उत्तर प्रदेश :  शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत निजी स्कूलों में होने वाले दाखिलों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि प्रदेश के किन-किन निजी स्कूलों में RTE के तहत कितने बच्चों का दाखिला हुआ और किन बच्चों को प्रवेश दिया गया। अदालत ने इस संबंध में विस्तृत जिलावार रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब बेसिक शिक्षा विभाग को प्रदेश के सभी निजी स्कूलों से आरटीई प्रवेश से जुड़ी पूरी जानकारी जुटानी होगी। इसमें स्कूलवार दाखिले, पात्र बच्चों की संख्या, प्रवेश से वंचित बच्चों की जानकारी और स्कूलों की भूमिका का विवरण शामिल होगा।
RTE दाखिलों पर क्यों सख्त हुआ हाईकोर्ट?
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित होती हैं। इन सीटों पर बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराना स्कूलों की जिम्मेदारी होती है।
लेकिन कई मामलों में आरोप लगते रहे हैं कि कुछ निजी स्कूल आरटीई के तहत दाखिला देने में आनाकानी करते हैं या पात्र बच्चों को प्रवेश नहीं देते। इसी को लेकर अदालत में सवाल उठाए गए थे।
हाईकोर्ट ने यह जानने की कोशिश की है कि कानून के प्रावधानों का जमीन पर कितना पालन हो रहा है।
सरकार से मांगा गया स्कूलवार पूरा रिकॉर्ड
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह प्रदेश के सभी निजी स्कूलों का रिकॉर्ड पेश करे। इसमें यह जानकारी शामिल होगी कि—
* किस निजी स्कूल में RTE के तहत कितने बच्चों को प्रवेश मिला।
* पिछले पांच शैक्षणिक सत्रों में कितने बच्चों का दाखिला हुआ।
* कितने बच्चों को स्कूल आवंटित होने के बाद भी प्रवेश नहीं मिला।
* प्रवेश न देने के पीछे क्या कारण बताए गए।
* स्कूलों के खिलाफ कितनी शिकायतें मिलीं और क्या कार्रवाई की गई।
इसके अलावा कोर्ट ने कैपिटेशन फीस यानी अवैध शुल्क वसूली और गैरकानूनी स्क्रीनिंग प्रक्रिया से जुड़ी शिकायतों का भी ब्योरा मांगा है।
CBSE और CISCE स्कूल भी दायरे में
हाईकोर्ट ने साफ किया है कि स्कूल चाहे किसी भी बोर्ड से जुड़े हों, अगर वे उत्तर प्रदेश में प्रारंभिक शिक्षा दे रहे हैं तो उन्हें RTE कानून का पालन करना होगा।
अदालत ने कहा कि CBSE, CISCE या किसी अन्य बोर्ड की मान्यता लेने से स्कूलों को RTE के नियमों से छूट नहीं मिल जाती।
इस आदेश के बाद राज्य के बड़े निजी स्कूलों को भी आरटीई प्रवेश से संबंधित जानकारी उपलब्ध करानी होगी।
RTE के तहत कैसे होता है दाखिला?
RTE के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश के लिए अभिभावक ऑनलाइन आवेदन करते हैं। पात्र बच्चों का चयन लॉटरी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है।
चयनित बच्चों को संबंधित स्कूलों में प्रवेश दिया जाता है और उनकी पढ़ाई का खर्च सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार वहन किया जाता है।
इस योजना का उद्देश्य गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों को बेहतर निजी स्कूलों में शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराना है।
स्कूलों पर बढ़ेगी निगरानी
हाईकोर्ट के आदेश के बाद शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी बढ़ गई है। अब बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) और जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) को स्कूलों से जानकारी जुटाकर रिपोर्ट तैयार करनी होगी।
इससे यह पता चल सकेगा कि कितने स्कूल वास्तव में RTE नियमों का पालन कर रहे हैं और कहां लापरवाही बरती जा रही है।
अभिभावकों को मिल सकती है राहत
कई अभिभावक लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं कि RTE के तहत चयन होने के बाद भी कुछ स्कूल बच्चों को प्रवेश देने में देरी करते हैं या परेशान करते हैं।
हाईकोर्ट की सख्ती के बाद उम्मीद है कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी और पात्र बच्चों को समय पर प्रवेश मिल सकेगा।
सरकार को देना होगा हलफनामा
अदालत ने राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी हलफनामे के रूप में पेश करने को कहा है। इसमें प्रदेश के निजी स्कूलों में RTE के तहत हुए प्रवेश और नियमों के पालन की स्थिति बतानी होगी।
यह रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि उत्तर प्रदेश में RTE कानून का वास्तविक स्तर पर कितना पालन हो रहा है।
शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की कोशिश
RTE कानून का उद्देश्य केवल बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाना नहीं है, बल्कि उन्हें समान शिक्षा का अधिकार देना है। इसके लिए जरूरी है कि निजी स्कूल और प्रशासन दोनों अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
हाईकोर्ट की पहल को शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
Tags: