Raipur. रायपुर। छत्तीसगढ़ में अवैध शराब के कारोबार में अब तस्करी के साथ पहचान छिपाने के नए तरीके भी सामने आ रहे हैं। दूसरे राज्यों से शराब लाकर बेचने के पुराने तरीके के अलावा अब बोतलों की पैकिंग, लेबल, ढक्कन और होलोग्राम बदलकर शराब को स्थानीय उत्पाद जैसा दिखाने की कोशिश की जा रही है। जनवरी से सितंबर के बीच प्रदेश के अलग-अलग जिलों में हुई पुलिस और आबकारी विभाग की कार्रवाई में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, आबकारी अधिकारी की मिली भगत और शराब घोटाले के आरोपी क्रमांक 20 अधिकारी की प्रमुख भूमिका है, जिनमें बाहरी राज्यों की शराब के साथ बड़ी संख्या में खाली बोतलें, ढक्कन, लेबल और नकली होलोग्राम बरामद किए गए। जनता से रिश्ता की खबर का असर होने लगा है। हमने अपने समाचार पत्र और न्यूज़ वेबसाइट के जरिए पहले समाचार प्रकाशित किया था।


राजनांदगांव, डोंगरगढ़, कबीरधाम, महासमुंद, कांकेर, मोहला और सूरजपुर समेत कई जिलों में की गई कार्रवाई के दौरान मध्य प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड सहित अन्य राज्यों की शराब मिली है। कुछ मामलों में शराब उसी पैकिंग में पकड़ी गई, जबकि कई जगहों पर पैकिंग बदलने से जुड़ी सामग्री मिलने के बाद जांच का दायरा और बढ़ाया गया। जांच में सामने आए मामलों से संकेत मिलता है कि अवैध शराब कारोबार से जुड़े लोग अब केवल एक राज्य से दूसरे राज्य तक शराब पहुंचाने तक सीमित नहीं हैं। शराब की असली पहचान छिपाने के लिए अलग-अलग राज्यों से पैकिंग से जुड़ी सामग्री जुटाकर उसे स्थानीय बाजार के अनुरूप तैयार करने की कोशिश भी की जा रही है।

शराब की बोतल पर लगाया जाने वाला होलोग्राम उसकी पहचान और पैकिंग से जुड़ा अहम सुरक्षा चिन्ह माना जाता है। सरकारी व्यवस्था के तहत अधिकृत शराब की बोतलों पर तय लेबल, ढक्कन और होलोग्राफिक स्टिकर लगाए जाते हैं। यही वजह है कि अवैध कारोबार में नकली होलोग्राम और लेबल का इस्तेमाल महत्वपूर्ण कड़ी बन जाता है। यदि दूसरे राज्य की शराब को उसी पैकिंग और लेबल के साथ बाजार में बेचा जाए तो उसकी पहचान करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन यदि उसकी बोतल, ढक्कन, लेबल और होलोग्राम बदलकर उसे स्थानीय शराब जैसा दिखाया जाए तो उसकी पहचान छिपाने की कोशिश की जा सकती है। अलग-अलग जिलों में हुई बरामदगी से इसी तरह की गतिविधियों की आशंका सामने आई है।

डोंगरगढ़ क्षेत्र में जून महीने में हुई कार्रवाई ने इस नेटवर्क के काम करने के तरीके की एक महत्वपूर्ण कड़ी सामने रखी थी। जांच के मुताबिक शराब मध्य प्रदेश से लाई जा रही थी, जबकि बोतलों के ढक्कन, स्टिकर और होलोग्राम जैसी सामग्री अलग-अलग स्थानों से जुटाई जा रही थी। पुलिस की जांच में सामने आया कि होलोग्राम और स्टिकर दिल्ली, पुणे और नागपुर जैसे शहरों से मंगाए जाने की बात सामने आई थी। इससे यह संकेत मिला कि पूरा नेटवर्क एक ही स्थान से संचालित होने के बजाय अलग-अलग जगहों से सामग्री जुटाकर काम कर रहा था। शराब एक राज्य से आती थी, पैकिंग सामग्री दूसरे शहरों से पहुंचती थी और किसी अन्य स्थान पर इसे तैयार कर आगे सप्लाई किया जाता था।

