वाराणसी। कोयला खनन के क्षेत्र में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। खदानों से कोयला निकालने के लिए अब डायनामाइट विस्फोट की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे खनन के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में कमी आने के साथ ही पर्यावरण को होने वाले नुकसान से भी बचाव होगा।

इस नई तकनीक को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बीएचयू के खनन अभियंत्रण विभाग के विज्ञानियों ने विकसित किया है। विभाग द्वारा तैयार किए गए नए ब्लास्ट फ्री ऑप्टिमाइज्ड सरफेस माइनर कटिंग ड्रम के माध्यम से बिना विस्फोट किए कोयला निकाला जा सकेगा।

वर्तमान में कई खदानों में कोयले की बड़ी चट्टानों को तोड़ने के लिए विस्फोटक यानी डायनामाइट का इस्तेमाल किया जाता है। इससे कई बार दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। विस्फोट के कारण आसपास के क्षेत्र में कंपन, धूल और प्रदूषण जैसी समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं।

नई तकनीक के आने से खनन प्रक्रिया अधिक सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल हो सकेगी। इससे श्रमिकों की सुरक्षा बढ़ेगी और खनन क्षेत्र में होने वाले हादसों को कम करने में मदद मिलेगी।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कोयला निकालने के दौरान ही उसे जरूरत के अनुसार आकार में तैयार किया जा सकेगा। कोयला कंपनियां अब सीधे तापीय विद्युत परियोजनाओं के लिए उपयुक्त 50 मिलीमीटर आकार का कोयला तैयार कर सकेंगी।

अभी खदानों से निकलने वाले बड़े आकार के कोयले को पहले ढोकर लाया जाता है। इसके बाद उसे छोटे टुकड़ों में तोड़ने, क्रशिंग करने और आकार के अनुसार छंटाई करने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसमें अतिरिक्त समय, श्रम और लागत खर्च होती है।

नई कटिंग ड्रम तकनीक से इन अतिरिक्त प्रक्रियाओं में कमी आएगी। इससे कोयले की ढुलाई, क्रशिंग और छंटाई पर होने वाला खर्च कम होगा। साथ ही ऊर्जा और समय की भी बचत होगी।

खनन अभियंत्रण विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक कोयला उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। इससे उत्पादन प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा और खनन कार्यों में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ेगा।

पर्यावरण की दृष्टि से भी यह तकनीक काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। डायनामाइट विस्फोट से निकलने वाली धूल, ध्वनि प्रदूषण और जमीन पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सकेगा।

कोयला देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का एक प्रमुख स्रोत है। तापीय विद्युत परियोजनाओं के लिए लगातार बड़ी मात्रा में कोयले की आवश्यकता होती है। ऐसे में उत्पादन प्रक्रिया को आसान और सुरक्षित बनाना जरूरी है।

IIT बीएचयू के विज्ञानियों द्वारा विकसित यह तकनीक कोयला कंपनियों के लिए लागत कम करने वाला समाधान साबित हो सकती है। इससे खनन क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ब्लास्ट फ्री तकनीक भविष्य के खनन की दिशा तय कर सकती है। इससे न केवल श्रमिकों की सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि खनन गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव भी कम होगा।

कोयला कंपनियां इस तकनीक का इस्तेमाल कर सीधे उपयोग योग्य कोयला तैयार कर सकेंगी। इससे बिजली उत्पादन कंपनियों को भी बेहतर गुणवत्ता वाला कोयला समय पर उपलब्ध हो सकेगा।

खनन क्षेत्र में लगातार नई तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार और उद्योग जगत सुरक्षित, टिकाऊ और कम लागत वाली खनन प्रक्रिया विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

IIT बीएचयू की यह पहल इसी प्रयास का हिस्सा है, जो आने वाले समय में कोयला उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को बदल सकती है।

यदि इस तकनीक का बड़े स्तर पर उपयोग शुरू होता है तो खनन क्षेत्र में सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक बचत तीनों मोर्चों पर लाभ मिलने की संभावना है।

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