वाराणसी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी बीएचयू), वाराणसी के वैज्ञानिकों ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जिसमें हरी रोशनी की सहायता से बैक्टीरिया को निष्क्रिय करने और संक्रमित घावों को ठीक करने की संभावनाएं सामने आई हैं। वैज्ञानिकों का यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका 'कम्युनिकेशन्स केमिस्ट्री' में प्रकाशित हुआ है, जो नेचर पोर्टफोलियो का हिस्सा है। इस शोध को एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी दवाओं के खिलाफ बैक्टीरिया की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयास माना जा रहा है। हालांकि, तकनीक फिलहाल शोध और प्रायोगिक परीक्षण के स्तर पर है और इसे मनुष्यों के लिए स्वीकृत उपचार नहीं माना जा सकता।
यह शोध आईआईटी बीएचयू के रसायन विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. साम्या बनर्जी और स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के डॉ. सुदीप मुखर्जी के शोध समूहों के संयुक्त प्रयास का परिणाम है। शोधपत्र का शीर्षक 'Green-light-activated Os(II) metallo-photoantibiotics for antibacterial therapy and infected wound healing' है।यह शोधपत्र 24 सितंबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'कम्युनिकेशन्स केमिस्ट्री' में प्रकाशित हुआ था। इसमें वैज्ञानिकों ने हरी रोशनी से सक्रिय होने वाले ऑस्मियम आधारित विशेष यौगिकों की जीवाणुरोधी क्षमता का अध्ययन किया है।
इस अनुसंधान का उद्देश्य आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों, विशेष रूप से एंटीबायोटिक प्रतिरोध और लंबे समय तक बने रहने वाले बैक्टीरियल संक्रमण के लिए वैकल्पिक उपचार की संभावनाएं तलाशना है।दुनियाभर में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस स्वास्थ्य क्षेत्र की बड़ी चुनौतियों में शामिल है। कई प्रकार के बैक्टीरिया सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। ऐसी परिस्थितियों में संक्रमण का इलाज अधिक कठिन हो सकता है। विशेष रूप से संक्रमित घावों में बैक्टीरिया की मौजूदगी उपचार प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने मेटलो-फोटोएंटीबायोटिक तकनीक पर काम किया है। इस तकनीक में विशेष रासायनिक यौगिकों को प्रकाश की सहायता से सक्रिय किया जाता है, जिससे बैक्टीरिया को नुकसान पहुंचाने वाली प्रतिक्रियाएं उत्पन्न होती हैं।शोधकर्ताओं ने ऑस्मियम (Os-II) आधारित तीन विशेष यौगिक विकसित किए हैं, जिन्हें Os1, Os2 और Os3 नाम दिया गया है। इन यौगिकों की विशेषता यह है कि इन्हें हरी रोशनी की सहायता से सक्रिय किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों ने प्रयोगों के दौरान 525 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य वाली हरी रोशनी का उपयोग किया। परीक्षण में पाया गया कि प्रकाश से सक्रिय होने के बाद ये यौगिक बैक्टीरिया की वृद्धि रोकने में प्रभावी रहे।अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने बैसिलस सबटिलिस, एस्चेरिचिया कोलाई और स्टैफिलोकोकस ऑरियस जैसे बैक्टीरिया पर इन यौगिकों का परीक्षण किया। परिणामों से पता चला कि प्रकाश की मौजूदगी में ये यौगिक बैक्टीरिया की गतिविधियों को प्रभावित करते हैं।
शोध के अनुसार, प्रकाश सक्रिय होने के बाद इन यौगिकों से रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज यानी ROS उत्पन्न होती हैं। ये प्रतिक्रियाशील अणु बैक्टीरिया में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करते हैं, जिससे उनकी कोशिकाओं और सामान्य जैविक प्रक्रियाओं को नुकसान पहुंचता है।इसके अतिरिक्त शोधकर्ताओं ने एनएडीएच (NADH) के फोटो-ऑक्सीकरण की प्रक्रिया का भी अध्ययन किया। यह प्रक्रिया बैक्टीरिया की ऊर्जा से संबंधित जैविक गतिविधियों को प्रभावित करने में भूमिका निभा सकती है।
अध्ययन में विकसित तीन यौगिकों में से Os1 को विशेष रूप से प्रभावी पाया गया। यह यौगिक ई. कोलाई बैक्टीरिया द्वारा बनाए गए परिपक्व बायोफिल्म के खिलाफ भी प्रभावी दिखाई दिया।बायोफिल्म बैक्टीरिया की ऐसी संरचना होती है, जिसमें सूक्ष्मजीव एक सुरक्षात्मक परत बनाकर एकत्र हो जाते हैं। इस कारण कई बार सामान्य एंटीबायोटिक उपचार की प्रभावशीलता कम हो सकती है। वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों में पाया कि Os1 प्रकाश के संपर्क में आने पर ऐसे बायोफिल्म को प्रभावित कर सकता है।
इस शोध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संक्रमित घावों को ठीक करने की प्रक्रिया से जुड़ा है। वैज्ञानिकों ने ई. कोलाई से संक्रमित चूहों के घावों पर Os1 और हरी रोशनी के संयुक्त प्रभाव का परीक्षण किया।परीक्षण में पाया गया कि Os1 और हरी रोशनी का संयुक्त इस्तेमाल संक्रमित घावों को ठीक करने की प्रक्रिया तेज करने में सहायक रहा। शोधकर्ताओं ने ऊतकों की जांच और जैविक संकेतकों के विश्लेषण के माध्यम से इस परिणाम का मूल्यांकन किया।
इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने मानव भ्रूणीय किडनी कोशिकाओं की एक प्रयोगशाला सेल लाइन, चूहों की लाल रक्त कोशिकाओं और मुर्गी के अंडे के मॉडल में भी Os1 की जैव-अनुकूलता का अध्ययन किया। इन परीक्षणों से इसकी संभावित उपयोगिता के संकेत मिले।हालांकि, वैज्ञानिकों के सामने अभी कई महत्वपूर्ण सवाल हैं। किसी नई तकनीक को मरीजों के इलाज में इस्तेमाल करने से पहले उसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता और संभावित दुष्प्रभावों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होता है।
आईआईटी बीएचयू के शोध में मिले परिणाम उत्साहजनक हैं, लेकिन अभी यह साबित नहीं हुआ है कि यह तकनीक मनुष्यों में सभी प्रकार के संक्रमित घावों के इलाज के लिए सुरक्षित और प्रभावी होगी। इसके लिए आगे अतिरिक्त प्रयोग और नियंत्रित क्लिनिकल परीक्षण की आवश्यकता होगी।इस शोध में अपूर्व मंडल, देबयानी चक्रवर्ती, आरिफ अली मंडल, रोहित पांडेय, आशीष कुमार अग्रवाल, राशि गौतम और स्वीटी तिवारी सहित अन्य शोधकर्ताओं ने योगदान दिया है।
अध्ययन को विभिन्न राष्ट्रीय शोध संस्थानों और वित्तीय सहायता कार्यक्रमों का समर्थन मिला। इनमें भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और अनुसंधान से जुड़े अन्य कार्यक्रम शामिल हैं।आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिक पहले भी प्रकाश आधारित जीवाणुरोधी तकनीकों पर काम कर चुके हैं। वर्ष 2025 में शोधकर्ताओं ने जिंक आधारित मेटलो-फोटोएंटीबायोटिक यौगिकों पर अध्ययन प्रकाशित किया था। उस शोध में भी बैक्टीरिया और बायोफिल्म के खिलाफ संभावित उपयोगिता का परीक्षण किया गया था।
नए अध्ययन ने इसी अनुसंधान दिशा को आगे बढ़ाते हुए ऑस्मियम आधारित यौगिकों की प्रभावशीलता का परीक्षण किया है।वैज्ञानिक दृष्टि से यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है क्योंकि संक्रमण का उपचार करने के लिए प्रकाश आधारित वैकल्पिक तरीकों पर लगातार शोध हो रहा है। ऐसी तकनीकें भविष्य में परंपरागत एंटीबायोटिक उपचार के साथ पूरक विकल्प प्रदान कर सकती हैं, लेकिन उनकी वास्तविक चिकित्सकीय उपयोगिता आगे के अध्ययनों पर निर्भर करेगी।
आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि भारतीय संस्थानों में हो रहे अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध का उदाहरण है। नेचर पोर्टफोलियो की पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन ने एंटीबायोटिक प्रतिरोध, बैक्टीरियल बायोफिल्म और संक्रमित घावों के उपचार से जुड़ी संभावनाओं को सामने रखा है।इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों ने हरी रोशनी से सक्रिय होने वाली ऐसी तकनीक का प्रायोगिक प्रदर्शन किया है, जो बैक्टीरिया की वृद्धि रोकने और संक्रमित घावों के उपचार में सहायक हो सकती है। भविष्य में यदि इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता मनुष्यों पर होने वाले परीक्षणों में प्रमाणित होती है, तो यह संक्रमण के उपचार में नई संभावनाएं पैदा कर सकती है।
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