डोंगरगढ़ का भौगोलिक स्थान भी इस प्रकार की तस्करी में महत्वपूर्ण माना जाता है। यह क्षेत्र मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमाओं के करीब है। छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और बालाघाट जैसे मध्य प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों से शराब आने के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। शुरुआती मामलों में बाहरी राज्य की शराब उसी लेबल के साथ पकड़ी जाती थी, लेकिन बाद में स्थानीय बोतलों में री-बॉटलिंग और स्थानीय पहचान वाली पैकिंग के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि तस्करी के तरीके समय के साथ बदल रहे हैं।

अवैध कारोबार के पीछे कीमतों का अंतर भी एक बड़ा कारण माना जाता है। अलग-अलग राज्यों में शराब की कीमत, टैक्स, खरीद और बिक्री व्यवस्था अलग होती है। यदि किसी राज्य में शराब कम कीमत पर उपलब्ध हो और दूसरे राज्य में उसकी कीमत ज्यादा हो, तो अवैध तरीके से उसे लाकर बेचने में मुनाफे की संभावना बढ़ जाती है। महासमुंद जिले के सरायपाली क्षेत्र में अगस्त महीने में हुई कार्रवाई ने भी इस कारोबार के दूसरे पहलू को सामने रखा। एक कार से गोवा अंग्रेजी शराब की खेप बरामद होने के बाद पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाया था। 11 अगस्त को 25 पेटियों में 1,192 पौवा शराब बरामद हुई थी।

इसके बाद अलग-अलग ठिकानों से शराब, खाली बोतल और पैकिंग सामग्री मिलने की जानकारी सामने आई। 25 सितंबर तक इस प्रकरण में कुल 3,229 लीटर 860 मिलीलीटर शराब जब्त की गई और सात आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई। जब्त शराब की कीमत करीब 22.15 लाख रुपये बताई गई थी। इस मामले में नकली होलोग्राम, लेबल और स्थानीय स्तर पर शराब की सप्लाई से जुड़े लोगों की भूमिका की भी जांच की गई। इससे यह सवाल भी उठा कि इतनी बड़ी मात्रा में पैकिंग सामग्री और अवैध शराब किन माध्यमों से अलग-अलग स्थानों तक पहुंचाई जा रही थी।

कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर में सितंबर महीने में हुई कार्रवाई में 4,409 खाली बोतल और पौवे, 3,380 ढक्कन तथा 105 पत्ते स्टिकर और होलोग्राम बरामद किए गए। इसके साथ जम्मू स्पेशल ब्रांड की भरी हुई शराब भी मिली थी। इतनी बड़ी मात्रा में खाली बोतल और पैकिंग सामग्री मिलने से री-बॉटलिंग की आशंका मजबूत हुई। सूरजपुर में भी सितंबर के अंतिम सप्ताह में अलग तरह का मामला सामने आया। यहां एक घर से करीब 12 लीटर मिलावटी शराब, 2,500 नकली ढक्कन और 200 रैपर बरामद किए गए। इस मामले में दूसरे राज्य से शराब लाने के बजाय स्थानीय स्तर पर मिलावट और पैकेजिंग से जुड़ी गतिविधियों की बात सामने आई। इन कार्रवाइयों से यह साफ है कि अवैध शराब का कारोबार हर जगह एक ही तरीके से नहीं चल रहा।

कहीं दूसरे राज्यों से शराब लाई जा रही है, कहीं उसकी री-बॉटलिंग की जा रही है, कहीं स्थानीय पहचान देने के लिए नकली लेबल और होलोग्राम का इस्तेमाल हो रहा है और कहीं मिलावट कर उसे ब्रांडेड शराब जैसा दिखाने की कोशिश की जा रही है। पुलिस और आबकारी विभाग के सामने अब चुनौती केवल अवैध शराब की खेप पकड़ने की नहीं, बल्कि उसके पीछे काम कर रहे पूरे नेटवर्क की पहचान करने की भी है। शराब कहां से आती है, पैकिंग सामग्री कौन उपलब्ध कराता है, नकली होलोग्राम और लेबल कहां तैयार किए जाते हैं और स्थानीय स्तर पर इसकी सप्लाई कौन करता है, इन सभी कड़ियों की जांच जरूरी हो गई है। प्रदेश में जनवरी से सितंबर के बीच हुई कार्रवाइयों ने यह संकेत जरूर दिया है कि अवैध शराब तस्करी का स्वरूप बदल रहा है। अब केवल परिवहन ही नहीं, बल्कि पैकिंग बदलकर पहचान छिपाने की कोशिश भी इस अवैध कारोबार का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है।
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