गोरखपुर। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गोरखपुर में पार्टी संगठन को लेकर बड़ा फैसला लिया है। पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नेताओं के बीच हुए विवाद और कथित हाथापाई के बाद गोरखपुर की जिला और महानगर कार्यकारिणी को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया है। जिलाध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष को भी पद से हटा दिया गया है। कार्रवाई का दायरा पार्टी के फ्रंटल संगठनों तक बढ़ाया गया है।पार्टी की ओर से जारी सूचना के मुताबिक, गोरखपुर जिलाध्यक्ष सहित जिला कार्यकारिणी, महानगर अध्यक्ष सहित महानगर कार्यकारिणी और फ्रंटल संगठनों के जिला एवं महानगर स्तर के पदाधिकारियों को उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया है। इसके अलावा गोरखपुर से संबंधित पार्टी की राज्य कार्यकारिणी और फ्रंटल संगठनों की प्रदेश कार्यकारिणी में शामिल पदाधिकारियों तथा सदस्यों पर भी फैसला लागू किया गया है।
इस बड़ी संगठनात्मक कार्रवाई के पीछे एक दिन पहले गोरखपुर प्रेस क्लब में हुई घटना को प्रमुख वजह माना जा रहा है। समाजवादी पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बैठने की व्यवस्था को लेकर पूर्व जिलाध्यक्ष नगीना साहनी और पार्टी नेता अंशुमान सिंह के समर्थकों के बीच विवाद हो गया था। कहासुनी बढ़ने के बाद मामला कथित तौर पर हाथापाई तक पहुंच गया। घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया।यह प्रेस कॉन्फ्रेंस जिलाध्यक्ष बृजेश गौतम की ओर से पार्टी के ‘लोकतंत्र बचाओ सप्ताह’ अभियान के बारे में जानकारी देने के लिए बुलाई गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, कार्यक्रम के दौरान अंशुमान सिंह अपने समर्थकों के साथ पहुंचे थे। सभागार में बैठने की जगह को लेकर विवाद शुरू हुआ और कुछ ही देर में माहौल तनावपूर्ण हो गया।
आरोप है कि विवाद के दौरान अंशुमान सिंह के बेटे कमलेश सिंह ने पूर्व जिलाध्यक्ष नगीना साहनी को थप्पड़ मारा। वहां मौजूद पार्टी नेताओं और अन्य लोगों ने हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों को अलग किया। दूसरी ओर अंशुमान सिंह ने आरोपों को लेकर दावा किया कि इस विवाद का इस्तेमाल उनकी राजनीतिक छवि खराब करने के लिए किया जा रहा है। साहनी की ओर से भी मारपीट, बदसलूकी और धमकी के आरोप लगाए गए। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।घटना सामने आने के बाद पार्टी नेतृत्व ने पहले अंशुमान सिंह के खिलाफ कार्रवाई की और उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद रविवार को संगठन के खिलाफ व्यापक कार्रवाई करते हुए जिला और महानगर इकाइयों की कार्यकारिणियों को ही भंग करने का फैसला सामने आया।
अखिलेश यादव की इस कार्रवाई को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले संगठन में अनुशासन बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। गोरखपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे में सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान पार्टी नेताओं के बीच हुआ विवाद संगठन के लिए असहज स्थिति पैदा करने वाला था।खास बात यह है कि विवाद में शामिल अंशुमान सिंह का नाम गोरखपुर ग्रामीण विधानसभा सीट से आगामी चुनाव में टिकट की दावेदारी के संदर्भ में सामने आया है। रिपोर्टों के मुताबिक, कार्यक्रम में उनके समर्थकों की मौजूदगी और बैठने की व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ विवाद तेजी से बढ़ा। इसी घटनाक्रम के बाद पार्टी नेतृत्व तक पूरे मामले की जानकारी पहुंची।
समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए अपने संगठन को सक्रिय करने में जुटी हुई है। ऐसे समय में गोरखपुर जैसी महत्वपूर्ण जगह पर पार्टी नेताओं के बीच सार्वजनिक विवाद ने संगठनात्मक अनुशासन को लेकर सवाल खड़े किए। पार्टी नेतृत्व की ओर से पूरी इकाई को भंग करने का फैसला इस बात का संकेत है कि सार्वजनिक स्तर पर सामने आने वाले आंतरिक विवादों को गंभीरता से लिया जा रहा है।फैसले का असर केवल जिलाध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष तक सीमित नहीं रखा गया। पार्टी ने विभिन्न फ्रंटल संगठनों और उनसे जुड़े पदाधिकारियों को भी हटाया है। इससे गोरखपुर में समाजवादी पार्टी के संगठन का बड़े स्तर पर पुनर्गठन होने की संभावना बन गई है। नई कार्यकारिणी में किन नेताओं को जिम्मेदारी दी जाएगी, इस पर अब राजनीतिक नजरें रहेंगी।
गोरखपुर की घटना ने पार्टी के भीतर टिकट दावेदारी और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल का मुद्दा भी सामने ला दिया है। विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों में टिकट के दावेदार सक्रिय होते हैं और स्थानीय स्तर पर समर्थकों के जरिए शक्ति प्रदर्शन भी देखने को मिलता है। हालांकि समाजवादी पार्टी नेतृत्व ने इस मामले में व्यापक संगठनात्मक कार्रवाई कर तत्काल संदेश देने की कोशिश की है।अखिलेश यादव का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक गढ़ माना जाता है। आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी यहां अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगी। ऐसे में स्थानीय इकाई में आंतरिक विवाद पार्टी की तैयारियों को प्रभावित कर सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भंग की गई कार्यकारिणियों के स्थान पर नई टीम कब बनाई जाएगी और पार्टी किन चेहरों को जिम्मेदारी देगी। 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए नई टीम के चयन में संगठनात्मक सक्रियता, स्थानीय समीकरण और अनुशासन जैसे पहलुओं पर ध्यान रहने की संभावना है।फिलहाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में शुरू हुए एक विवाद के बाद मामला गोरखपुर की पूरी सपा इकाई के पुनर्गठन तक पहुंच गया है। पहले अंशुमान सिंह का निष्कासन और उसके बाद जिला, महानगर तथा फ्रंटल संगठनों की कार्यकारिणियां भंग करने के फैसले ने साफ कर दिया है कि गोरखपुर संगठन में आने वाले दिनों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।