लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सियासी बयानबाजी एक बार फिर तेज हो गई है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोलते हुए उसके राजनीतिक प्रयोगों और सामाजिक समीकरणों पर निशाना साधा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, **"लाल टोपी और नीला लिबास, काली कारतूतें ढकने का नया प्रयास।"** उनके इस बयान को समाजवादी पार्टी की मौजूदा राजनीतिक रणनीति और दलित-पिछड़ा समीकरण साधने की कोशिशों पर सीधे हमले के तौर पर देखा जा रहा है।
केशव प्रसाद मौर्य लगातार समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व को कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, परिवारवाद और पिछली सरकारों के कामकाज के मुद्दे पर घेरते रहे हैं। ताजा बयान में भी उन्होंने अपने खास अंदाज में सपा पर हमला किया। 'लाल टोपी' का इस्तेमाल उन्होंने समाजवादी पार्टी की पहचान के संदर्भ में किया, जबकि 'नीला लिबास' को दलित राजनीति और नए सामाजिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।
मौर्य के बयान के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर 'पीडीए' और भाजपा के सामाजिक गठजोड़ को लेकर बहस तेज होने की संभावना है।
लाल टोपी और नीला लिबास' के क्या हैं सियासी मायने?
समाजवादी पार्टी लंबे समय से लाल रंग और लाल टोपी के साथ पहचानी जाती है। वहीं उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीला रंग परंपरागत रूप से बहुजन और दलित राजनीति से जुड़ा रहा है। ऐसे में केशव मौर्य की टिप्पणी को केवल राजनीतिक तंज नहीं बल्कि सपा की सामाजिक रणनीति पर निशाने के तौर पर देखा जा रहा है।
समाजवादी पार्टी पिछले कुछ वर्षों से अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम वोट आधार से आगे निकलकर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA समीकरण को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी की कोशिश अलग-अलग पिछड़ी और दलित जातियों के मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की है।
भाजपा इस रणनीति की काट के लिए अपने गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित और सवर्ण मतदाताओं के गठजोड़ को मजबूत बनाए रखने की कोशिश कर रही है। ऐसे में दोनों दलों के बीच सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर सियासी टकराव लगातार बढ़ रहा है।
सपा की रणनीति पर सीधा निशाना
केशव प्रसाद मौर्य के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 'काली कारतूतें ढकने का नया प्रयास' है। इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने समाजवादी पार्टी के पिछले शासनकाल को निशाने पर लिया। भाजपा लंबे समय से सपा सरकार के दौर की कानून-व्यवस्था और कथित भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाती रही है।
भाजपा नेताओं का आरोप रहा है कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में अपराधियों और माफिया को संरक्षण मिलता था। दूसरी तरफ सपा इन आरोपों को खारिज करती रही है और भाजपा सरकार की कानून-व्यवस्था, रोजगार तथा सामाजिक न्याय की नीतियों पर सवाल उठाती है।
मौर्य का ताजा बयान इसी पुराने राजनीतिक टकराव को नए सामाजिक समीकरणों से जोड़ता दिखाई देता है।
PDA पर भाजपा की नजर
अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक साथ जोड़ने के लिए PDA की राजनीति को प्रमुखता दी है। चुनावी सभाओं से लेकर संगठनात्मक कार्यक्रमों तक समाजवादी पार्टी इस फॉर्मूले का लगातार जिक्र करती रही है।
भाजपा भी इसकी राजनीतिक अहमियत समझती है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं और विधानसभा की 403 सीटों पर जातीय तथा स्थानीय समीकरण बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी एक बड़े सामाजिक वर्ग का झुकाव भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
यही कारण है कि भाजपा के प्रमुख ओबीसी चेहरों में शामिल केशव प्रसाद मौर्य लगातार पिछड़े और दलित मतदाताओं से जुड़े मुद्दों पर सपा को घेरते दिखाई देते हैं।
अखिलेश यादव भी लगातार हमलावर
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव भी भाजपा सरकार पर लगातार निशाना साध रहे हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, महंगाई, किसानों के मुद्दे और सामाजिक न्याय जैसे सवालों को लेकर वह योगी सरकार को घेरते रहे हैं।
सपा का दावा है कि PDA रणनीति केवल चुनावी समीकरण नहीं बल्कि उन सामाजिक वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का प्रयास है, जिन्हें पार्टी के मुताबिक पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं मिलती।
