गाजीपुर। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। यहां छह वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को समय पर चिकित्सकीय सहायता मिलने के बजाय अस्पताल और थाने के चक्कर लगाने पड़े। गंभीर हालत में बच्ची को लेकर उसके पिता करीब आठ घंटे तक परेशान रहे। आरोप है कि तत्काल इलाज शुरू करने के बजाय अस्पताल के कर्मचारियों ने परिजनों को पहले कानूनी प्रक्रिया पूरी करने और फिर दूसरे चिकित्सा केंद्र जाने के लिए कहा। बाद में इस मामले की जांच में दो महिला चिकित्सकों को जिम्मेदार ठहराया गया।
यह मामला गाजीपुर जिले के नंदगंज थाना क्षेत्र में 26 मार्च 2026 को हुई घटना से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, छह वर्षीय बच्ची के साथ पड़ोस के एक किशोर ने कथित तौर पर दुष्कर्म किया था। घटना के बाद बच्ची की तबीयत बिगड़ गई और उसे तत्काल चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता थी। परिजन बिना देरी किए उसे राजकीय मेडिकल कॉलेज से संबद्ध महिला अस्पताल लेकर पहुंचे। उन्हें उम्मीद थी कि अस्पताल में बच्ची का उपचार तुरंत शुरू हो जाएगा, लेकिन वहां उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा।
पीड़िता के पिता का आरोप है कि बच्ची को रक्तस्राव हो रहा था और वह दर्द से परेशान थी। इसके बावजूद अस्पताल में तत्काल उपचार उपलब्ध कराने के बजाय उन्हें पहले प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए थाने जाने को कहा गया। बच्ची की हालत देखकर परिवार बेहद चिंतित था। एक तरफ बेटी की तकलीफ थी, तो दूसरी ओर आवश्यक उपचार मिलने में हो रही देरी ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी।बताया गया कि परिजन पहले अस्पताल के नजदीक स्थित शहर कोतवाली पहुंचे। वहां उन्हें बताया गया कि घटना नंदगंज थाना क्षेत्र की है, इसलिए शिकायत संबंधित थाने में दर्ज करानी होगी। इसके बाद परिवार को करीब 25 किलोमीटर दूर नंदगंज थाने जाना पड़ा। आरोप है कि कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने में लगभग पांच से छह घंटे लग गए।
इस दौरान बच्ची को तत्काल चिकित्सकीय सहायता नहीं मिल पाने के आरोप ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया। परिजन लगातार उपचार की व्यवस्था करने का प्रयास करते रहे। एक अस्पताल से थाने और फिर दूसरे चिकित्सा केंद्र तक जाने की मजबूरी ने परिवार की मुश्किलें बढ़ा दीं।मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रात करीब आठ बजे जब परिजन प्राथमिकी की प्रति लेकर दोबारा महिला अस्पताल पहुंचे, तब भी उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। आरोप है कि चिकित्सकों ने मेडिकल परीक्षण का हवाला देते हुए बच्ची को राजकीय मेडिकल कॉलेज परिसर के ट्रॉमा सेंटर भेज दिया। इस तरह इलाज के लिए आए परिवार को अलग-अलग स्थानों पर जाना पड़ा।
बच्ची के पिता ने उपचार में हुई देरी को लेकर नाराजगी जताई। उनका कहना था कि ऐसी गंभीर परिस्थिति में अस्पताल प्रशासन को सबसे पहले बच्ची की जान और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए थी। घटना की जानकारी सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे।यह मामला केवल एक परिवार की परेशानी तक सीमित नहीं रहा। घटना ने यह महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया कि यौन हिंसा की शिकार नाबालिग बच्चियों के लिए आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था कितनी प्रभावी है। विशेष रूप से गंभीर चोट या रक्तस्राव जैसी परिस्थितियों में तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है। ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी पीड़ित की शारीरिक स्थिति को और प्रभावित कर सकती है।
मामला सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच शुरू हुई। तत्कालीन जिलाधिकारी ने मुख्य चिकित्साधिकारी से रिपोर्ट मांगी। प्रकरण राज्य मानवाधिकार आयोग और राज्य महिला आयोग तक भी पहुंचा। मानवाधिकार आयोग की ओर से रिपोर्ट मांगे जाने के बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।जून 2026 में सामने आई जांच संबंधी रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य चिकित्साधिकारी की जांच में राजकीय मेडिकल कॉलेज से जुड़ी दो महिला चिकित्सकों, डॉ. प्रीति पाल और डॉ. गीतिका, को उपचार में हुई लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। सीएमओ ने दोनों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की। जिलाधिकारी की ओर से स्वास्थ्य विभाग और पुलिस विभाग की रिपोर्ट राज्य मानवाधिकार आयोग को भेजी गई। हालांकि, कार्रवाई की संस्तुति और अंतिम विभागीय दंड अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। उपलब्ध रिपोर्ट में अंतिम दंड की पुष्टि नहीं हुई है।
इस घटना ने चिकित्सा संस्थानों में आपातकालीन सेवाओं और मेडिको-लीगल प्रक्रियाओं के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत को सामने रखा है। दुष्कर्म या अन्य यौन अपराधों की पीड़िताओं के उपचार में संवेदनशीलता बेहद आवश्यक है। पीड़िता को सुरक्षित वातावरण, तत्काल चिकित्सा सहायता और आवश्यक मनोवैज्ञानिक सहयोग उपलब्ध कराना स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के साथ यौन हिंसा की घटनाओं में शारीरिक उपचार के साथ मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। ऐसी घटनाएं बच्चों में भय, असुरक्षा और मानसिक तनाव पैदा कर सकती हैं। इसलिए उपचार के दौरान बच्ची की उम्र, परिस्थिति और भावनात्मक स्थिति का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
इस मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि परिवार को चिकित्सकीय सहायता और कानूनी प्रक्रिया के बीच लगातार संघर्ष करना पड़ा। ऐसी परिस्थितियों में अस्पतालों, पुलिस और प्रशासन के बीच प्रभावी समन्वय होना जरूरी है, जिससे पीड़ित परिवारों को अलग-अलग कार्यालयों और चिकित्सा केंद्रों के चक्कर न लगाने पड़ें।घटना ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अस्पतालों में सुविधाएं उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। उन सुविधाओं तक जरूरतमंद मरीजों की समय पर पहुंच सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से बच्चों और यौन हिंसा के पीड़ितों के मामलों में किसी भी स्तर पर असंवेदनशीलता गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
गाजीपुर की इस घटना के बाद संबंधित चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, बड़ा सवाल यही है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अस्पतालों में किस तरह के ठोस सुधार किए जाएंगे।इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर याद दिलाया है कि आपातकालीन चिकित्सा सहायता समय पर मिलना प्रत्येक पीड़ित का अधिकार है। अस्पतालों की पहली प्राथमिकता मरीज की सुरक्षा और उपचार होनी चाहिए। प्रशासनिक औपचारिकताओं के कारण किसी मासूम को इलाज के लिए घंटों भटकना पड़े, ऐसी स्थिति स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।