जयपुर : राजस्थान में मानसून की सक्रियता के बावजूद राज्य के बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर लगातार चिंता बढ़ा रहा है। प्रदेश के 693 बांधों में वर्तमान में कुल जल भंडारण क्षमता का केवल 45.43 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है। पिछले वर्ष इसी अवधि में बांधों में जलस्तर 63.20 प्रतिशत तक था। आंकड़ों में आई इस गिरावट ने जल प्रबंधन और आगामी महीनों में पेयजल एवं सिंचाई व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

जल संसाधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस साल मानसून की शुरुआत के बाद भी कई क्षेत्रों में अपेक्षित बारिश नहीं हुई है। इसके कारण बांधों में पानी की आवक सीमित रही है। प्रदेश के कई छोटे-बड़े जलाशयों में जलस्तर पिछले साल की तुलना में काफी नीचे बना हुआ है।

राजस्थान में बांधों का जलस्तर राज्य की कृषि व्यवस्था और पेयजल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रदेश के कई हिस्सों में खेती बड़ी हद तक जलाशयों और नहरों पर निर्भर करती है। ऐसे में यदि मानसून के दौरान पर्याप्त जल संग्रहण नहीं हो पाया तो आने वाले समय में किसानों और आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

पिछले साल की तुलना में इस बार बांधों में पानी की कम उपलब्धता के पीछे कम बारिश और जलाशयों में कम आवक को प्रमुख कारण माना जा रहा है। मानसून के दौरान होने वाली बारिश ही राजस्थान के जल स्रोतों को भरने का मुख्य माध्यम है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो इसका सीधा असर बांधों के जलस्तर पर दिखाई देता है।

प्रदेश के कई जिलों में मानसून की बारिश से लोगों को गर्मी से राहत तो मिली है, लेकिन बांधों के लिए अभी तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाया है। कई जलाशयों में जलभराव की स्थिति बेहतर होने के लिए लगातार अच्छी बारिश की आवश्यकता है।

जल संसाधन विभाग बांधों की स्थिति पर लगातार निगरानी बनाए हुए है। अधिकारियों के अनुसार, आने वाले दिनों में यदि मानसून सक्रिय रहता है और अच्छी बारिश होती है तो जलाशयों में पानी की आवक बढ़ सकती है। विभाग की ओर से उपलब्ध जल का बेहतर प्रबंधन करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

राजस्थान जैसे कम वर्षा वाले राज्य में जल संरक्षण हमेशा से बड़ी चुनौती रहा है। यहां बारिश का अधिकांश हिस्सा कुछ ही महीनों में होता है और पूरे साल की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसी पानी को संग्रहित किया जाता है। इसलिए मानसून के दौरान बांधों में पर्याप्त पानी का जमा होना बेहद जरूरी होता है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बांधों में कम पानी का असर रबी फसलों की बुवाई पर भी पड़ सकता है। यदि जल उपलब्धता सीमित रही तो सिंचाई क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। किसानों को फसलों के चयन और पानी के उपयोग में सावधानी बरतने की सलाह दी जा सकती है।

वहीं, शहरी क्षेत्रों में भी जल आपूर्ति को लेकर प्रशासन सतर्क है। कई शहरों और कस्बों में पेयजल की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में जल स्रोतों में पर्याप्त भंडारण नहीं होने से भविष्य में आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

जल विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान में केवल मानसूनी बारिश पर निर्भर रहने के बजाय वर्षा जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और जल उपयोग की बेहतर योजनाओं पर लगातार काम करने की जरूरत है। छोटे जल स्रोतों को मजबूत करना और पानी की बर्बादी रोकना भी महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

फिलहाल प्रदेश में मानसून की स्थिति पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यदि आने वाले हफ्तों में अच्छी बारिश होती है तो बांधों में जलस्तर सुधर सकता है। लेकिन यदि बारिश कमजोर रही तो कम जल भंडारण की स्थिति आने वाले महीनों में चुनौती बन सकती है।

राज्य सरकार और जल संसाधन विभाग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती उपलब्ध जल संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना है, ताकि पेयजल, सिंचाई और अन्य जरूरतों को पूरा किया जा सके।

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