निचलौल। सब्जियों के लगातार बढ़ते दाम ने परिवारों की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। रोजमर्रा के भोजन में इस्तेमाल होने वाले प्याज और लहसुन के साथ कई हरी सब्जियां भी महंगी हो गई हैं। दिए गए बाजार विवरण के अनुसार, एक महीने पहले 30 रुपये प्रति किलो बिकने वाला प्याज अब 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। लहसुन की कीमत में भी एक सप्ताह के भीतर उल्लेखनीय तेजी आई है। बारिश के कारण मंडियों में सब्जियों की आवक प्रभावित होने का असर फुटकर बाजार में दिखाई दे रहा है।

प्याज के दाम में हुई बढ़ोतरी घरेलू खर्च पर सीधा असर डाल रही है। एक महीने में इसकी कीमत 30 रुपये से बढ़कर 60 रुपये प्रति किलो होने का मतलब भाव दोगुना होना है। समान मात्रा खरीदने पर अब पहले के मुकाबले दोगुनी रकम खर्च करनी पड़ रही है। उदाहरण के लिए, दो किलो प्याज खरीदने का खर्च पहले 60 रुपये था, जो बताए गए नए भाव पर 120 रुपये हो गया है। यह गणना खरीद की समान मात्रा पर आधारित है और बढ़ोतरी का असर समझाती है।

लहसुन के भाव में तेजी और कम अवधि में आई है। एक सप्ताह पहले 140 रुपये प्रति किलो बिकने वाला लहसुन अब 200 से 220 रुपये प्रति किलो तक बताया जा रहा है। इस तरह इसकी कीमत में 60 से 80 रुपये प्रति किलो का अंतर आया है। पुराने भाव की तुलना में यह बढ़ोतरी लगभग 43 से 57 प्रतिशत है। हालांकि, लहसुन की खरीद प्याज के मुकाबले अक्सर कम मात्रा में होती है, फिर भी नियमित इस्तेमाल करने वाले परिवारों के लिए इसका बढ़ता मूल्य अतिरिक्त खर्च का कारण है।

कम मात्रा की खरीद पर भी इस अंतर को समझा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, 250 ग्राम लहसुन का खर्च 140 रुपये प्रति किलो के भाव पर 35 रुपये होता था। अब 200 से 220 रुपये प्रति किलो के अनुसार इतनी ही मात्रा के लिए 50 से 55 रुपये देने होंगे। यानी एक छोटी खरीद पर भी 15 से 20 रुपये अधिक खर्च होंगे। प्याज और लहसुन दोनों के भाव एक साथ बढ़ने से भोजन तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली बुनियादी सामग्री महंगी पड़ रही है।

हरी सब्जियों में परवल, टमाटर, गोभी और बैंगन समेत कई उत्पादों के भाव में तेजी बताई गई है। विभिन्न सब्जियों में बढ़ोतरी 10 से 80 रुपये प्रति किलो तक है। हालांकि, प्रत्येक सब्जी का पुराना और नया भाव अलग से उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी एक सब्जी की कीमत या उसकी बढ़ोतरी का निश्चित प्रतिशत बताना संभव नहीं है। उपलब्ध विवरण इतना स्पष्ट करता है कि महंगाई का असर केवल प्याज और लहसुन तक सीमित नहीं है। सब्जियों की अलग-अलग खरीद का संयुक्त खर्च भी बढ़ रहा है।

कीमतों में तेजी के पीछे बारिश से मंडियों की आवक प्रभावित होने की बात सामने आई है। उपलब्ध विवरण में सब्जियों की आपूर्ति कम होने और फुटकर भाव पर उसका असर पड़ने का उल्लेख है। हालांकि, संबंधित मंडी का नाम, दैनिक आवक की मात्रा और उसमें आई कमी के आंकड़े नहीं दिए गए हैं। ऐसे में आपूर्ति में गिरावट का निश्चित प्रतिशत नहीं बताया जा सकता। इसी तरह कीमतों में बढ़ोतरी के लिए किसी व्यापारी, भंडारण व्यवस्था या अन्य कारण को जिम्मेदार ठहराने का आधार उपलब्ध नहीं है।

सब्जियों के साथ खाद्य तेलों के दाम बढ़ने से रसोई पर दोहरा दबाव पड़ा है। भोजन बनाने के लिए सब्जियों और तेल दोनों की जरूरत होती है। दोनों श्रेणियों में खर्च बढ़ने पर समान भोजन तैयार करने की लागत पहले से अधिक हो सकती है। हालांकि, विवरण में सरसों, सोयाबीन या अन्य किसी विशेष तेल का भाव नहीं दिया गया है। तेल की कीमत में प्रति लीटर कितनी बढ़ोतरी हुई, यह भी स्पष्ट नहीं है। इसलिए परिवारों के कुल मासिक खर्च में निश्चित वृद्धि की गणना नहीं की जा सकती।

घरेलू बजट पर असर खरीद की मात्रा और परिवार की जरूरतों के अनुसार अलग होगा। जो परिवार पहले जैसी मात्रा खरीदते हैं, उनका खर्च बढ़ेगा। तय बजट में खरीद करने वालों के लिए कम मात्रा लेना या उपलब्ध विकल्पों की तुलना करना एक संभावित स्थिति हो सकती है। हालांकि, उपभोक्ताओं ने वास्तव में खरीद कितनी घटाई है, इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। किसी परिवार का बयान भी नहीं दिया गया है। इसलिए लोगों की प्रतिक्रिया के नाम पर काल्पनिक संवाद या अनुभव जोड़ना उचित नहीं होगा।

बताए गए भाव संबंधित बाजार विवरण पर आधारित हैं। स्थान, गुणवत्ता और दुकान के अनुसार फुटकर कीमतों में अंतर हो सकता है। इन्हें पूरे देश में एक समान लागू दर नहीं माना जा सकता। फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों में प्याज की कीमत एक महीने में दोगुनी होने और लहसुन के भाव एक सप्ताह में 200 से 220 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की बात प्रमुख है। हरी सब्जियों और खाद्य तेलों में तेजी ने भी खर्च बढ़ाया है। आगे कीमतों की दिशा समझने के लिए मंडियों की आवक और संबंधित बाजार के नए भाव महत्वपूर्ण होंगे।

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