आजमगढ़। दीपावली का त्योहार आते ही घरों और बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। हर कोई अपने घर को रोशनी से सजाने की तैयारी करता है। रंग-बिरंगी झालरों, आकर्षक लाइटों और सजावटी सामान के बीच मिट्टी के दीयों का अपना विशेष महत्व है। लेकिन इन दीयों को बनाने वाले कुम्हारों की जिंदगी में कितनी रोशनी पहुंचती है, यह सवाल अक्सर त्योहार की चमक-दमक में कहीं खो जाता है। इसी सवाल को संवेदनशीलता के साथ सामने लाने वाली एक अनूठी पहल उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में देखने को मिली। यहां लालगंज की उपजिलाधिकारी (एसडीएम) नेहा मिश्रा ग्राम चिरकिहिट पहुंचीं और कुम्हारों के बीच बैठकर उनकी पारंपरिक कला को करीब से समझा।
एसडीएम नेहा मिश्रा का यह दौरा किसी औपचारिक सरकारी कार्यक्रम जैसा नहीं था। न कोई बड़ा मंच सजाया गया और न ही किसी विशेष आयोजन की व्यवस्था की गई। उन्होंने सीधे कुम्हारों के बीच पहुंचकर उनसे बातचीत की और मिट्टी के बर्तन तथा दीये तैयार करने की प्रक्रिया को समझा। इस दौरान उन्होंने खुद चाक चलाना सीखा और अपने हाथों से मिट्टी को दीये का आकार देने का प्रयास किया। उनकी इस पहल ने स्थानीय कारीगरों की मेहनत और पारंपरिक हुनर को चर्चा के केंद्र में ला दिया।
दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा सदियों पुरानी है। देश के विभिन्न हिस्सों में आज भी बड़ी संख्या में कुम्हार परिवार इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। मिट्टी को तैयार करना, उसे चाक पर आकार देना, दीयों को सुखाना और फिर भट्ठी में पकाना आसान काम नहीं है। इसके पीछे कई दिनों की मेहनत और वर्षों का अनुभव होता है। हालांकि आधुनिक सजावटी सामान और बिजली की झालरों के बढ़ते चलन के कारण पारंपरिक मिट्टी के दीयों को बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।ग्राम चिरकिहिट पहुंचीं एसडीएम नेहा मिश्रा ने कुम्हारों के काम को केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसे खुद करके भी समझने का प्रयास किया। चाक पर मिट्टी को आकार देना जितना सरल दिखाई देता है, वास्तविकता में उतना ही कठिन होता है। इसमें हाथों का संतुलन, सही गति और लंबे अभ्यास की जरूरत होती है। कुम्हार अपनी उंगलियों के सहारे साधारण मिट्टी को उपयोगी और सुंदर वस्तुओं में बदल देते हैं। नेहा मिश्रा ने इसी प्रक्रिया में भाग लेकर पारंपरिक कारीगरों के कौशल के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
इस दौरान एसडीएम ने कुम्हारों द्वारा तैयार किए गए मिट्टी के दीये, बर्तन और कुल्हड़ भी खरीदे। उनकी इस खरीदारी का महत्व केवल सामान लेने तक सीमित नहीं था। यह स्थानीय कारीगरों की आजीविका को सहयोग देने और लोगों को स्वदेशी तथा हस्तनिर्मित उत्पादों की ओर प्रोत्साहित करने का संदेश भी था।
त्योहारों के दौरान बाजारों में बड़ी कंपनियों के तैयार उत्पाद आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। आकर्षक पैकिंग और व्यापक प्रचार के कारण ग्राहक अक्सर उन्हीं की ओर आकर्षित होते हैं। दूसरी ओर गांवों और कस्बों में रहने वाले कुम्हार सीमित संसाधनों के सहारे अपना कारोबार चलाते हैं। उनके पास बड़े पैमाने पर प्रचार करने या दूरदराज के बाजारों तक पहुंचने की सुविधाएं नहीं होतीं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर मिलने वाला प्रोत्साहन उनके लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।कुम्हार समुदाय की आजीविका का बड़ा हिस्सा पारंपरिक मिट्टी के उत्पादों की बिक्री पर निर्भर रहता है। विशेष रूप से दीपावली के आसपास दीयों की मांग बढ़ने से उन्हें अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद होती है। हालांकि इस व्यवसाय में मौसम, कच्चे माल की उपलब्धता, ईंधन की लागत और बाजार में बिक्री जैसी कई चुनौतियां रहती हैं। अगर तैयार सामान समय पर नहीं बिके तो मेहनत के अनुपात में उचित आमदनी हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
नेहा मिश्रा की इस पहल से एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आता है कि क्या त्योहार मनाते समय समाज उन लोगों के योगदान को पर्याप्त महत्व देता है, जिनकी मेहनत से हमारी परंपराएं जीवित रहती हैं? मिट्टी का दीया केवल रोशनी देने वाली वस्तु नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक शिल्प और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है।दीपावली पर मिट्टी के दीयों की खरीदारी से स्थानीय कुम्हारों को आर्थिक सहयोग मिलता है। इसके साथ ही नई पीढ़ी को पारंपरिक शिल्प के महत्व से परिचित कराने का अवसर भी मिलता है। आज जब अनेक पारंपरिक व्यवसाय आधुनिक बाजार की प्रतिस्पर्धा से जूझ रहे हैं, तब ऐसे छोटे प्रयास लोगों का ध्यान स्थानीय उत्पादों की ओर आकर्षित कर सकते हैं।
मिट्टी के बर्तन और कुल्हड़ भी भारतीय जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। एक समय घरों में पानी रखने से लेकर खाना पकाने और पेय पदार्थ परोसने तक मिट्टी के बर्तनों का व्यापक उपयोग होता था। आधुनिक सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद इन उत्पादों के प्रति लोगों की रुचि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यदि इन्हें उचित बाजार और प्रोत्साहन मिले, तो पारंपरिक कुम्हारी व्यवसाय के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।एसडीएम
नेहा मिश्रा की पहल को प्रशासन और आमजन के बीच संवेदनशील जुड़ाव के उदाहरण के रूप में भी देखा जा सकता है। एक अधिकारी का गांव पहुंचकर स्थानीय लोगों के काम को समझना और उनकी कला का सम्मान करना सकारात्मक संदेश देता है। इससे यह विचार सामने आता है कि प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ समाज के परिश्रमी वर्गों की समस्याओं और जरूरतों को समझना भी महत्वपूर्ण है।
दीपावली के अवसर पर यह पहल लोगों को अपनी खरीदारी की आदतों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। यदि प्रत्येक परिवार त्योहार पर अपनी जरूरत के अनुसार कुछ मिट्टी के दीये और अन्य स्थानीय उत्पाद खरीदे, तो उसका सीधा लाभ कारीगर परिवारों तक पहुंच सकता है।लालगंज की एसडीएम नेहा मिश्रा ने चिरकिहिट गांव में कुम्हारों के बीच पहुंचकर यही संदेश दिया कि दीपावली की खुशियां केवल अपने घर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। त्योहार की असली सुंदरता तब और बढ़ जाती है, जब हमारी छोटी-सी पहल किसी मेहनतकश परिवार के जीवन में भी उम्मीद और खुशियों की रोशनी भर सके।
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