पिथौरागढ़। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में लगातार हो रहा पलायन और बुनियादी सुविधाओं की कमी किस तरह ग्रामीणों के लिए गंभीर संकट बनती जा रही है, इसकी तस्वीर गणाईगंगोली तहसील के पभ्या गांव में देखने को मिली। यहां एक 70 वर्षीय घायल वृद्धा को अस्पताल पहुंचाने की जरूरत पड़ी तो गांव में उनकी डोली उठाने के लिए पर्याप्त युवा तक नहीं मिले। रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में बड़ी संख्या में युवाओं के गांव छोड़ने का असर अब आपातकालीन परिस्थितियों में भी दिखाई देने लगा है।
पभ्या गांव की घटना ने पहाड़ के उन गांवों की स्थिति को एक बार फिर सामने ला दिया है, जहां सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को मुख्य सड़क या अस्पताल तक पहुंचाने के लिए आज भी डोली का सहारा लेना पड़ता है। पहले गांवों में पर्याप्त संख्या में युवा होने के कारण जरूरत पड़ने पर लोग एक-दूसरे की मदद के लिए तुरंत पहुंच जाते थे, लेकिन पलायन के बाद कई गांवों में बुजुर्गों की आबादी ही अधिक रह गई है।
घायल हुई 70 वर्षीय वृद्धा
पभ्या गांव की करीब 70 वर्षीय महिला के घायल होने के बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ी। लेकिन समस्या यह थी कि गांव से सड़क या स्वास्थ्य सुविधा तक उन्हें पहुंचाने के लिए डोली का सहारा लेना जरूरी था।
जब वृद्धा को डोली में ले जाने की तैयारी की गई तो गांव में पर्याप्त संख्या में ऐसे युवा नहीं मिले, जो उन्हें कंधे पर उठाकर कठिन पहाड़ी रास्ते से ले जा सकें।
इस स्थिति ने घायल वृद्धा और उनके परिवार की परेशानी कई गुना बढ़ा दी।
डोली उठाने के लिए नहीं मिले चार कंधे
पहाड़ के सड़क विहीन गांवों में किसी मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए आमतौर पर डोली या अस्थायी स्ट्रेचर का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए कम से कम चार स्वस्थ लोगों की आवश्यकता पड़ती है, जबकि लंबा और कठिन रास्ता होने पर बीच-बीच में लोगों को बदलने के लिए अतिरिक्त ग्रामीणों की भी जरूरत होती है।
पभ्या गांव में हालात ऐसे हो चुके हैं कि संकट के समय चार कंधों की व्यवस्था करना भी मुश्किल हो गया।
यह केवल एक परिवार की परेशानी नहीं बल्कि गांव की बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति की गंभीर तस्वीर बनकर सामने आई है।
रोजगार की तलाश में गांव छोड़ रहे युवा
पहाड़ी क्षेत्रों से युवाओं के पलायन की प्रमुख वजहों में रोजगार के सीमित अवसर और बुनियादी सुविधाओं की कमी शामिल हैं।
बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी और अन्य सुविधाओं के लिए युवा मैदानी शहरों और बड़े कस्बों की ओर जा रहे हैं। कई परिवार स्थायी रूप से भी गांव छोड़ चुके हैं।
इसका परिणाम यह है कि कई पहाड़ी गांवों में अब बुजुर्ग आबादी ज्यादा रह गई है। खेती से लेकर रोजमर्रा के काम और आपात स्थिति में मदद तक के लिए लोगों की कमी महसूस होने लगी है।
सड़क की कमी बढ़ाती है मुश्किल
पहाड़ी गांवों में सड़क संपर्क का अभाव स्वास्थ्य आपातकाल को और गंभीर बना देता है। जहां एंबुलेंस सीधे गांव तक नहीं पहुंच सकती, वहां मरीज को पहले पैदल या डोली के जरिए सड़क तक लाना पड़ता है।
यदि गांव में पर्याप्त लोग मौजूद हों तो यह मुश्किल काम सामूहिक प्रयास से किया जा सकता है, लेकिन पलायन के कारण मानव संसाधन की कमी होने पर स्थिति जानलेवा बन सकती है।
गंभीर मरीजों के मामले में इलाज में होने वाली थोड़ी सी देरी भी भारी पड़ सकती है।
स्वास्थ्य सुविधाओं का सवाल भी सामने
