प्रयागराज। मृतक आश्रित कोटे में दी जाने वाली नियुक्तियों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि मृतक कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से उबारने के उद्देश्य से दी जाने वाली अनुकंपा नियुक्ति को केवल अस्थायी आधार पर नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसी नियुक्ति का उद्देश्य ही परिवार को तत्काल राहत देना है, इसलिए इसमें अनिश्चितता की स्थिति नहीं होनी चाहिए।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने ज्वाइनिंग लेटर में लिखी गई उस शर्त पर सवाल उठाया, जिसमें मृतक आश्रित कोटे से मिली नियुक्ति को अस्थायी बताया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति को नियमित सेवा व्यवस्था के तहत देखा जाना चाहिए और इसे लंबे समय तक अस्थायी नहीं रखा जा सकता।
ज्वाइनिंग लेटर की शर्त बनी विवाद का कारण
मामला एक कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके आश्रित को मिली नियुक्ति से जुड़ा था। नियुक्ति पत्र में एक शर्त शामिल की गई थी, जिसमें पद को अस्थायी बताया गया था।
इस शर्त को लेकर कर्मचारी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ता का कहना था कि मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने के बाद भी उसे स्थायी कर्मचारी की तरह अधिकार नहीं दिए जा रहे हैं।
याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने नियुक्ति की प्रकृति और अनुकंपा नियुक्ति के उद्देश्य पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य क्या है?
अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया से अलग होती है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को रोजगार का सामान्य अवसर देना नहीं, बल्कि मृत कर्मचारी के परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से राहत पहुंचाना होता है।
जब किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है तो उसके परिवार के सामने आर्थिक कठिनाइयां खड़ी हो जाती हैं। ऐसे समय में आश्रित को नौकरी देकर परिवार को सहारा देने की व्यवस्था की गई है।
कोर्ट ने कहा कि इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए नियुक्ति को अनिश्चितकाल तक अस्थायी नहीं रखा जा सकता।
लंबे समय तक अस्थायी रखना उचित नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को वर्षों तक अस्थायी स्थिति में रखना न्यायसंगत नहीं है। इससे कर्मचारी के भविष्य, नौकरी की सुरक्षा और सेवा लाभों पर असर पड़ता है।
अदालत ने माना कि मृतक आश्रित कोटे में नियुक्त व्यक्ति भी सरकारी सेवा का हिस्सा होता है और उसे नियमों के अनुसार अधिकार मिलना चाहिए।
नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति नियमों के तहत ही दी जानी चाहिए। इसमें पात्रता, योग्यता और विभागीय नियमों का पालन जरूरी है।
अनुकंपा नियुक्ति का मतलब यह नहीं है कि हर स्थिति में बिना किसी प्रक्रिया के नियुक्ति दी जाएगी। लेकिन एक बार नियुक्ति दिए जाने के बाद कर्मचारी को केवल अस्थायी स्थिति में नहीं रखा जा सकता।
कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण फैसला
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को मृतक आश्रित कोटे में नौकरी पाने वाले कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस फैसले से उन कर्मचारियों को राहत मिल सकती है, जिनकी नियुक्ति तो अनुकंपा आधार पर हुई है लेकिन उन्हें लंबे समय से अस्थायी कर्मचारी के रूप में रखा गया है।
सरकारी विभागों पर पड़ेगा असर
अदालत की टिप्पणी के बाद सरकारी विभागों में मृतक आश्रित नियुक्तियों की प्रक्रिया पर भी असर पड़ सकता है।
विभागों को अब नियुक्ति पत्र जारी करते समय शर्तों और सेवा नियमों को लेकर अधिक सावधानी बरतनी होगी।
कई मामलों में देखा गया है कि आश्रित को नौकरी तो मिल जाती है, लेकिन सेवा की स्थिति स्पष्ट नहीं होती। हाईकोर्ट की टिप्पणी इस तरह के मामलों में दिशा तय कर सकती है।
परिवार को आर्थिक सुरक्षा देना है उद्देश्य
अदालत ने अपने रुख से यह संदेश दिया कि मृतक आश्रित नियुक्ति केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक सुरक्षा की भावना जुड़ी हुई है।
सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक परेशानी से बचाने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई है।
इसलिए नियुक्त व्यक्ति को ऐसी स्थिति में नहीं रखा जाना चाहिए जहां उसे लंबे समय तक नौकरी की स्थिरता को लेकर चिंता बनी रहे।
आगे अन्य मामलों में भी असर संभव
हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में आने वाले ऐसे मामलों में भी महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। जिन कर्मचारियों को मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति मिली है और वे अस्थायी दर्जे को लेकर परेशान हैं, वे इस टिप्पणी का हवाला दे सकते हैं।
हालांकि हर मामले का फैसला संबंधित नियमों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा।