मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के ग्रामीण इलाकों में तेंदुओं की लगातार मौजूदगी ने लोगों की दिनचर्या बदल दी है। वन विभाग के अभियान के तहत ठाकुरद्वारा क्षेत्र के बलिया गांव में एक और तेंदुआ पिंजरे में कैद हुआ है। इसके साथ ही अभियान में पकड़े गए तेंदुओं की संख्या बढ़कर 17 हो गई है। लगातार तेंदुओं के पकड़े जाने से ग्रामीणों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन खेतों और जंगलों के आसपास तेंदुओं की मौजूदगी की आशंका के कारण डर अभी खत्म नहीं हुआ है।
तेंदुओं की दहशत का असर अब ग्रामीणों की बुनियादी जरूरतों से जुड़ी मांगों पर भी दिखाई दे रहा है। प्रभावित क्षेत्र के करीब 60 लोगों ने शौचालय की मांग की है। खुले में शौच के लिए घर से बाहर निकलना लोगों के लिए जोखिम भरा माना जा रहा है। खासतौर पर सुबह और शाम के समय ग्रामीण खेतों तथा झाड़ियों की ओर जाने से डर रहे हैं। स्थानीय लोगों की चिंता है कि तेंदुए कब और कहां दिखाई दे जाएं, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है।
वन विभाग ने प्रभावित इलाकों में तेंदुओं को पकड़ने के लिए अभियान चला रखा है। संवेदनशील स्थानों पर पिंजरे लगाने के साथ ही निगरानी और गश्त की जा रही है। इससे पहले भी ठाकुरद्वारा और कांठ क्षेत्र के अलग-अलग गांवों में तेंदुए पिंजरों में कैद हो चुके हैं। विभाग की कार्रवाई के बावजूद ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है, क्योंकि कई इलाकों में तेंदुओं की गतिविधियों की शिकायतें सामने आती रही हैं।
ताजा मामले में ठाकुरद्वारा क्षेत्र के बलिया गांव में वन विभाग की ओर से लगाया गया पिंजरा कामयाब रहा। तेंदुआ उसमें फंसने की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंच गए। कई लोग मोबाइल फोन से तेंदुए की तस्वीरें और वीडियो बनाने लगे। भीड़ बढ़ने पर पुलिस को भी मौके पर पहुंचना पड़ा और लोगों को पिंजरे से सुरक्षित दूरी पर रखा गया। इसके बाद तेंदुए को वन विभाग की टीम अपने साथ ले गई।
इससे पहले 16 सितंबर को कांठ तहसील क्षेत्र के रामसराय के मंझरा भंखरी में भी एक तेंदुआ पिंजरे में फंसा था। यहां करीब एक सप्ताह से पिंजरा लगाया गया था। इसी स्थान पर 24 अगस्त को भी एक तेंदुआ पकड़ा गया था। इसके अगले दिन 17 सितंबर को कांठ के भरतपुर गांव में एक और तेंदुआ पकड़ा गया। भरतपुर में खेत में चारा लेने गई निर्वेश देवी पर तेंदुए के हमले की घटना सामने आई थी, जिसमें महिला के सिर पर चोट लगी थी।
लगातार हो रही ऐसी घटनाओं के कारण ग्रामीणों में भय बना हुआ है। खेती-किसानी से जुड़े लोगों के लिए समस्या अधिक गंभीर है, क्योंकि उन्हें रोजाना खेतों में जाना पड़ता है। पशुओं के लिए चारा लेने, सिंचाई करने और अन्य कृषि कार्यों के दौरान खेतों तथा झाड़ियों के आसपास जाना उनकी मजबूरी है। तेंदुए की मौजूदगी की खबर मिलते ही कई लोग समूह बनाकर खेतों की ओर जाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
वन विभाग ने तेंदुआ प्रभावित इलाकों की पहचान कर निगरानी बढ़ाई है। इससे पहले विभाग ने ठाकुरद्वारा क्षेत्र के 42 संवेदनशील गांवों में निगरानी करने और रात में गश्त चलाने की जानकारी दी थी। तेंदुओं की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ट्रैप कैमरों का भी इस्तेमाल किया गया। वहीं सितंबर के मध्य तक अभियान में 46 पिंजरे लगाए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई थी।
ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चिंता सुबह और शाम का समय बना हुआ है। तेंदुए आमतौर पर आबादी से सटे खेतों, गन्ने की फसलों, झाड़ियों और जंगल वाले इलाकों में छिप सकते हैं। ऐसे में अंधेरे या कम रोशनी में बाहर निकलना जोखिम बढ़ा सकता है। यही वजह है कि प्रभावित गांवों में घरों में शौचालय की जरूरत को अब वन्यजीव सुरक्षा से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
करीब 60 लोगों की ओर से शौचालय की मांग सामने आना इसी समस्या की गंभीरता को दिखाता है। ग्रामीण चाहते हैं कि उन्हें खुले में शौच के लिए दूर खेतों या सुनसान इलाकों में न जाना पड़े। स्थानीय स्तर पर शौचालय उपलब्ध होने से खासकर महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को रात या सुबह के समय घर से दूर जाने की जरूरत कम हो सकती है।
तेंदुओं के लगातार पकड़े जाने का आंकड़ा भी इलाके में उनकी गतिविधियों के स्तर की ओर संकेत करता है। 10 सितंबर तक अभियान में 13 तेंदुओं को पकड़े जाने की सूचना थी। 13 सितंबर तक यह संख्या बढ़कर 14 हो गई और 17 सितंबर को भरतपुर में पकड़ा गया तेंदुआ 16वां बताया गया। अब बलिया क्षेत्र में तेंदुआ पकड़े जाने के बाद यह संख्या 17 तक पहुंच गई है।
वन विभाग के सामने चुनौती केवल तेंदुओं को पकड़ना नहीं, बल्कि मानव और वन्यजीव के बीच बढ़ते टकराव को कम करना भी है। आबादी और खेतों के आसपास तेंदुओं की आवाजाही के कारण लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ वन्यजीवों का सुरक्षित रेस्क्यू भी जरूरी है। यही कारण है कि विभाग पिंजरों, गश्त और निगरानी जैसे उपायों का इस्तेमाल कर रहा है।
फिलहाल 17वें तेंदुए के पकड़े जाने से बलिया और आसपास के ग्रामीणों ने कुछ राहत महसूस की है, लेकिन हाल की घटनाओं को देखते हुए सतर्कता जारी है। वन विभाग का रेस्क्यू अभियान भी चल रहा है। ग्रामीणों की शौचालय की मांग ने इस पूरे मामले का एक दूसरा पहलू सामने रखा है—तेंदुओं की दहशत अब सिर्फ जंगल या खेत तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें और जीवनशैली भी प्रभावित हो रही हैं।