पभ्या गांव की घटना स्वास्थ्य सेवाओं तक ग्रामीणों की पहुंच को लेकर भी सवाल खड़े करती है।
पहाड़ी क्षेत्रों में अस्पताल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करना कई बार मजबूरी बन जाती है। आपात स्थिति में सबसे पहले मरीज को सड़क तक पहुंचाने और फिर वाहन के जरिए अस्पताल ले जाने की व्यवस्था करनी पड़ती है।
यदि आसपास पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो और सड़क संपर्क बेहतर हो तो मरीजों को समय पर उपचार मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
बुजुर्गों के लिए बढ़ रही चुनौती
युवाओं के पलायन का सबसे ज्यादा असर गांवों में रह रहे बुजुर्गों पर दिखाई देता है। उम्र बढ़ने के साथ उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन परिवार के युवा सदस्य रोजगार के कारण दूसरे शहरों में रहने को मजबूर होते हैं।
ऐसे में अचानक बीमारी या दुर्घटना होने पर पड़ोसियों और गांव के दूसरे लोगों पर निर्भरता बढ़ जाती है।
लेकिन जब पूरा गांव ही पलायन की समस्या से जूझ रहा हो तो सहायता के लिए लोगों को जुटाना मुश्किल हो जाता है।
कभी सामूहिकता थी पहाड़ की ताकत
पहाड़ी गांवों की सामाजिक व्यवस्था लंबे समय तक सामूहिक सहयोग पर आधारित रही है। खेती, मकान निर्माण, शादी-विवाह और बीमारी जैसी परिस्थितियों में ग्रामीण एक-दूसरे की मदद करते रहे हैं।
मरीज को अस्पताल पहुंचाने की जरूरत पड़ने पर गांव के युवा डोली लेकर निकल पड़ते थे।
लेकिन लगातार घटती आबादी ने इस व्यवस्था को कमजोर किया है। कई गांवों में घर तो मौजूद हैं लेकिन उनमें रहने वाले लोगों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।
पलायन केवल आबादी का मुद्दा नहीं
पभ्या की घटना बताती है कि पलायन को केवल गांव की आबादी कम होने के आंकड़े के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका असर सामाजिक सुरक्षा, खेती, स्वास्थ्य और बुजुर्गों की देखभाल जैसी बुनियादी जरूरतों पर भी पड़ता है।
यदि गांवों में रोजगार और सुविधाओं के पर्याप्त अवसर नहीं बनते हैं तो युवाओं को वापस रोकना चुनौती बना रहेगा।
इसके लिए सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, इंटरनेट और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों को मजबूत करने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।
आपात स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी
दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिससे किसी मरीज को केवल ग्रामीणों के कंधों पर निर्भर न रहना पड़े।
सड़क संपर्क बढ़ाने के साथ दूरस्थ क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, एंबुलेंस नेटवर्क और स्थानीय स्तर पर आपात सहायता व्यवस्था को मजबूत करना महत्वपूर्ण हो सकता है।
इससे खासकर बुजुर्गों और अकेले रह रहे लोगों को संकट के समय मदद मिल सकेगी।
पभ्या की घटना ने दिखाई पहाड़ की हकीकत
70 वर्षीय घायल वृद्धा को अस्पताल पहुंचाने के लिए डोली उठाने वाले लोगों की कमी ने पहाड़ी गांवों के सामने खड़ी दो बड़ी समस्याओं—पलायन और बुनियादी सुविधाओं के अभाव—को एक साथ सामने ला दिया है।
पलायन के कारण गांवों में युवा कम हो रहे हैं और सड़क-स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण जो लोग वहां बचे हैं, उनके लिए आपात स्थिति का सामना करना मुश्किल होता जा रहा है।
पभ्या गांव की घटना एक वृद्ध महिला की परेशानी भर नहीं है, बल्कि यह उन अनेक पहाड़ी गांवों की तस्वीर है जहां संकट के समय अब मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए चार कंधे जुटाना भी चुनौती बनता जा रहा है।







