लखनऊ। उत्तर प्रदेश की दस राज्यसभा सीटों पर चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने के साथ सभी उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं। भारतीय जनता पार्टी के आठ और समाजवादी पार्टी के दो उम्मीदवारों को जीत मिली है। शुक्रवार, 9 अक्टूबर को नाम वापसी की समयसीमा समाप्त होने के बाद निर्वाचन की तस्वीर स्पष्ट हुई। सीटों के बराबर उम्मीदवार रहने के कारण मतदान की जरूरत नहीं पड़ी। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का कोई उम्मीदवार निर्वाचित नहीं हुआ है। 
भाजपा की ओर से धर्मपाल सिंह, प्रकाश पाल, श्रुति गंगवार, विद्यासागर सोनकर, प्रियंका सिंह रावत, राधाकांत ओझा, गोपी कृष्ण पांडेय और राम प्रताप सिंह चौहान राज्यसभा के लिए चुने गए हैं। समाजवादी पार्टी की ओर से प्रोफेसर रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी निर्वाचित हुए हैं। इस प्रकार दस सीटों में आठ भाजपा और दो सपा के खाते में गई हैं।
इस परिणाम का अर्थ यह है कि दसों उम्मीदवारों के बीच मतों की प्रतिस्पर्धा नहीं हुई। इसे लोकसभा की तरह जनता के सीधे मतदान वाला चुनाव भी नहीं समझना चाहिए। राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधियों का चुनाव संबंधित विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों के माध्यम से होता है। इसलिए राज्यसभा चुनाव में
विधानसभा
का संख्या बल और उम्मीदवारों की संख्या महत्वपूर्ण होती है। इस बार मतदान की स्थिति बनने से पहले ही निर्विरोध निर्वाचन का रास्ता साफ हो गया।
नामांकन के अंतिम दिन, मंगलवार 6 अक्टूबर को भाजपा के आठों प्रत्याशियों ने अपने नामांकन पत्र दाखिल किए थे। इससे पहले सभी उम्मीदवार पार्टी के प्रदेश मुख्यालय पहुंचे, जहां नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया। इसके बाद वे सामूहिक रूप से विधान भवन स्थित नामांकन कक्ष के लिए रवाना हुए। निर्वाचन अधिकारी अजीत कुमार वर्मा ने उनके नामांकन पत्र स्वीकार किए थे।
समाजवादी पार्टी के दोनों उम्मीदवार पहले ही नामांकन दाखिल कर चुके थे। रामगोपाल यादव और धनराज नाथवानी ने 30 सितंबर को अपने नामांकन पत्र जमा किए थे। अंतिम दिन रामगोपाल यादव ने नामांकन का एक अतिरिक्त सेट भी प्रस्तुत किया। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद भाजपा के आठ और सपा के दो उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने की स्थिति बन गई थी। औपचारिक घोषणा के लिए नाम वापसी की समयसीमा समाप्त होने का इंतजार था। 
इस चुनाव से पहले दसवीं सीट पर संभावित मुकाबले की चर्चा थी। समाजवादी पार्टी की ओर से तीसरा उम्मीदवार उतारे जाने की संभावना को लेकर राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे थे। लेकिन पार्टी ने अंतिम दिन भी तीसरा प्रत्याशी नहीं उतारा। इसके बाद दस सीटों पर भाजपा और सपा के कुल दस उम्मीदवार ही प्रमुख दावेदार रहे। अतिरिक्त उम्मीदवार नहीं आने से मतदान और संभावित क्रॉस वोटिंग की स्थिति नहीं बनी। 
भाजपा ने इस बार उम्मीदवारों की सूची में बदलाव किया और उत्तर प्रदेश से कार्यकाल पूरा करने वाले अपने मौजूदा राज्यसभा सदस्यों को दोबारा टिकट नहीं दिया। पार्टी के आठ नए उम्मीदवारों में दो महिलाएं, प्रियंका सिंह रावत और श्रुति गंगवार, शामिल हैं। उम्मीदवारों के चयन में अलग-अलग सामाजिक समुदायों के प्रतिनिधियों को स्थान दिया गया है। हालांकि, इस चयन का आगामी चुनावों पर क्या असर होगा, यह वर्तमान परिणाम से निश्चित नहीं किया जा सकता। 
पार्टी की सूची में प्रदेश सरकार के मंत्री धर्मपाल सिंह और पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश पाल जैसे नाम शामिल हैं। श्रुति गंगवार झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी हैं। राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडेय भी भाजपा की ओर से चुने गए प्रतिनिधियों में शामिल हैं। उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचन होने से उनके लिए मतगणना और वरीयता मतों के आधार पर परिणाम तय करने की आवश्यकता नहीं रही। 
बहुजन समाज पार्टी के लिए इस चुनाव का परिणाम महत्वपूर्ण है। पार्टी को इन दस सीटों में कोई स्थान नहीं मिला है। उसके राज्यसभा सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त होना है। इसलिए आज के चुनाव परिणाम और उनके मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति को अलग-अलग समझना जरूरी है। यह कहना सही नहीं होगा कि निर्वाचन की घोषणा होते ही उनकी सदस्यता समाप्त हो गई। 
निर्विरोध निर्वाचन का परिणाम किसी दल के जनमत प्रतिशत का नया माप भी नहीं है। इस प्रक्रिया में जनता से सीधे वोट नहीं लिए गए और उम्मीदवारों के बीच मतदान नहीं हुआ। इसलिए आठ और दो सीटों का बंटवारा इस राज्यसभा चुनाव का परिणाम है; इसे आगामी विधानसभा चुनाव के निश्चित नतीजे के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
उत्तर प्रदेश की जिन दस सीटों के लिए यह प्रक्रिया हुई है, उनके मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर तक है। नए सदस्यों का निर्वाचन उस कार्यकाल की समाप्ति से पहले पूरा किया गया है। भाजपा और सपा के दसों उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने के बाद इन सीटों के लिए मतदान की जरूरत समाप्त हो गई है। बसपा को इस चुनाव में नया प्रतिनिधि नहीं मिलने से उसके संसदीय प्रतिनिधित्व को लेकर चुनौती बनी हुई है।
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