भाजपा इसके जवाब में अपनी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और विभिन्न समुदायों को मिले लाभ का जिक्र करती है। पार्टी का कहना है कि उसकी योजनाएं जाति या धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सभी पात्र लाभार्थियों तक पहुंचाई गई हैं।
दलित वोट पर बढ़ी सियासी लड़ाई
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक का महत्व बेहद बड़ा है। लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी इस वोट बैंक की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकत रही। हालांकि बदलते चुनावी समीकरणों के बीच भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों दलित मतदाताओं में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
सपा की रणनीति में दलित नेताओं को संगठन और चुनावी राजनीति में अधिक जगह देना शामिल रहा है। दूसरी तरफ भाजपा केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों तथा अपने संगठन के जरिए दलित मतदाताओं तक पहुंच बनाए रखने की कोशिश करती है।
ऐसे में 'नीला लिबास' वाला केशव मौर्य का बयान इसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा जा सकता है।
भाजपा के बड़े ओबीसी चेहरे हैं केशव मौर्य
केशव प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रमुख पिछड़े वर्ग के नेताओं में गिने जाते हैं। वह प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी रह चुके हैं और राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। सपा के PDA फॉर्मूले का मुकाबला करने में भाजपा के लिए उनके बयानों और राजनीतिक सक्रियता का खास महत्व है।
मौर्य अक्सर सोशल मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों में अखिलेश यादव पर तीखे हमले करते हैं। उनकी राजनीतिक लाइन में सपा को परिवारवाद, गुंडागर्दी और तुष्टिकरण जैसे मुद्दों पर घेरना प्रमुख रहा है।
ताजा बयान में भी उन्होंने इसी राजनीतिक शैली को आगे बढ़ाते हुए सपा की नई रणनीति को उसके पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड से जोड़ने की कोशिश की है।
कानून-व्यवस्था भाजपा का बड़ा हथियार
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार कानून-व्यवस्था को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में गिनाती है। अपराधियों और माफिया के खिलाफ कार्रवाई को भाजपा चुनावी मंचों पर लगातार प्रमुखता देती रही है।
इसी के समानांतर भाजपा सपा के पिछले शासनकाल की तुलना मौजूदा सरकार से करती है। केशव मौर्य का 'काली कारतूतें' वाला बयान भी इसी राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने का प्रयास माना जा सकता है।
विपक्ष इसके जवाब में भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुई आपराधिक घटनाओं का हवाला देकर कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाता है। इस कारण आने वाले चुनावों में यह मुद्दा एक बार फिर भाजपा और सपा के बीच बड़े टकराव का कारण बन सकता है।
चुनाव से पहले तेज होगी जुबानी जंग
उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे चुनावी तैयारियां आगे बढ़ेंगी, भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। दोनों पार्टियां अपने-अपने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने में जुटी हैं।
सपा PDA के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रही है। भाजपा अपने पारंपरिक सवर्ण समर्थन के साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित मतदाताओं में पकड़ बनाए रखने पर जोर दे रही है।
ऐसे में राजनीतिक प्रतीकों और रंगों का इस्तेमाल भी चुनावी संदेश देने के लिए किया जा रहा है। लाल और नीले रंग को लेकर केशव मौर्य की टिप्पणी इसी रणनीतिक राजनीति का हिस्सा दिखाई देती है।
बयान से साफ हुआ चुनावी एजेंडा
केशव प्रसाद मौर्य के तीखे हमले से साफ है कि भाजपा समाजवादी पार्टी के सामाजिक गठजोड़ की कोशिशों को गंभीरता से ले रही है। पार्टी सपा की नई रणनीति को उसके पिछले शासनकाल के रिकॉर्ड से जोड़कर मतदाताओं के सामने पेश करना चाहती है।
वहीं समाजवादी पार्टी की कोशिश अपने PDA फॉर्मूले के जरिए भाजपा के मजबूत सामाजिक समीकरण में सेंध लगाने की है। ऐसे में आने वाले दिनों में दलित और पिछड़े मतदाताओं को लेकर दोनों दलों के बीच सियासी संघर्ष और तेज हो सकता है।
फिलहाल केशव मौर्य की पंक्ति—**'लाल टोपी और नीला लिबास, काली कारतूतें ढकने का नया प्रयास'**—ने यूपी की सियासत में नया राजनीतिक वार छेड़ दिया है। अब समाजवादी पार्टी इस हमले का किस अंदाज में जवाब देती है, इस पर भी राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी।