प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के एक भूमि विवाद मामले में जिला प्रशासन की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। मामला अनुसूचित जनजाति समुदाय से जुड़ी भूमि की खरीद-बिक्री और कथित दस्तावेजी अनियमितताओं से संबंधित है। प्रशासन ने जिन बैनामों को अवैध बताते हुए रद्द किया था, उस कार्रवाई को चुनौती दी गई थी, लेकिन अदालत ने इसमें दखल देने से इनकार कर दिया।

मामले में जिला प्रशासन का कहना था कि एक अनुसूचित जनजाति की महिला ने धर्म परिवर्तन के बाद खुद को जनजातीय समुदाय की सदस्य बताते हुए कुछ भूमि सौदों को अंजाम दिया, जबकि प्रशासन के अनुसार इन लेन-देन में नियमों का उल्लंघन हुआ। प्रशासन ने ऐसे बैनामों को निरस्त कर भूमि को ग्राम सभा में दर्ज करने की कार्रवाई की थी।

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, यह मामला भूमि स्वामित्व, जनजातीय अधिकारों और राजस्व नियमों से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि अनुसूचित जनजाति की भूमि को लेकर राज्य में विशेष कानूनी प्रावधान हैं, जिनके तहत बिना अनुमति भूमि हस्तांतरण पर रोक रहती है।

हाईकोर्ट ने कार्रवाई में हस्तक्षेप से किया इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रशासनिक कार्रवाई को चुनौती दी गई थी। याचिका में बैनामों को रद्द करने और भूमि को ग्राम सभा में शामिल करने के फैसले पर सवाल उठाए गए थे।

अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद प्रशासन की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद जिला प्रशासन ने आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

प्रशासन का कहना है कि अदालत के आदेश के बाद अब संबंधित भूमि का उपयोग सार्वजनिक हित से जुड़े कार्यों के लिए करने की योजना बनाई जा रही है।

भूमि को लेकर प्रशासन की कार्रवाई

जिला प्रशासन ने पहले जांच के आधार पर कुछ भूमि सौदों को लेकर कार्रवाई की थी। अधिकारियों के मुताबिक, जांच में दस्तावेजों और भूमि हस्तांतरण प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं सामने आई थीं।

प्रशासन का दावा है कि नियमों के विपरीत हुए भूमि हस्तांतरण को रद्द करना जरूरी था, ताकि जनजातीय समुदाय की भूमि सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों का पालन हो सके।

वहीं, मामले से जुड़े अन्य पक्षों की ओर से अपने तर्क भी अदालत के सामने रखे गए थे। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा रही है।

जनजातीय भूमि संरक्षण का मुद्दा

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में अनुसूचित जनजाति की भूमि को लेकर विशेष कानून लागू हैं। इन कानूनों का उद्देश्य जनजातीय समुदाय की जमीन को अवैध हस्तांतरण से बचाना है।

प्रशासन समय-समय पर ऐसे मामलों की जांच करता है, जहां जनजातीय भूमि के स्वामित्व या बिक्री को लेकर विवाद सामने आते हैं। ऐसे मामलों में राजस्व विभाग दस्तावेजों की जांच के बाद कार्रवाई करता है।

इस मामले में भी प्रशासन ने भूमि हस्तांतरण से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद कार्रवाई की थी, जिसे अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद आगे बढ़ाया जा रहा है।

जन उपयोगी निर्माण की तैयारी

जिला प्रशासन के अनुसार, हाईकोर्ट के आदेश के बाद संबंधित भूमि पर जन उपयोगी कार्यों की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि भूमि का उपयोग स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा।

हालांकि, निर्माण कार्य और योजना को लेकर विस्तृत जानकारी प्रशासन की ओर से आगे जारी की जा सकती है।

राजनीतिक बयानबाजी भी हुई तेज

इस मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के समर्थकों ने इसे अवैध भूमि हस्तांतरण के खिलाफ कार्रवाई बताया है। वहीं, विपक्षी दल और अन्य पक्ष ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया और तथ्यों के आधार पर चर्चा की जरूरत पर जोर देते रहे हैं।

सरकार की ओर से भूमि संरक्षण और अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई को अपनी नीतियों का हिस्सा बताया जाता है। वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए न्यायिक आदेश, राजस्व रिकॉर्ड और कानूनी प्रक्रिया को ध्यान में रखना जरूरी होता है।

आगे की प्रक्रिया पर नजर

हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब जिला प्रशासन भूमि से जुड़े रिकॉर्ड और आगे की कार्रवाई को अंतिम रूप देने में जुटा है। प्रशासन का कहना है कि अदालत के निर्देशों और लागू कानूनों के अनुसार ही आगे कदम उठाए जाएंगे।

यह मामला एक बार फिर जनजातीय भूमि संरक्षण, भूमि हस्तांतरण के नियमों और राजस्व प्रशासन की भूमिका को लेकर चर्चा में है। फिलहाल प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई जारी है।

Tags: