सांस से होगी डायबिटीज की जांच, BHU ने बनाया नैनो-सेंसर

Update: 2026-08-05 11:56 GMT

वाराणसी। डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए एक बड़ी राहत देने वाली तकनीक विकसित की गई है। अब भविष्य में बार-बार अंगुली में सुई चुभोकर खून की जांच कराने की जरूरत कम हो सकती है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के भौतिकी विभाग और ताइवान के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक अत्याधुनिक नैनो-सेंसर विकसित किया है, जो केवल सांस की जांच के माध्यम से डायबिटीज का पता लगाने में सक्षम होगा।

वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि को स्वास्थ्य क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह तकनीक शरीर में मौजूद एसीटोन गैस की मात्रा को मापकर डायबिटीज की स्थिति का आकलन करती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, डायबिटीज से प्रभावित लोगों की सांस में एसीटोन का स्तर सामान्य लोगों की तुलना में अलग हो सकता है, जिसे यह सेंसर पहचानने में सक्षम है।

मौजूदा समय में डायबिटीज की जांच के लिए आमतौर पर रक्त में ग्लूकोज के स्तर की जांच की जाती है। इसके लिए मरीजों को कई बार अंगुली में सुई चुभोकर रक्त का नमूना देना पड़ता है। लंबे समय तक ऐसी जांच प्रक्रिया कई लोगों के लिए असुविधाजनक और परेशानी भरी हो सकती है। नई नैनो-सेंसर तकनीक इस प्रक्रिया को आसान और दर्द रहित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

बीएचयू के भौतिकी विभाग और ताइवान के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने इस सेंसर को विकसित किया है। यह सेंसर बेहद सूक्ष्म स्तर पर काम करता है और सांस में मौजूद रासायनिक तत्वों का विश्लेषण कर बीमारी से जुड़े संकेतों की पहचान करता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, मानव शरीर में मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया के दौरान कई तरह की गैसें बनती हैं। इनमें एसीटोन भी शामिल है। डायबिटीज की स्थिति में शरीर में ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया में बदलाव आने से सांस में एसीटोन की मात्रा बढ़ सकती है। इसी बदलाव को सेंसर तकनीक के जरिए मापा जाता है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मरीज को किसी तरह का दर्द नहीं सहना पड़ेगा। व्यक्ति को केवल सेंसर के सामने सांस छोड़नी होगी और यह उपकरण सांस में मौजूद एसीटोन की मात्रा का विश्लेषण कर संभावित डायबिटीज की जानकारी देगा।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक खासतौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है जिन्हें बार-बार जांच की आवश्यकता होती है। इसके अलावा बुजुर्गों, बच्चों और उन मरीजों के लिए भी यह मददगार हो सकती है जिन्हें रक्त जांच में परेशानी होती है।

हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक को आम इस्तेमाल में लाने से पहले अभी कई स्तरों पर परीक्षण और मान्यता की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। चिकित्सा उपयोग के लिए किसी भी नई तकनीक को सुरक्षा, सटीकता और विश्वसनीयता के मानकों पर खरा उतरना जरूरी होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर यह सेंसर बड़े स्तर पर सफल होता है तो डायबिटीज की स्क्रीनिंग और निगरानी के तरीके में बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे न केवल मरीजों को सुविधा मिलेगी, बल्कि शुरुआती स्तर पर बीमारी की पहचान करने में भी मदद मिल सकती है।

दुनिया भर में डायबिटीज के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में आसान, तेज और कम खर्च वाली जांच तकनीकों की मांग भी बढ़ी है। सांस आधारित जांच प्रणाली इसी दिशा में एक नई संभावना के रूप में देखी जा रही है।

बीएचयू और ताइवान के वैज्ञानिकों का यह संयुक्त प्रयास भारत में चिकित्सा तकनीक और नैनो विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे शोध की क्षमता को भी दर्शाता है। वैज्ञानिक समुदाय को उम्मीद है कि आने वाले समय में इस तरह की तकनीकें स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक आसान और मरीजों के अनुकूल बना सकेंगी।

फिलहाल यह नैनो-सेंसर शोध और परीक्षण के चरण में है, लेकिन इसके सफल विकास से डायबिटीज की जांच की पूरी प्रक्रिया में बदलाव आने की संभावना जताई जा रही है। दर्द रहित और सरल जांच की यह तकनीक भविष्य में लाखों मरीजों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

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