प्रयागराज। करीब चार दशक पुराने हत्या के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए निचली अदालत से मिली **उम्रकैद की सजा रद्द कर आरोपियों को बरी** कर दिया। हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए कथित चश्मदीद गवाहों के बयानों में विरोधाभास और मेडिकल साक्ष्यों से तालमेल न होने को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि अभियोजन आरोपियों के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ।
मामला उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का था। हत्या की यह घटना करीब 42 साल पहले हुई थी। लंबे समय से चली आ रही कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करते हुए दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को समाप्त कर दिया।
चार लोगों को बनाया गया था आरोपी
मामले में राम औतार, राम पाल, पन्ना लाल और राम चंद्र उर्फ बिशुन चंद को आरोपी बनाया गया था। निचली अदालत ने मामले की सुनवाई और अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को हत्या सहित संबंधित अपराधों में दोषी माना था।
निचली अदालत ने आरोपियों को आईपीसी की धारा 302 और 323 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई।
अपील में निचली अदालत के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि अभियोजन की कहानी में कई कमजोरियां हैं और उपलब्ध साक्ष्य दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी पर उठा सवाल
हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान कथित चश्मदीद गवाहों की गवाही महत्वपूर्ण मुद्दा बनी। अदालत ने उनके बयानों का विस्तार से परीक्षण किया और पाया कि बयानों में ऐसी विसंगतियां हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि घटना जिस दुकान के सामने होने की बात कही गई थी, उस दुकानदार से पूछताछ नहीं की गई। ऐसे स्वतंत्र व्यक्ति की गवाही घटनाक्रम को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकती थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन की ओर से पेश गवाहों के बयान भी एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते।
मेडिकल रिपोर्ट से भी नहीं बैठा तालमेल
मामले में मेडिकल साक्ष्य भी महत्वपूर्ण साबित हुए। हाईकोर्ट ने पाया कि गवाहों की ओर से बताए गए घटनाक्रम और मेडिकल रिपोर्ट के बीच अपेक्षित सामंजस्य नहीं था।
आपराधिक मुकदमों में प्रत्यक्षदर्शी की गवाही महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है, लेकिन अदालत उसकी विश्वसनीयता का परीक्षण परिस्थितियों, मेडिकल रिपोर्ट और दूसरे उपलब्ध साक्ष्यों के साथ करती है।
इस मामले में हाईकोर्ट को अभियोजन की ओर से प्रस्तुत पूरी कहानी को लेकर उचित संदेह दिखाई दिया।
संदेह का लाभ आरोपियों को
आपराधिक न्याय व्यवस्था का स्थापित सिद्धांत है कि अभियोजन को आरोपी का अपराध **उचित संदेह से परे** साबित करना होता है। अगर उपलब्ध साक्ष्यों से दो संभावनाएं निकलती हैं और आरोपी के दोषी होने को निश्चित रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता तो संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाता है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत की दोषसिद्धि को बरकरार रखना सुरक्षित नहीं माना। अदालत ने उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए आरोपियों को मामले में बरी करने का आदेश दिया।
42 साल बाद आया महत्वपूर्ण फैसला
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी लंबी अवधि भी है। हत्या की घटना के बाद मुकदमा, निचली अदालत का फैसला और उसके खिलाफ अपील की प्रक्रिया वर्षों तक चलती रही।
इतने लंबे समय बाद हाईकोर्ट के फैसले ने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक मामले में दोषसिद्धि केवल आरोप की गंभीरता के आधार पर नहीं हो सकती। अदालत के सामने पेश साक्ष्य विश्वसनीय और एक-दूसरे की पुष्टि करने वाले होने चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट इससे जुड़े अन्य पुराने आपराधिक मामलों में भी स्पष्ट कर चुका है कि अभियोजन की जिम्मेदारी आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करना है। केवल संदेह या अधूरी परिस्थितियों की श्रृंखला दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।
चश्मदीद की गवाही कब मानी जाती है भरोसेमंद?
कानून में किसी चश्मदीद गवाह की गवाही केवल इसलिए खारिज नहीं होती कि वह मृतक का रिश्तेदार है या घटना से जुड़ा हुआ व्यक्ति है। अदालत मुख्य रूप से यह देखती है कि उसका बयान स्वाभाविक, लगातार और दूसरे साक्ष्यों से समर्थित है या नहीं।
इसके विपरीत अगर बयान में महत्वपूर्ण विरोधाभास हों, घटनास्थल पर मौजूदगी संदिग्ध लगे या मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्य उसका समर्थन नहीं करें तो अदालत गवाही को सावधानी से परखती है।
इसीलिए प्रत्येक आपराधिक मामले का फैसला उसके अपने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होता है।
उम्रकैद की सजा हुई खत्म
हाईकोर्ट के फैसले के बाद निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा खत्म हो गई। अदालत ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में मौजूद कमियों और गवाहों की विश्वसनीयता से जुड़े सवालों को देखते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ दिया।
करीब 42 साल पुराने इस मामले का फैसला यह दिखाता है कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में भी दोषसिद्धि के लिए विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी हैं। गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और घटनास्थल से जुड़े तथ्य एक-दूसरे का समर्थन नहीं करते हैं तो अदालत दोषसिद्धि को कायम रखने से इनकार कर सकती है।