सीएम का सियासी संदेश: हिंदुत्व और जाट भावनाओं के जरिए पश्चिमी यूपी साधने की रणनीति
मथुरा। अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा दौरा धार्मिक आयोजन से कहीं आगे राजनीतिक संदेश देता नजर आया। जन्माष्टमी के मौके पर कान्हा की नगरी पहुंचे मुख्यमंत्री के तेवर इस बार पहले की तुलना में अधिक आक्रामक दिखाई दिए। उन्होंने ब्रजभूमि से हिंदुत्व और श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे को धार देने के साथ-साथ जाट समाज की भावनाओं को भी साधने की कोशिश की। राजनीतिक जानकारों की नजर में मुख्यमंत्री के इन दोनों संदेशों का सीधा संबंध पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन से है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब तक श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर छह बार मथुरा आ चुके हैं। हर बार उनका दौरा धार्मिक आस्था और कृष्ण भक्ति के रंग में नजर आता रहा है, लेकिन इस बार उनके भाषण और राजनीतिक संकेतों में चुनावी तेवर अधिक स्पष्ट दिखाई दिए। ब्रजभूमि से उन्होंने जिस तरह हिंदुत्व, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और सामाजिक समीकरणों को एक साथ साधने की कोशिश की, उससे माना जा रहा है कि भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी चुनावी रणनीति को अभी से मजबूत करने में जुट गई है।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि को बनाया बड़ा मुद्दा
मुख्यमंत्री योगी के संदेश में श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा सबसे प्रमुख रहा। मथुरा भाजपा के लिए लंबे समय से धार्मिक और सांस्कृतिक राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद काशी और मथुरा से जुड़े मुद्दे भी भाजपा के राजनीतिक विमर्श में लगातार चर्चा में रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ ने ब्रजभूमि से हिंदुत्व के मुद्दे को जिस आक्रामक अंदाज में उठाया, उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के बीच भाजपा के पुराने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा के लिए मथुरा सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि हिंदुत्व की राजनीति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक भी है।
मुख्यमंत्री का मथुरा दौरा ऐसे समय हुआ है जब अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल अपनी तैयारियों को गति देने लगे हैं। ऐसे में जन्माष्टमी जैसे बड़े धार्मिक आयोजन के मंच से दिया गया संदेश राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अखिलेश यादव को भी घेरा
मुख्यमंत्री योगी ने अपने संबोधन के जरिए समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख अखिलेश यादव को भी निशाने पर लिया। उनके तेवरों से यह संकेत मिला कि आने वाले चुनाव में भाजपा हिंदुत्व के मुद्दे पर विपक्ष को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा और सपा के बीच राजनीतिक मुकाबला कई सीटों पर बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है। ऐसे में अखिलेश यादव को सीधे या परोक्ष रूप से चुनौती देना भाजपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
भाजपा की कोशिश यह संदेश देने की है कि वह धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर अपने पुराने एजेंडे से पीछे हटने वाली नहीं है। वहीं विपक्ष के सामने चुनौती यह है कि वह इन मुद्दों का राजनीतिक जवाब किस तरीके से देता है और विकास, रोजगार, किसान तथा सामाजिक समीकरणों जैसे मुद्दों को कितनी मजबूती से चुनावी बहस में ला पाता है।
जाट राजनीति पर भी नजर
योगी आदित्यनाथ के मथुरा दौरे का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जाट समाज से जुड़ा संदेश रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट मतदाताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, बिजनौर, मथुरा और आसपास के क्षेत्रों में जाट मतदाता कई विधानसभा सीटों पर चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।
किसान आंदोलन के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने जाट मतदाताओं को लेकर राजनीतिक चुनौती की चर्चा तेज हुई थी। हालांकि बाद के चुनावों में भाजपा ने विभिन्न सामाजिक समीकरणों के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की। अब विधानसभा चुनाव से पहले जाट भावनाओं को साधने की कोशिश को इसी व्यापक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री का ब्रजभूमि से जाट समाज को संदेश देना इस लिहाज से अहम है कि भाजपा धार्मिक मुद्दों के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों को भी अपने पक्ष में मजबूत करना चाहती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के साथ गैर-जाट ओबीसी, दलित और अन्य वर्गों का समीकरण भाजपा के लिए चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
हिंदुत्व और सामाजिक समीकरण का मेल
मथुरा में मुख्यमंत्री योगी का इस बार का संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भाजपा की दो अलग-अलग राजनीतिक रणनीतियां एक साथ दिखाई दीं। पहली रणनीति हिंदुत्व के एजेंडे को मजबूत करने की है और दूसरी सामाजिक समीकरणों को साधने की।
अयोध्या के बाद मथुरा भाजपा की सांस्कृतिक राजनीति का बड़ा केंद्र बन चुका है। ऐसे में श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा पार्टी के समर्थक वर्ग में भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है। दूसरी ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं को साधना चुनावी गणित के लिहाज से जरूरी माना जाता है।
यही वजह है कि योगी के मथुरा दौरे को केवल धार्मिक कार्यक्रम के तौर पर देखना राजनीतिक रूप से अधूरा आकलन माना जा सकता है। मुख्यमंत्री ने जिस समय और जिस मंच से ये संदेश दिए, उनका चुनावी महत्व भी उतना ही बड़ा है।
पश्चिमी यूपी पर भाजपा की नजर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हमेशा से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। यहां जातीय समीकरण, किसान राजनीति, धार्मिक मुद्दे और स्थानीय समस्याएं चुनावी परिणामों को प्रभावित करती हैं। भाजपा के लिए इस क्षेत्र में मजबूत प्रदर्शन सत्ता में वापसी की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मथुरा दौरा इसी बड़े राजनीतिक परिदृश्य में देखा जा रहा है। एक तरफ उन्होंने कृष्ण जन्मभूमि और हिंदुत्व के मुद्दे को धार दी, तो दूसरी तरफ जाट भावनाओं को संबोधित कर सामाजिक समीकरणों को साधने का संकेत दिया।
राजनीतिक तौर पर इसका संदेश साफ है कि भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी जमीन तैयार करने के लिए धार्मिक पहचान और सामाजिक समीकरण दोनों को साथ लेकर चलना चाहती है। अब देखना यह होगा कि विपक्ष इन मुद्दों का जवाब किस रणनीति से देता है और आने वाले महीनों में पश्चिमी यूपी की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।