उत्तर प्रदेश : झांसी जिले में स्थित करीब 140 साल पुराना **पारीछा बांध** अब वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने जा रहा है। बुंदेलखंड की सिंचाई व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले इस ऐतिहासिक बांध को **वर्ल्ड हेरिटेज इरिगेशन स्ट्रक्चर (WHIS)** के रूप में मान्यता मिली है। अंतरराष्ट्रीय सिंचाई एवं जल निकासी आयोग (ICID) ने पारीछा बांध को विश्व धरोहर सिंचाई संरचना की सूची में शामिल किया है।
इस उपलब्धि के बाद पारीछा बांध को फ्रांस के मार्सेई में 14 अक्टूबर को आयोजित होने वाली **26वीं ICID इंटरनेशनल कांग्रेस और 77वीं इंटरनेशनल एग्जीक्यूटिव काउंसिल मीटिंग** के दौरान **WHIS Award-2026** से सम्मानित किया जाएगा। इस समारोह में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के अधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया है।
बुंदेलखंड की जीवनरेखा है पारीछा बांध
झांसी में बेतवा नदी पर बना पारीछा बांध केवल एक जल संरचना नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की कृषि और जल प्रबंधन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह बांध बेतवा नहर प्रणाली के मुख्य आधारों में शामिल है, जिसके जरिए लंबे समय से सूखे प्रभावित क्षेत्रों में खेती के लिए पानी पहुंचाया जा रहा है।
बुंदेलखंड क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से पानी की कमी और सूखे की समस्या से जूझता रहा है। ऐसे में पारीछा बांध ने किसानों के लिए सिंचाई का बड़ा साधन उपलब्ध कराया और क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
1886 में शुरू हुआ था संचालन
पारीछा बांध का इतिहास 19वीं सदी से जुड़ा हुआ है। इसका निर्माण कार्य वर्ष 1881 में शुरू हुआ था और करीब पांच साल बाद 1886 में यह पूरी तरह से चालू हुआ। उस समय इसे बुंदेलखंड की जल समस्या को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया था।
करीब डेढ़ सदी बाद भी यह बांध लगातार अपनी उपयोगिता बनाए हुए है। यह न केवल सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराता है, बल्कि क्षेत्र की जल प्रबंधन प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
1,174 मीटर लंबा और 318 स्टील गेट से लैस
पारीछा बांध अपनी इंजीनियरिंग क्षमता के लिए भी खास माना जाता है। यह बांध करीब **1,174 मीटर लंबा** है और नदी तल से इसकी ऊंचाई लगभग **16.8 मीटर** है। इसमें पानी के नियंत्रण के लिए **318 स्टील गेट** लगाए गए हैं।
इन गेटों की मदद से जल प्रवाह को नियंत्रित किया जाता है और जरूरत के अनुसार पानी को सिंचाई के लिए उपलब्ध कराया जाता है। यही तकनीकी विशेषताएं इसे ऐतिहासिक सिंचाई संरचनाओं में खास स्थान दिलाती हैं।
समय के साथ बढ़ाई गई क्षमता
समय के साथ पारीछा बांध की क्षमता में भी सुधार किया गया है। पहले इसकी जल भंडारण क्षमता करीब **1,700 मिलियन क्यूबिक फीट** थी, जिसे बढ़ाकर लगभग **2,400 मिलियन क्यूबिक फीट** किया गया है।
क्षमता बढ़ने से अधिक मात्रा में पानी सुरक्षित रखने और जरूरत के समय किसानों तक पहुंचाने में मदद मिली है। इससे उत्तर प्रदेश के साथ-साथ मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों को भी लाभ मिलता है।
पर्यटन का भी बन रहा केंद्र
पारीछा बांध अब सिर्फ सिंचाई परियोजना तक सीमित नहीं है। बारिश के मौसम में जब बांध के गेट खोले जाते हैं तो यहां पानी का शानदार दृश्य देखने के लिए पर्यटक भी पहुंचते हैं।
बांध के आसपास का प्राकृतिक वातावरण लोगों को आकर्षित करता है। यही वजह है कि यह क्षेत्र धीरे-धीरे पर्यटन स्थल के रूप में भी पहचान बना रहा है।
बिजली परियोजना को भी मिलता है पानी
पारीछा बांध का महत्व केवल खेती तक सीमित नहीं है। इससे पारीछा थर्मल पावर प्रोजेक्ट को भी पानी उपलब्ध कराया जाता है। यह परियोजना क्षेत्र की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में योगदान देती है।
इस तरह यह बांध सिंचाई, जल संरक्षण और ऊर्जा क्षेत्र तीनों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
वैश्विक पहचान से बढ़ेगा महत्व
ICID की ओर से विश्व धरोहर सिंचाई संरचना की मान्यता मिलना उत्तर प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इससे न केवल पारीछा बांध की ऐतिहासिक और तकनीकी विशेषताओं को पहचान मिलेगी, बल्कि भारत की पुरानी जल प्रबंधन परंपरा भी दुनिया के सामने आएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी ऐतिहासिक जल संरचनाओं का संरक्षण भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। पुराने बांध और नहर प्रणालियां यह दिखाती हैं कि सीमित संसाधनों में भी बेहतर जल प्रबंधन कैसे किया जा सकता है।
बुंदेलखंड की विरासत को मिला सम्मान
पारीछा बांध को मिला यह सम्मान सिर्फ एक बांध की उपलब्धि नहीं है, बल्कि बुंदेलखंड की ऐतिहासिक इंजीनियरिंग और जल संरक्षण परंपरा का सम्मान है।
14 अक्टूबर को फ्रांस में मिलने वाला WHIS Award-2026 इस बात का प्रमाण होगा कि भारत की पुरानी जल संरचनाएं आज भी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती हैं।
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