बुलंदशहर : गोवंश संरक्षण, जैविक खेती और ग्रामीण महिलाओं को रोजगार से जोड़ने की दिशा में बुलंदशहर जिले में एक नई पहल शुरू की गई है। स्याना तहसील क्षेत्र के नरसैना गांव से किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ के माध्यम से पशुपालकों से गोमूत्र की खरीद की जा रही है। इस गोमूत्र का उपयोग जैविक खाद, कीटनाशक और खेती में इस्तेमाल होने वाले अन्य उत्पाद तैयार करने में किया जा रहा है। परियोजना का उद्देश्य गोवंश से जुड़े संसाधनों का उपयोग कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रोत्साहित करना है।
डॉ. प्रवीन कुमार के नेतृत्व में शुरू किए गए इस प्रोजेक्ट से फिलहाल आसपास के करीब 15 गांवों को जोड़ा गया है। परियोजना के तहत पशुपालकों से 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदा जा रहा है। इसके लिए गांवों में विशेष संग्रहण केंद्र बनाए गए हैं। इन केंद्रों पर करीब 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं, जहां पशुपालक गोमूत्र जमा कर सकते हैं। स्थानीय स्तर पर संग्रहण की सुविधा उपलब्ध होने से पशुपालकों को इसे लेकर दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ रही है।
परियोजना से जुड़े लोगों के अनुसार वर्तमान में प्रतिदिन करीब 500 लीटर गोमूत्र एकत्र किया जा रहा है। संग्रह किए गए गोमूत्र को निर्धारित प्रक्रिया के तहत विभिन्न जड़ी-बूटियों और अन्य प्राकृतिक सामग्री के साथ मिलाकर कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इन उत्पादों का इस्तेमाल जैविक खेती में खाद और कीटनाशक के रूप में करने का प्रयास किया जा रहा है। तैयार उत्पादों को तरल, ठोस और पाउडर के रूप में तैयार किया जा रहा है।
इन उत्पादों को स्थानीय समितियों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई है। परियोजना से जुड़े लोगों का कहना है कि इसका मकसद किसानों को स्थानीय स्तर पर तैयार जैविक विकल्प उपलब्ध कराना है, ताकि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिल सके। इससे किसानों को खेती में इस्तेमाल होने वाले कुछ रासायनिक उत्पादों के विकल्पों के बारे में जानकारी मिल सकती है और स्थानीय स्तर पर तैयार उत्पादों की उपलब्धता भी बढ़ सकती है।
इस पहल में ग्रामीण महिलाओं को भी महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। परियोजना से जुड़ी करीब 300 ग्रामीण महिलाओं को शेयर होल्डर बनाया गया है। इसके अलावा गोमूत्र संग्रह करने में सहयोग करने वाली महिलाओं को दो रुपये प्रति लीटर की दर से कमीशन दिया जा रहा है। इस व्यवस्था से महिलाओं को गांव में रहते हुए आर्थिक गतिविधियों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।
परियोजना से जुड़े लोगों के मुताबिक गोमूत्र की खरीद से पशुपालक परिवारों के लिए दूध के अलावा आय का एक और संभावित जरिया तैयार हुआ है। वहीं, महिलाओं की भागीदारी से ग्रामीण स्तर पर रोजगार और आय के अवसर पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। इस पूरी व्यवस्था में पशुपालकों, महिला समूहों, एफपीओ और किसानों को एक-दूसरे से जोड़ने की कोशिश की गई है।
इस पहल को गोवंश संरक्षण से भी जोड़कर देखा जा रहा है। परियोजना से जुड़े लोगों का कहना है कि गोवंश से मिलने वाले संसाधनों का उपयोग यदि व्यवस्थित तरीके से किया जाए तो इससे पशुपालकों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिल सकता है। साथ ही जैविक कृषि उत्पादों के निर्माण के जरिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है।
परियोजना का एक उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थानीय स्तर पर मजबूत करना भी है। गोमूत्र की खरीद, उसका संग्रहण, उत्पाद तैयार करने और उन्हें किसानों तक पहुंचाने की प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर लोगों को जोड़ा जा रहा है। इससे गांवों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
परियोजना से जुड़े लोगों के अनुसार यदि यह मॉडल सफल रहता है तो भविष्य में इसे आसपास के अन्य गांवों तक भी विस्तार दिया जा सकता है। इससे अधिक पशुपालकों और ग्रामीण महिलाओं को योजना से जोड़ने की संभावना बनेगी। साथ ही प्राकृतिक खेती के लिए स्थानीय स्तर पर जैविक उत्पाद तैयार करने का दायरा भी बढ़ाया जा सकता है।
फिलहाल नरसैना और आसपास के गांवों में शुरू हुई यह पहल गोवंश संरक्षण, पशुपालकों की अतिरिक्त आय, महिला भागीदारी और जैविक खेती को एक साथ जोड़ने का प्रयास है। आने वाले समय में इसके विस्तार और परिणामों के आधार पर यह देखा जाएगा कि यह मॉडल ग्रामीण क्षेत्रों में कितनी प्रभावी आर्थिक और कृषि गतिविधि के रूप में विकसित होता है।
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