प्रयागराज। एफआईआर दर्ज कराने की मांग को लेकर सीधे हाईकोर्ट पहुंचने वालों को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम संदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज नहीं किए जाने के मामलों में हाईकोर्ट को पहला मंच नहीं बनाया जा सकता। पीड़ित को पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर पुलिस शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं करती है तो कानून में इसके लिए वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं। ऐसे मामलों में संबंधित मजिस्ट्रेट के पास जाकर राहत मांगी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया को नजरअंदाज कर सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल करना उचित नहीं है।
एफआईआर के लिए सीधे हाईकोर्ट पहुंचने पर जताई चिंता
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बड़ी संख्या में लोग एफआईआर दर्ज कराने के लिए सीधे हाईकोर्ट का रुख कर रहे हैं, जबकि कानून में पहले से ही प्रभावी उपाय मौजूद हैं।
कोर्ट ने कहा कि न्याय पाने का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके लिए तय प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है। हाईकोर्ट ने माना कि निष्पक्ष जांच हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में सबसे पहले हाईकोर्ट की शरण ली जाए।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक याचिका से जुड़ा था, जिसमें एफआईआर दर्ज कराने और निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि एक मामले में शिकायत देने के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की। इसके बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कार्रवाई की मांग की।
राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ता ने एफआईआर दर्ज कराने के लिए कानून में उपलब्ध सभी शुरुआती विकल्पों का इस्तेमाल नहीं किया था।
BNSS में मौजूद है कानूनी रास्ता
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती है तो पीड़ित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकता है।
मजिस्ट्रेट के पास एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने और जांच सुनिश्चित करने की शक्ति होती है।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया इसलिए बनाई गई है ताकि शिकायतों का समाधान उचित स्तर पर हो सके।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि एफआईआर दर्ज कराने और निष्पक्ष जांच के लिए मजिस्ट्रेट के पास पर्याप्त अधिकार हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब कानून में प्रभावी उपाय उपलब्ध हैं तो उन्हें अपनाए बिना सीधे संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
ललिता कुमारी फैसले पर भी चर्चा
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध **ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार** फैसले का हवाला दिया था।
इस फैसले में कहा गया था कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी चाहिए।
हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस की कार्रवाई न होने पर हर व्यक्ति सीधे हाईकोर्ट पहुंच जाए।
पहले कानून में दिए गए अन्य उपायों का इस्तेमाल करना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सीधे एफआईआर दर्ज कराने के लिए दाखिल याचिका को खारिज कर दिया।
हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्प अपनाने की स्वतंत्रता दी।
कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायतकर्ता उचित प्रक्रिया अपनाता है तो वह संबंधित प्राधिकारी के सामने अपनी बात रख सकता है।
आम लोगों के लिए क्या है संदेश?
हाईकोर्ट के इस फैसले से साफ है कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए कानूनी प्रक्रिया के चरणों का पालन करना होगा।
अगर थाने में शिकायत के बाद कार्रवाई नहीं होती है तो पीड़ित को पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और फिर मजिस्ट्रेट के माध्यम से राहत मांगनी चाहिए।
सीधे हाईकोर्ट जाना विशेष परिस्थितियों में ही उचित माना जाएगा।
BNSS के बाद बदली कानूनी प्रक्रिया
देश में नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने आपराधिक प्रक्रिया से जुड़े कई प्रावधानों को नया रूप दिया है।
इसका उद्देश्य शिकायत, जांच और न्याय प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाना है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, नए कानून के तहत उपलब्ध उपायों की जानकारी आम लोगों के लिए जरूरी है ताकि वे सही मंच पर अपनी शिकायत रख सकें।