवों को आबादी तक खींचने वाले प्रमुख कारणों में से एक को कम किया जा सकता है।
वन विभाग द्वारा 38 संवेदनशील ठिकानों की पहचान इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब चुनौती इन स्थानों पर लगातार निगरानी और नियमों का पालन सुनिश्चित करने की होगी। बाघ और तेंदुए जैसे वन्यजीव जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उनका मानव बस्तियों के आसपास लगातार पहुंचना दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है। ऐसे में जंगल और आबादी के बीच सुरक्षित दूरी बनाए रखने के साथ उन कारणों को खत्म करना जरूरी है जो वन्यजीवों को गांवों और शहरों की ओर आकर्षित कर रहे हैं।
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