उत्तर प्रदेश : चकबंदी प्रक्रिया को लेकर सरकार ने किसानों के हित में बड़ा फैसला लिया है। अब चकबंदी के दौरान यदि किसी गांव में सार्वजनिक उपयोग या अन्य आवश्यक कारणों से **तीन प्रतिशत से अधिक भूमि की कटौती** करनी होगी, तो इसके लिए चकबंदी आयुक्त की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इस संबंध में चकबंदी आयुक्त की ओर से नए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
नए आदेश के अनुसार, प्रारंभिक चकबंदी योजना में बदलाव या उसे वापस लेने की प्रक्रिया भी अब बिना उच्च स्तर की अनुमति के नहीं की जा सकेगी। अधिकारियों को किसी भी बड़े बदलाव से पहले निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। सरकार का उद्देश्य है कि चकबंदी के नाम पर किसानों की कृषि भूमि का अनावश्यक नुकसान न हो और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से आगे बढ़े।
किसानों की जमीन बचाने पर जोर
चकबंदी प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य बिखरी हुई कृषि भूमि को व्यवस्थित करना और किसानों को बेहतर खेती के लिए एक जगह जमीन उपलब्ध कराना होता है। हालांकि कई बार चकबंदी के दौरान सार्वजनिक कार्यों, रास्तों, स्कूलों, सरकारी सुविधाओं या अन्य योजनाओं के लिए भूमि कटौती की जाती है।
अब चकबंदी आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि सामान्य परिस्थितियों में सार्वजनिक प्रयोजन के लिए तीन प्रतिशत से अधिक भूमि की कटौती नहीं की जाएगी। इससे किसानों की उपजाऊ कृषि भूमि को अनावश्यक रूप से प्रभावित होने से बचाने की कोशिश की गई है।
तीन प्रतिशत से ज्यादा कटौती के लिए क्या होगी प्रक्रिया?
नए निर्देशों के अनुसार, यदि किसी गांव में किसी विशेष और अपरिहार्य परिस्थिति में तीन प्रतिशत से अधिक भूमि की आवश्यकता पड़ती है तो संबंधित अधिकारी सीधे फैसला नहीं ले सकेंगे।
इसके लिए जिलाधिकारी और जिला उप संचालक चकबंदी की संस्तुति के साथ पूरा प्रस्ताव चकबंदी आयुक्त को भेजना होगा। प्रस्ताव की समीक्षा के बाद ही आयुक्त की अनुमति मिलने पर आगे की कार्रवाई की जा सकेगी।
इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अधिक भूमि कटौती का फैसला सोच-समझकर और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए लिया जाए।
अधिकारियों की जवाबदेही तय
चकबंदी आयुक्त ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि नए आदेशों का सख्ती से पालन किया जाए। यदि किसी अधिकारी द्वारा बिना अनुमति के तीन प्रतिशत से अधिक भूमि कटौती की जाती है या नियमों की अनदेखी की जाती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
सरकार का मानना है कि चकबंदी व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने और किसानों की शिकायतों को कम करने के लिए जवाबदेही तय करना जरूरी है।
प्रारंभिक चकबंदी योजना में बदलाव पर भी सख्ती
नए आदेश में प्रारंभिक चकबंदी योजना को वापस लेने या उसमें बड़े बदलाव करने को लेकर भी नियम सख्त किए गए हैं। अब ऐसी कार्रवाई केवल बेहद जरूरी परिस्थितियों में ही की जाएगी।
इसके लिए भी संबंधित अधिकारियों को कारणों सहित प्रस्ताव तैयार कर चकबंदी आयुक्त को भेजना होगा। अनुमति मिलने के बाद ही योजना में बदलाव किया जा सकेगा।
किसानों को क्या फायदा होगा?
इस फैसले का सीधा लाभ किसानों को मिलने की उम्मीद है। अक्सर चकबंदी प्रक्रिया में जमीन की स्थिति, रास्तों और सार्वजनिक सुविधाओं के नाम पर भूमि को लेकर विवाद सामने आते हैं।
नई व्यवस्था से किसानों को उम्मीद है कि उनकी कृषि भूमि पर मनमाने तरीके से कटौती नहीं होगी और किसी भी बड़े फैसले से पहले उच्च स्तर पर जांच होगी।
चकबंदी व्यवस्था में सुधार की कोशिश
उत्तर प्रदेश में चकबंदी एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया है। राज्य के कई जिलों में लंबे समय से चकबंदी से जुड़े मामले लंबित हैं। कई बार किसानों की शिकायत रहती है कि प्रक्रिया में देरी और गलत निर्णयों के कारण उन्हें परेशानी उठानी पड़ती है।
सरकार लगातार चकबंदी प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और किसान हितैषी बनाने के लिए कदम उठा रही है। नए आदेश को भी इसी दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।
अनावश्यक देरी पर भी नजर
जहां एक ओर किसानों की जमीन की सुरक्षा पर जोर दिया गया है, वहीं अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि चकबंदी प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबा न खींचा जाए। समय पर काम पूरा करने और लोगों की समस्याओं का समाधान करने पर भी ध्यान देने को कहा गया है।