लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली जनहानि को कम करने के लिए तकनीक आधारित व्यवस्था को मजबूत कर रही है। इसी कड़ी में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे के सहयोग से प्रदेश के पांच जिलों में आकाशीय बिजली का पता लगाने वाले सेंसर स्थापित किए जा रहे हैं। इस तकनीक से बिजली गिरने की गतिविधियों का तेजी से पता लगाने और समय रहते चेतावनी जारी करने में मदद मिलेगी।
प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए तकनीक पर जोर
उत्तर प्रदेश में आकाशीय बिजली और खराब मौसम के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को कम करने के लिए मौसम संबंधी निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। राज्य सरकार का उद्देश्य आधुनिक तकनीक की मदद से प्राकृतिक आपदाओं के संभावित खतरे का पहले से पता लगाना और लोगों तक समय रहते जरूरी सूचना पहुंचाना है।
इसी उद्देश्य से प्रदेश के पांच जिलों में आकाशीय बिजली का पता लगाने वाले सेंसर लगाए जा रहे हैं। इस परियोजना में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे का सहयोग लिया जा रहा है। ये सेंसर बिजली गिरने से जुड़ी गतिविधियों की पहचान करने में मदद करेंगे, जिससे संबंधित क्षेत्रों में चेतावनी जारी करने की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकेगा।
आकाशीय बिजली एक ऐसी प्राकृतिक घटना है, जिसमें कुछ ही पलों में जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है। खेतों में काम कर रहे किसान, खुले स्थानों पर मौजूद मजदूर, ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी और बाहर निकलने वाले लोग इसके जोखिम का सामना करते हैं। ऐसे में समय पर चेतावनी मिलने से लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने का अवसर मिल सकता है।
एटा, मेरठ समेत इन पांच जिलों में लग रहे सेंसर
इस पहल के तहत उत्तर प्रदेश के पांच जिलों को शामिल किया गया है। इनमें एटा, मेरठ, बलरामपुर, लखीमपुर खीरी और सोनभद्र शामिल हैं।
इन जिलों में सेंसर स्थापित करने का उद्देश्य आकाशीय बिजली से जुड़ी गतिविधियों की निगरानी करना और संभावित खतरे की जानकारी समय रहते उपलब्ध कराने में मदद करना है। सेंसर से प्राप्त आंकड़े मौसम की स्थिति को समझने और बिजली गिरने की गतिविधियों का पता लगाने में उपयोगी हो सकते हैं।
इन उपकरणों की मदद से संबंधित क्षेत्रों में बिजली गिरने की गतिविधियों का तेजी से पता लगाने की क्षमता विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। इससे चेतावनी जारी करने वाली व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, सेंसर स्थापित होने के बाद उनकी वास्तविक उपयोगिता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि उनसे मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण किस तरह किया जाता है और चेतावनी आम लोगों तक कितनी जल्दी पहुंचती है।
कैसे काम करते हैं आकाशीय बिजली का पता लगाने वाले सेंसर?
आकाशीय बिजली गिरने के दौरान वातावरण में विद्युत गतिविधियां और विद्युत चुंबकीय संकेत उत्पन्न होते हैं। बिजली का पता लगाने वाली विशेष प्रणालियां इन संकेतों को दर्ज करके बिजली गिरने की गतिविधि का स्थान और समय निर्धारित करने में मदद कर सकती हैं।
जब किसी क्षेत्र में बिजली से जुड़ी गतिविधि का पता चलता है, तो सेंसर से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल मौसम संबंधी निगरानी और चेतावनी जारी करने की प्रक्रिया में किया जा सकता है। अलग-अलग स्थानों पर लगाए गए सेंसर से प्राप्त जानकारी का विश्लेषण करने पर बिजली की गतिविधियों को समझने में और मदद मिल सकती है।
इस तरह की तकनीक का प्रमुख उद्देश्य संभावित खतरे की जानकारी जल्द उपलब्ध कराना है। हालांकि, सेंसर की मदद से हर घटना की सटीक भविष्यवाणी की गारंटी नहीं होती। इसकी उपयोगिता उपकरणों की क्षमता, सेंसर के नेटवर्क, आंकड़ों के विश्लेषण और चेतावनी व्यवस्था के समन्वय पर निर्भर करती है।
समय रहते चेतावनी मिलने से बच सकती हैं जानें
आकाशीय बिजली से होने वाली दुर्घटनाओं में समय की अहम भूमिका होती है। कई बार लोग मौसम बदलने के बावजूद खुले स्थानों पर काम करते रहते हैं और अचानक बिजली गिरने से हादसे का शिकार हो जाते हैं। यदि संभावित खतरे की सूचना पहले मिल जाए, तो लोगों को सावधानी बरतने और सुरक्षित स्थान पर पहुंचने का समय मिल सकता है।
खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में खेतों में काम करने वाले किसानों और मजदूरों के लिए ऐसी चेतावनी व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है। इसके अलावा खुले मैदानों, निर्माण स्थलों और अन्य असुरक्षित स्थानों पर मौजूद लोगों को भी समय रहते सतर्क किया जा सकता है।
हालांकि, चेतावनी तभी प्रभावी होगी जब वह समय पर और आसानी से समझ आने वाले माध्यमों से लोगों तक पहुंचे। इसके लिए मौसम संबंधी सूचना का प्रसार, स्थानीय प्रशासन की तैयारी और आम लोगों में जागरूकता भी महत्वपूर्ण है।
लोगों को भी बरतनी होगी सावधानी
आकाशीय बिजली से बचाव के लिए तकनीक के साथ व्यक्तिगत सतर्कता भी जरूरी है। गरज-चमक के दौरान खुले मैदान, ऊंचे पेड़, बिजली के खंभे और अकेले खड़े ऊंचे ढांचों के पास रुकने से बचना चाहिए। सुरक्षित पक्के भवन या बंद वाहन में शरण लेना बेहतर होता है।
यदि कोई व्यक्ति खेत या खुले स्थान पर है और बिजली चमकने के साथ गर्जना सुनाई दे रही है, तो उसे जल्द से जल्द सुरक्षित स्थान पर पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। पेड़ के नीचे खड़े होना सुरक्षित विकल्प नहीं है। बिजली का खतरा होने पर खुले मैदान में रुकने या जमीन पर लेट जाने के बजाय उपलब्ध सुरक्षित आश्रय तक पहुंचना प्राथमिकता होनी चाहिए।
इसके साथ ही प्रशासन की ओर से जारी मौसम संबंधी चेतावनियों को गंभीरता से लेना जरूरी है। सेंसर से मिलने वाली जानकारी और चेतावनी प्रणाली का लाभ तभी अधिक होगा, जब लोग भी बताए गए सुरक्षा उपायों का पालन करेंगे।
आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम
उत्तर प्रदेश में पांच जिलों में आकाशीय बिजली का पता लगाने वाले सेंसर स्थापित करने की पहल को प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली जनहानि कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे के सहयोग से विकसित की जा रही यह व्यवस्था मौसम संबंधी निगरानी को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
आने वाले समय में इस तकनीक की प्रभावशीलता इस बात से आंकी जाएगी कि सेंसर से प्राप्त सूचना कितनी जल्दी संबंधित विभागों तक पहुंचती है और उसके आधार पर आम लोगों को किस तरह सतर्क किया जाता है।